Roza OR Mahe Ramzan

Roza OR Mahe Ramzan

रोज़ा और माहे रमज़ान



( 1 ) सन दो हिजरी में मूमिनों पर रोज़े फ़र्ज़ और सदक़ए फ़ित्र वाजिब हुआ.

(तफ़सीरे नईमी)

( 2 ) महीनों में सिर्फ रमज़ान का नाम कुरआन में लिया गया है.

(तफ़सीरे नईमी)

( 3 ) फुकहा का क़ौल है कि अगर किसी ने न मानी कि मैं रमज़ान बाद अल्लाह ﷻ के लिये इस साल के बेहतरीन दिनों में रोज़े रखूगा तो उस पर ज़िलहज्ज के पहले दस दिन के रोज़े वाजिब होंगे क्योंकि सारे साल में ये दस रोज़े सबसे बेहतर है.

(तफ़सीरे नईमी)

🎁 Roze Ke Jaruri Masail – रोज़े के जरूरी मसाइल



 

( 4 ) हदीस में है कि जिसने ज़िलहज्ज के अरफ़े का रोज़ा रख लिया, अल्लाह तआला उसे सात बरस के रोज़ों का सवाब अता करता है और उसका नाम क़ानितीन में लिखता है.

(तफ़सीरे नईमी)

( 5 ) रसूले अकरम ﷺ ने फ़रमाया शबे क़द्र में चार झन्डे नाज़िल होते हैं – एक लिवाउल हम्द, दूसरा लिवाउल रहमत, तीसरा लिवाउल मग़फ़िरत, चौथा लिवाउल करामत. हर झन्डे के साथ सत्तर हज़ार फ़रिश्ते होते हैं और हर झन्डे पर कलिमए तैय्यिबह लिखा होता है. लिवाउल हम्द आसमान और ज़मीन के बीच, लिवाउल मग़फ़िरत रसूलुल्लाह के रौज़ए पाक के ऊपर, लिवाउल रहमत अबए मुअज्जमह पर और लिवाउल करामत बैतुल मक़दिस के गुम्बद पर गाड़ा जाता है. और हर झन्डे मुसलमानों के दरवाज़े पर ७० बार सलाम करने आता है.

(तोहफ़्तुल वाइज़ीन)

🎁 Shab E Qadr Ki Nawafil Namaz – शबे कद्र की नवाफ़िल नमाज़

( 6 ) रसूले अकरम ﷺ फ़रमाते हैं जो शख्स लैलतुल क़द्र में इतनी देर इबादत के लिये खड़ा रहा जितनी देर चरवाहा बकरी दोह ले, तो वह अल्लाह तआला के नजदीक बारह माह के रोजे रखने वाले से बेहतर है.

(तफ़सीरे नईमी)

( 7 ) रसूले अकरम ﷺ ने फ़रमाया अल्लाह तआला ने एक फ़रिश्ता पैदा फ़रमाया है और उसके चार मुंह बनाए हैं, एक मुंह से दूसरे मुंह तक अस्सी हज़ार बरस की राह है. उस फ़रिश्ते का एक मुंह सज्दे में है जो क़यामत तक रहेगा. इस मुंह से सज्दे की हालत में ही फ़रिश्ता यूँ कहता है कि इलाही मैं तेरी तस्वीह करता हूं तेरा जमाल निहायत अज़ीमुश्शान है. दूसरे मुंह से जहन्नम की तरफ़ देखकर कहता है उसपर अफ़सोस जो इसमें दाखिल हुआ, तीसरे मुंह से जन्नत की तरफ़ देखकर कहता है कि इसमें दाखिल होने वाले को मुबारकबाद, चौथे मुंह से अर्श इलाही की तरफ़ देखकर कहता है कि इलाही रहम कर और उम्मते मुहम्मदियह में जो रमज़ान के रोज़ेदार हैं उन्हें अज़ाब न दे.

