Roza OR Mahe Ramzan (रोज़ा और माहे रमज़ान) इस्लाम का चौथा मुक़द्दस रुक्न और अल्लाह तआला की अज़ीम नेमत है। माहे रमज़ानुल मुबारक के पूरे महीने के रोज़े हर आक़िल, बालिग़ मुसलमान मर्द व औरत पर फ़र्ज़-ए-ऐन हैं। सुन्नी हनफ़ी फ़िक़्ह और बहारे शरीअत के मुताबिक़ रोज़े की हक़ीक़त, फ़राइज़, नीयत का वक़्त, सहरी व इफ़्तार की सुन्नतें और ज़रूरी मसायल यहाँ तफ़सील से बयान किए गए हैं।
क़ुरआन मजीद में रमज़ान के रोज़े की फ़र्ज़ियत
क़ुरआन मजीद की सूरह अल-बक़रह में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त इरशाद फ़रमाता है:
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُتِبَ عَلَيْكُمُ الصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى الَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ
तर्जुमा: ऐ ईमान वालो! तुम पर रोज़े फ़र्ज़ किए गए जैसे तुमसे अगलों पर फ़र्ज़ किए गए थे ताकि तुम परहेज़गार बन जाओ।
📖 हवाला: सूरह अल-बक़रह (2), आयत: 183
माहे रमज़ान की अज़ीम फ़ज़ीलत (हदीस की रोशनी में)
रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
हदीस-ए-क़ुदसी:
“अल्लाह तआला फ़रमाता है: ‘रोज़ा ख़ास मेरे लिए है और मैं ही इसका बदला दूँगा।’ रोज़ेदार के मुँह की बू अल्लाह के नज़दीक मुश्क की ख़ुशबू से भी ज़्यादा पाकीज़ा है।”
📚 हवाला: सहीह बुख़ारी, हदीस: 1904; सहीह मुस्लिम, हदीस: 1151।
एक और हदीस में नबी-ए-रहमत ﷺ ने फ़रमाया कि जब रमज़ान का महीना आता है तो आसमान और जन्नत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं, जहन्नम के दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं और सरकश शैतानों को ज़ंजीरों में जकड़ दिया जाता है। (सहीह बुख़ारी: 1899)
रोज़े की शरई परिभाषा और 3 फ़राइज़
शरीअत में रोज़ा (सौम) का मतलब है: सुब्ह सादिक़ (फ़ज्र का वक़्त शुरू होने) से लेकर ग़ुरूब-ए-आफ़ताब (सूरज डूबने) तक इबादत की नीयत के साथ खाने, पीने और नफ़्सानी ख़्वाहिशात (हमबिस्तरी) से अपने आप को रोके रखना।
रोज़े के 3 बुनियादी फ़राइज़:
- नीयत करना: दिल में रोज़ा रखने का पक्का इरादा होना।
- खाने-पीने से रुकना: कोई भी ग़िज़ा या दवा हलक़ के नीचे जानबूझकर न उतारना।
- जिमाअ (हमबिस्तरी) से रुकना: शौहर व बीवी का सुब्ह सादिक़ से शाम तक शरिया पाबंदी में रहना।
रोज़े की नीयत का तरीक़ा व वक़्त
रमज़ान के फ़र्ज़ रोज़े की नीयत का वक़्त रात से लेकर अगले दिन निस्फ़ुन्नहार-ए-शरई (दहवा-ए-कुबरा यानी ज़वाल से तक़रीबन एक घंटा पहले) तक रहता है। अगर रात में नीयत न कर सका और सुब्ह कुछ खाया-पिया नहीं, तो ज़वाल से पहले नीयत कर लेने से भी रोज़ा दुरुस्त हो जाएगा।
وَبِصَوْمِ غَدٍ نَّوَيْتُ مِنْ شَهْرِ رَمَضَانَ