(तोहफ़तुल वाड़ज़ीन)

( 8 ) सरवरे आलम ﷺ ने फ़रमाया – अल्लाह तआला किरामन कातिबीन का रमज़ान में हुक्म देता है कि उम्मते मुहम्मदियह की नकियाँ लिखा और बदियाँ लिखनी छोड़ दो.

(जोहरतुल रियाज़)

🎁 Kiraman Katibin Ka Bayan – किरामन कातेबीन का बयान

( 9 ) रोज़े तीन तरह के होते हैं – अवाम का रोज़ा, ख़वास का रोज़ा और अख़स्सुल ख़वास का रोज़ा. अवाम का रोज़ा यह है कि पेट और शर्मगाह को उसकी ख्वाहिशों से रोका जाए. ख़वास का रोज़ा यह है कि तमाम अंग गुनाहों से बाज़ रहें. अख़स्सुल ख़वास का रोज़ा यह है कि दिल तमाम दुनियावी और दीनी फ़िक्रों और अल्लाह के सिवा हर एक से रुका रहे. यह रोज़ा नबियों और सिद्दीकीन का होता है.

(जुब्दतुल वाड़ज़ीन)



 

Roza OR Mahe Ramzan

( 10 ) तीस रोज़े फ़र्ज़ होने में कुछ उलमा के क़ौल के मुताबिक़ यह हिक्मत है कि आदम अलैहिस्सलाम के पेट में गेहूँ के दाने तीस रोज़ तक रहे थे. फिर जब उनकी तौबह कुबूल हुई तो अल्लाह तआला ने तीस रोज़ों का हुक्म दिया इनमें रातें भी शामिल थीं. उम्मते मुहम्मदियह पर सिर्फ दिन को रोज़ा फ़र्ज़ किया गया.

(बहजतुल अनवार)

( 11 ) सरवरे आलम ﷺ ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला को रोज़ेदार का तना हुआ पेट तमाम बरतनों से ज्यादा पसन्द है.

(तफ़सीरे नईमी)

( 12 ) सरवरे आलम ﷺ ने फ़रमाया कि जो शख्स रमज़ान के महीने में इल्मे दीन की मजलिस में हाज़िर हुआ, उसके नामए अअमाल में हर क़दम के बदले एक साल की इबादत लिखी जाती है और वह अर्श के नीचे मेरे साथ होगा.

(ज़ख़ीरतुल आबिदीन)

( 13 ) सरवरे आलम ﷺ ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया है कि इब्ने आदम के कुल अमल उसके लिये हैं मगर रोज़ा सिर्फ मेरे लिये है और मैं खुद ही इसका बदला दूंगा.

(बुख़ारी)

( 14 ) हदीस में है कि जो औरत रमज़ान में अपने ख़ाविन्द की मर्जी पर चलेगी उसे हज़रत मरयम और आसियह का सा सवाब मिलेगा.

(तफ़सीरे नईमी)

( 15 ) हदीस में है कि जो शख्स रमज़ान में पाबन्दी के साथ जमाअत से नमाज़ पढ़े, अल्लाह तआला उसे क़यामत के दिन हर रकअत के बदले अपनी नेअमतों से भरा हुआ एक शहर अता करेगा.

(तोहफ़्तुल वाइजीन)

🎁 Namaz Ka Tarika

( 16 ) जिसने रमज़ान में किसी मुसलमान भाई की हाजत पूरी की, क़यामत में अल्लाह तआला उसकी हज़ार हाजतें पूरी करेगा.

(तोहफ़्तुल वाइज़ीन)

( 17 ) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो तआला अन्हुमा कहते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाते हैं कि क़ब्रों से उठने के वक़्त तीन फ़िरकों से फ़रिश्ते मुसाफ़हा करेंगे – एक शहीद, दूसरा रमज़ान में इबादत करने वाले, तीसरे अरफ़े के दिन रोज़ा रखने वाले.

(जुब्दतुल वाइज़ीन)

( 18 ) कहा गया है कि सौम में तीन हुरुफ़ हैं – सॉद दलालत कता है नफ़्स की सियानत पर यानी गुनाहों से हिफ़ाज़त, वाव नफ़्स की विलायत पर कि अंगों को इताअत पर लगाए और मीम रोज़े की हमेशगी पर मौत के वक्त तक.

(सबा सनाबिल शरीफ़)

( 19 ) नबीये करीम ﷺ ने फ़रमाया कि भूखे पेट हंसना पेट भरे रोने से अच्छा है.

(तोहफ़्तुल वाइज़ीन)

( 20 ) हदीस शरीफ़ में है रसूलुल्लाह ﷺ अपने सफ़र और इकामत में हर माह की १३-१४-१५ तारीख़ों के रोजे तर्क न फ़रमाते और आप फ़रमाते कि ये रोज़े मेरे हैं, जो कोई ये रोज़े रखे, दस हज़ार साल की इबादत का सवाब पाएगा. ये रोज़े दिलों को मुनव्वर और चेहरों को नूरानी करते हैं. ऐसा रोज़ेदार कल हश्र के दिन जन्नती ऊंटनियों पर सवार होगा और उसका चेहरा चौदहवीं के चाँद से ज़्यादा रौशन होगा.

(सबा सनाबिल शरीफ़)

( 21 ) किसी ने हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रदियल्लाहो तआला अन्हुमा से पूछा मैं नफ़्ली रोज़ा किस तरह रखू. फ़रमाया अगर हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम का रोज़ा रखना चाहो तो एक दिन रोज़ा रखो दूसरे दिन खोल दो और अगर उनके बेटे हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम का रोज़ा रखना चाहो तो हर माह के पहले तीन रोज़े रखो और अगर ख़ातूने जन्नत हज़रत मरयम का रोज़ा रखना चाहो तो दो रोज़ रोज़ा रखो और एक रोज़ खोल दो. और अगर उनके बेटे हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का रोज़ा रखना चाहो तो हमेशा रोज़े दार रहो. और अगर रसूले खुदा का रोज़ा रखना चाहो तो हर माह की १३-१४-१५ का रोज़ा रखो इस लिये कि हदीस में आया है कि जो शख्स अय्याम बैज़ का पहला रोज़ा रखता है, उसके तिहाई गुनाह बख़्श दिये जाते है और जो दो रोज़े रखता है उसके दो तिहाई गुनाह माफ़ कर दिये जाते हैं और जब वह तीसरे दिन का रोज़ा रखता है तो वो तमाम गुनाहों से ऐसे पाक हो जाता है जैसा उस दिन माँ के पेट से पैदा हुआ हो.

(सए सनाबिल शरीफ़)



 

( 22 ) शैतान मलऊन का क़ौल है कि लोगों के अअमाल में सबसे ज़्यादा गुस्सा दिलाने वाली दो चीजें हैं – एक अय्याम बैज़ के रोज़े दूसरे नमाज़े चाश्त.

(सबा सनाबिल शरीफ़)

🎁 Shaitan ki 6 Kamzoriyan – शैतान की 6 कमजोरिय

( 23 ) हज़रत अबू हुरैरह रदियल्लाहो तआला अन्हो कहते हैं कि नबीये करीम ﷺ ने फ़रमाया कि अगर किसी को जुमुए के दिन का रोज़ा रखना हो तो एक दिन पहले भी रोज़ा रखे या इसके बाद रोज़ा रखे. (यानी फ़क़त एक रोज़ा रखना मकरूह है).

(तोहफ़्तुल वाइज़ीन)

( 24 ) नबीये करीम ﷺ ने अरफ़े का रोज़ा मैदाने अरफ़ात में रखने से मना फ़रमाया है.

(तफ़सीरे नईमी)

( 25 ) नबीये करीम ﷺ ने फ़रमाया अगर लोगों को मालूम हो जाए कि रमज़ान क्या चीज़ है तो मेरी उम्मत यह तमन्ना करे कि सारा साल रमज़ान ही हो जाए.