हिंदी उच्चारण: “व बि-सौमि ग़दिन नवैतु मिन शहरि रमज़ान।”
तर्जुमा: और मैंने माहे रमज़ान के कल के रोज़े की नीयत की।
सहरी और इफ़्तार के मसनून आदाब
| सुन्नत अमल | शरीअत का हुक्म व तरीक़ा | फ़ज़ीलत व हदीस |
|---|---|---|
| सहरी खाना | सुब्ह सादिक़ से कुछ देर पहले तक सहरी खाना सुन्नत-ए-मुस्तहब्बा है। | ‘सहरी खाया करो क्योंकि सहरी में बरकत है।’ (बुख़ारी: 1923) |
| इफ़्तार में जल्दी करना | जैसे ही सूरज डूबने का यक़ीन हो जाए, फ़ौरन इफ़्तार करें। | लोग भलाई पर रहेंगे जब तक इफ़्तार में जल्दी करेंगे। (मुस्लिम) |
| खजूर से इफ़्तार | ताज़ा या सूखी खजूर से, वरना सादा पानी से इफ़्तार करना सुन्नत है। | खजूर बा-बरकत है और पानी पाक करने वाला है। (तिरमिज़ी) |
اللَّهُمَّ إِنِّي لَكَ صُمْتُ وَبِكَ آمَنْتُ وَعَلَيْكَ تَوَكَّلْتُ وَعَلَىٰ رِزْقِكَ أَفْطَرْتُ
इफ़्तार की दुआ: “अल्लाहुम्मा इन्नी लका सुमतु व बिका आमन्तु व अलयका तवक्कल्तु व अला रिज़्क़िका अफ़्तरतु।”
तर्जुमा: ऐ अल्लाह! मैंने तेरे ही लिए रोज़ा रखा, तुझ पर ईमान लाया, तुझ पर भरोसा किया और तेरे ही दिए हुए रिज़्क़ से इफ़्तार किया।
📚 हवाला: सुनन अबू दाऊद, हदीस: 2358।
रोज़ा न रखने की शरीई छूट जानने के लिए हमारा अगला लेख Kab Roza Na Rakhne Ki Ijazat Hai और EID Ki Namaz Ka Tarika ज़रूर पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1: Roza OR Mahe Ramzan में भूलकर खा-पी लेने से क्या रोज़ा टूटता है?
नहीं, अगर रोज़ा याद न रहा और भूलकर कुछ खा-पी लिया तो रोज़ा नहीं टूटता, चाहे पेट भर के खाया हो। जैसे ही याद आए, फ़ौरन रुक जाए और मुँह साफ़ कर ले। हदीस में फ़रमाया गया कि उसे अल्लाह ने खिलाया और पिलाया।
Q2: क्या ब्रश या टूथपेस्ट करने से रोज़ा मकरूह होता है?
हाँ, रोज़े की हालत में टूथपेस्ट या मंजन इस्तेमाल करना मकरूह है। अगर उसका कोई ज़रा सा हिस्सा भी हलक़ के नीचे उतर गया तो रोज़ा टूट जाएगा और क़ज़ा लाज़िम होगी। ताज़ा मिस्वाक करना सुन्नत है।
Q3: क्या आँख में सुरमा या कान में तेल डालने से रोज़ा टूटता है?
आँख में सुरमा या दवाई डालने से रोज़ा बिल्कुल नहीं टूटता, चाहे हलक़ में उसका मज़ा ही क्यों न महसूस हो। कान में तेल या दवा टपकाने के बारे में आला हज़रत ने तहक़ीक़ फ़रमाई है कि एहतियात बरतनी चाहिए।
Q4: रोज़े की हालत में ग़ुस्ल करना या तैरना कैसा है?
गर्मी या प्यास की शिद्दत दूर करने के लिए नहाना, गीला कपड़ा लपेटना या मुँह धोना पूरी तरह जाइज़ है, इससे रोज़े पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता। अलबत्ता ग़ुस्ल करते वक़्त गरगरा न करें ताकि हलक़ में पानी न जाए।
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