(जुब्दतुल बाड़ज़ीन)

( 26 ) एक रिवायत है कि अल्लाह तआला रमज़ान में अर्श के उठाने वाले फ़रिश्ता को हुक्म देता है कि अपनी अपनी इबादतें छोड़कर रोज़ेदारों की दुआओं पर आमीन कहो.

(तोहफ़्तुल वाइज़ीन)

( 27 ) जिस साल नबीये करीम का विसाल हुआ था उस साल आपने बीस रोज़ का ऐतिकाफ़ फ़रमाया था.

(बुख़ारी)

( 28 ) नफ्ल ऐतिकाफ़ यह है कि इन्सान जब भी मस्जिद में आए तो दाएं पाँव से दाखिल हो और यह कह ले कि मैंने ऐतिकाफ़ की नियत की. अब जब तक वह मस्जिद में रहेगा, ऐतिकाफ़ का सवाब पाएगा. दूसरा मस्जिद में खाना पीना भी जाइज़ हो जाएगा, तीसर मस्जिद में सो सकेगा, चौथे मस्जिद में दुनिया की बातें कर सकेगा.

(बहारे शरीअत)

( 29 ) शरीअत में इबादत की नियत से मस्जिद में ठहरने का नाम एतिकाफ़ है. यह बहुत पुरानी इबादत है, पिछले नबियों रसूलों के दीन में भी जारी थी.

(तफ़सीरे नईमी)

🎁 मस्जिद के आदाब और अहकामे मस्जिद | Masjid Ke Aadaab OR Ahakaame Masjid

( 30 ) एतिकाफ़ करने वाला ऐसे भिखारी की तरह है जो ग़नी के दरवाज़ पर अड़ कर बैठ जाए और कहे कि मैं तो लेकर ही उठूंगा .

(तफ़सीरे नईमी)

( 31 ) इमाम शाफ़ई रहमतुल्लाह तआला अलैह के नजदीक रोज़े में दापहर के बाद मिस्वाक करना मम्नूअ और मकरूह है. इमाम अबू हनीफ़ह रहमतुल्लाह तआला अलैह के नजदीक बिला कराहत जाइज़ है बल्कि वुजू की सुन्नत है.

(तफ़सीरे नईमी)

( 32 ) रोज़े नबुव्वत के १५वे साल यानी दस शव्वाल सन दो हिजरी को फ़र्ज़ हुए. पहले सिर्फ एक रोज़ा यानी आशूरे के दिन का फ़र्ज़ हुआ था फिर यह मन्सूख़ होकर चाँद की १३वीं, १४वीं और १५वीं तारीखों के रोज़े फ़र्ज़ हुए. फिर यह भी मन्सूख़ होकर माहे रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ हुए मगर लोगों को इख़्तियार था कि चाहे रोज़ा रखें चाहे फ़िदियह अदा करें यानी हर रोज़े के बदले आधा साअ यानी १७५ रुपया अठन्नी भर गेहूँ सदक़ा करें. फिर यह इख्तियार मन्सूख़ होकर रोज़े लाज़िम हुए मगर यह पाबन्दी रही कि रात को सोने से पहले जो चाहे खा लो. सोकर कुछ भी नहीं खा सकते. फिर सुब्ह तक खाने पीने का इख्तियार दिया गया मगर औरत से हमबिस्ती फिर भी हराम रही. फिर हज़रत उमर रदियल्लाहो तआला अन्हो का वाक़िआ पेश आने पर रात में भी यह हलाल कर दिया गया.

(तफ़सीरे अहमदी)

( 33 ) इन्सानों के तीसरे बादशाह तहमूरस के ज़माने में सख्त क़हत साली हुई तो मालदारों को रोज़े का हुक्म दिया गया और उनसे कहा गया कि तुम दोपहर का खाना फ़क़ीरों को दो ताकि शाम को तुम और वो दोनों खाना खा सकें.

(रूहुल बयान)

( 34 ) नमाज़ सज्दा वगैरह फ़रिश्ते और दूसरी मखलूक भी अदा करते हैं मगर रोज़ा सिर्फ इन्सानों ही की इबादत है. फ़रिश्ते और दूसरी मखलूक बल्कि जिन्नात पर भी रोज़ा फ़र्ज़ नहीं.

(तफ़सीरे नईमी)



 

🎁 Roza kab Nahi tutata he – रोजा कब नहीं टूटता है

( 35 ) माहे रमज़ान के कुल चार नाम हैं – माहे सब, माहे मवासात, माहे वुसअते रिज़्क़ और माहे रमज़ान. रमज़ान या तो रहमान की तरह अल्लाह का नाम है. चूंकि इस माह में रात दिन अल्लाह ﷻ की इबादत होती है इस लिये इसे माहे रमज़ान यानी अल्लाह ﷻ का महीना कहा जाता है. हदीस में आया है कि यह न कहो कि रमज़ान आया और रमज़ान गया बल्कि यूं कहो कि माहे रमज़ान आया और गया. या यह रमज़ाउन से मुश्तक है. रमज़ाउन ख़रीफ़ मौसम की बारिश को कहते हैं इससे ज़मीन धुल जाती है और रबीअ की फ़स्ल खूब होती है. चूंकि यह महीना भी दिल के गर्द गुबार को धो देता है और इससे अअमाल की खेती हरी भरी रहती है इस लिये इसे रमज़ान कहा गया. या यह रमजुन से बना है जिसके मानी हैं गर्मी या जलना. चूंकि इस ज़माने में मुसलमान भूख प्यास की शिद्दत बरदाश्त करते हैं या यह गुनाहों को जला डालता है इस लिये इसे रमज़ान कहते हैं. कुछ ने कहा कि जब महीनों के नाम रखे गए तो जो महीना जिस मौसम में पड़ा उसका नाम उसी मुनासिबत से रख दिया गया. जो महीना गर्मी में था उसको रमज़ान कह दिया गया. इस महीने का दूसरा नाम माहे सब्र है. रोज़ा सब्र है जिसकी जज़ा रब है. और रोज़ा इसी महीने में रखा जाता है इस लिये इसे माहे सब्र कहा गया. मवासात के मानी हैं भलाई करना. चूंकि इस महीने में सारे मुसलमानों से ख़ास कर क़रीबी रिश्ते दारों से भलाई करना ज़्यादा सवाब का काम है इस लिये इसे माहे मवासात कहते हैं. इसमें रिज़्क़ की फ़राखी भी होती है कि ग़रीब भी नेअमतें खा लेते हैं. इसीलिये इसका नाम माहे वुसअते रिज़्क़ रखा गया.

(तफ़सीरे नईमी)

( 36 ) रमज़ान में पांच हुरुफ़ हैं – रे, मीम, जॉद, अलिफ़, नून. रे से मुराद है रहमते इलाही, मीम से मुराद है महब्बते इलाही, जॉद से मुराद है ज़माने इलाही, अलिफ़ से मुराद है अमाने इलाही, नून से मुराद है नूरे इलाही. रमज़ान में पांच इबादतें मख़सूस हैं – रोज़ा, तरावीह, तिलावते कुरआन, ऐतिकाफ़ और शबे कद्र की इबादत. जो कोई सच्चे दिल से ये पांच इबादत अदा करे वह इन पांच इनआमों का मुस्तहिक है जो रमजान के हुरुफ़ से मन्सुब है.

(तोहफ़तुल वाइज़ीन)

🎁 तरावीह की नमाज का बयान | Travih Ki Namaz Ka Bayaan

( 37 ) रमज़ान के चाँद में एक ही मुसलमान की गवाही मानी जा सकती है. अगर क़ाज़ी उसकी गवाही को न माने तो सिर्फ उस देखने वाले पर ही रोज़ा वाजिब होगा मगर शव्वाल के चाँद में कम से कम दो गवाह ज़रूरी है क्योंकि पहले इबादत में दाखिल होना था और यहाँ फ़र्ज़ से निकलना है और इबादत का सुबूत आसान है.

(तफ़सीरे नईमी)



 

🎁 CHAAND DEKHNE KA MASLA OR BAYAN – चाँद देखने का मसअला और बयान

( 38 ) अगली शरीअतों में इफ्तार के बाद इशा तक खाना पीना और औरतों से हमबिस्तरी करना हलाल था. नमाज़े इशा के बाद ये सब चीजें रात में भी हराम हो जाती थीं. इस्लाम के शुरू में भी यही हुक्म रहा. फिर सरमह इब्ने क़ैस अन्सारी रदियल्लाहो तआला अन्हो का वाक़िआ पेश आजाने से सुब्ह तक खाना पीना दुरुस्त हुआ.

(तफ़सीरे नईमी)

( 39 ) सरमह इब्ने क़ैस अन्सारी रदियल्लाहो तआला अन्हो का वाकिअह यूँ है कि आप मेहनती इन्सान थे, दिन भर मेहनत करते थे, थक जाते थे. एक दिन रोजे की हालत में काम किया, रात को घर आए, बीवी से खाना मांगा. वह पकाने में मसरूफ़ हुई. यह लेट गए. थके तो थे ही, आँख लग गई. जब बीवी ने खाना तैयार कर लिया और उन्हें बेदार किया तो उन्होंने खाने से इन्कार कर दिया क्योंकि सोने के बाद खाना हराम हो चुका था. हज़रत सरमह ने उसी हालत में दूसरा रोज़ा रख लिया जिससे बहुत कमज़ोर हो गए. दोपहर को ग़शी आ गई. इस वाक़ए के बाद सुब्ह तक खाना पीना हलाल कर दिया गया.

(ख़ज़ाइनुल इरफ़ान)

( 40 ) जैसे सुब्ह से रोज़ा शुरू कर देना फ़र्ज़ है, ऐसे ही रात आने पर इफ्तार करना फ़र्ज़. कुछ सूरतों में खाना पीना शरई फ़र्ज़ है. एक जब भूख प्यास की शिद्दत से जान जाने का ख़तरा हो क्योंकि जान की हिफ़ाज़त फ़र्ज़ है. दूसरे, रोजा इफ्तार के वक्त कि रोज़े पर रोज़ा रखना हराम है. तीसरे जब किसी को सरकार ﷺ हुक्म दें और हुक्म भी शरई हो, महज़ मशवरा न हो. मरन बूत रख कर जान देना या भूख हड़ताल करना सख़्त मना है.

(तफ़सीरे नईमी)

( 41 ) बीसवीं रमज़ान की अस्र से ईद का चाँद देखने तक ऐतिकाफ़ करना सुन्नते मुअक्कदह अलल किफ़ायह है कि अगर एक बस्ती में एक ने कर लिया तो सब बरी हो गए.

(तफ़सीरे नईमी)

( 42 ) ऐतिकाफ़ में औरतों से हमबिस्तरी करना, लिपटना चिपटना, बोसा वगैरह सब हराम है.

(तफ़सीरे नईमी)



 

( 43 ) सुन्नत ऐतिकाफ़ की मुद्दत नौ या दस दिन हैं इसमें रोज़ा भी शर्त है. फ़र्ज़ ऐतिकाफ़ नज्र का ऐतिकाफ़ है इसकी मुद्दत कम से कम एक दिन है, इसमें भी रोज़ा शर्त है.

(बहारे शरीअत, शामी वगैरह)

( 44 ) नफ़्ली रोज़ा भी शुरू कर देने से वाजिब हो जाता है और इसका पूरा करना फ़र्ज़ होता है.

(तफ़सीरे नईमी)

( 45 ) रोज़ए विसाल यानी रोज़े पर रोज़ा रखना मना है. हुजूरे अकरम ﷺ पर यह हुक्म जारी नहीं. आपने सब से पहले सात दिन का रोज़ा रखा फिर पांच दिन का फिर तीन दिन का. जब सहाबए किराम ने भी ऐसा रोज़ा रखना चाहा तो उन्हें मना फ़रमा दिया और फ़रमाया तुम में कौन हम जैसा है, हमें तो रब खिलाता पिलाता है.

(तफ़सीरे कबीर)

( 46 ) रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया जन्नत में एक नहर का नाम रजब है इसका पानी दूध से ज़्यादा सफ़ेद और शहद से ज़्यादा मीठा है. अल्लाह तआला इस में से उसे पिलाएगा जिसने रजब में एक दिन का भी रोज़ा रखा होगा.

(तोहफ़तुल वाइज़ीन)

( 47 ) सरकारे मदीना ﷺ फ़रमाते हैं रजब अल्लाह का, शअबान मेरा और रमज़ान मेरी उम्मत का महीना है.

(तफ़सीरे नईमी)

( 48 ) मशायख़ ने लिखा है कि शबे क़द्र में हर चीज़ सज्दा करती है यहाँ तक कि दरख्त जमीन में गिर जाते हैं और फिर अपनी जगह खड़े हो जाते हैं.

(तफ़सीरे नईमी)

( 49 ) हज़रत दाऊद ताई रदियल्लाहो तआला अन्हो कहते हैं कि एक बार मुझे रमज़ान की पहली रात में नींद का ग़लबह हुआ. ख्वाब में मुझे जन्नत दिखाई दी. मैंने अपने आपको जन्नत में याकूत और मोतियों की एक नहर के किनारे बैठा हुआ देखा और वहाँ जन्नत की हूरें नज़र पड़ीं जिनके चेहरे सूरज से ज़्यादा चमक रहे थे. मैंने कहा ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह. इसके जवाब में उन्होंने भी कलिमए शहादत दोहराया और कहा कि हम खुदा की तारीफ़ करने वालों, रोज़े दारों और रमज़ान में रुकूअ और सुजूद करने वालों के लिये हैं.

(तोहफ़तुल वाइज़ीन)



 

( 50 ) रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया कि जन्नत चार तरह के आदमियों की मुश्ताक है – कुरआने मजीद पढ़ने वालों की, बेहूदा बातों से से ज़बान को रोकने वालों की, भूखों को खाना खिलाने वालों की,रमज़ान के रोज़ेदारों की.

(रौनकुल मजालिस, गुल्दरतए तरीक्त)

( 51 ) हदीस शरीफ़ में है कि जब रमज़ान शरीफ़ का चाँद नज़र आता है तो अर्श, कुर्सी और फ़रिश्ते बलन्द आवाज़ से कहते हैं कि उम्मते मुहम्मदियह को उस बुजुर्गी की बशारत हो जो अल्लाह तआला ने उनके लिये रख छोड़ी है और उनके लिये शैतान को छोड़कर चाँद सूरज सितारे परिन्दे मछलियां और हर जानदार रात दिन मग़फ़िरत मांगता है और पहली तारीख़ की सुब्ह को अल्लाह तआला एक एक करके सबको बख्श देता है. और अल्लाह तआला फ़रिश्तों को हुक्म देता है कि तुम रमज़ान में अपनी इबादत और तस्बीह का सवाब उम्मते मुहम्मदियह के नाम कर दो.

(तोहफ़तुल वाइज़ीन)

( 52 ) हज़रत उमर फ़ारुक़ अअज़म रदियल्लाहो तआला अन्हो रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत करते हैं कि जब रमज़ान में रोज़ेदार नींद से जागता और बिस्तर पर करवटें बदलता है तो एक फ़रिश्ता कहता है खुदा तुझे बरकत दे और तुझपर रहम करे, उठ खड़ा हो. फिर जब वह नमाज़ की नियत से खड़ा हो जाता है तो बिस्तर उसके लिये दुआ करता है और कहता है कि इलाही इसे जन्नत के उमदा फर्श इनायत फ़रमा. फिर जब वह कपड़े पहनता है तो वह यह दुआ करता है कि इलाही इसे जन्नत का लिबास अता फ़रमा. जब वह जूते पहनता है तो जूते कहते हैं कि इलाही तू इसे पुले सिरात पर साबित क़दम रख. जब पानी का बरतन लेता है तो वह बरतन यह दुआ करता है कि इलाही तू इसे जन्नत के कूज़े अता फ़रमा. जब वुजू करता है तो पानी दुआ करते हुए कहता है कि इलाही इसे गुनाहों और ख़ताओं से पाक साफ़ कर दे. जब नमाज़ के लिये खड़ा होता है तो घर यह दुआ करता है कि इलाही तू इसकी कब्र को फ़ाख़ और लहद को नूरानी कर दे और अपनी रहमत नाज़िल फ़मा. फिर अल्लाह तआला उसपर रहमत की नज़र फ़रमाता है और दुआ के वक़्त यह फ़रमाता है कि ऐ बन्दे तेरी तरफ़ से दुआए हाजत, हमारी तरफ़ से कुबूलियत, तेरी तरफ़ से सवाल हमारी तरफ़ से अता, तेरी तरफ़ से इस्तिग़फ़ार, हमारी तरफ़ से बेशुमार मग़फ़िरत.

(जुब्दतुल वाइज़ीन)

( 53 ) हज़रत अली रदियल्लाहो तआला अन्हो से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ से रमज़ान की तरावीह के बारे में सवाल किया गया तो आपने फ़रमाया कि रमज़ान की पहली रात में मूमिन बन्दह अपने गुनाहों से ऐसा पाक हो जाता है जैसे आज माँ के पेट से पैदा हुआ है. दूसरी रात में उसकी और उसके मुसलमान माँ बाप की मगफिरत हो जाती है. तीसरी रात में फ़रिश्ता अर्श के नीचे से पुकारता है कि अब नए सिरे से अमल कर क्योंकि तेरे पिछले गुनाह माफ़ हो चुके हैं. चौथी रात में उसे तौरात, इन्जील, ज़बूर और कुरआने मजीद पढ़ने का सवाब मिलता है, पांचवीं रात में अल्लाह तआला उसे उस शख्स का सवाब अता करता है जिसने मस्जिदे नबवी, मस्जिदे हराम और मस्जिदे अक़सा में नमाज़ अदा की हो, छटी रात में बैतुल मअमूर के तवाफ़ करने वाले की बराबर सवाब मिलता है और तमाम पत्थर और ढेले उसकी मग़फ़िरत चाहते हैं, सातवीं रात में इतना सवाब मिलता है गोया हज़रत मूसा से मुलाक़ात और फ़िरऔन के मुकाबले में उनकी मदद की, आठवीं रात में उसे इतना सवाब मिलता है जितना हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को मिला. नवीं रात में रसूलुल्लाह ﷺ की इबादत का सवाब मिलता है, दसवीं रात में दीन दुनिया की बेहतरी इनायत करता है, ग्यारहवीं रात में दुनिया से इस तरह अलग हो जाता है गोया आज माँ के पेट से पैदा हुआ है, बारहवीं रात में यह फ़ज़ीलत मिलती है कि उसका चेहरा क़यामत के दिन चौदहवीं के चाँद की तरह रौशन होगा. तेरहवीं रात की बरकत से क़यामत में उसे हर तरह की बुराई से अम्न मिलेगा. चौदहवीं रात की इबादत से फ़रिश्ते उसकी इबादत की गवाही देंगे और अल्लाह तआला क़यामत के हिसाब से आज़ाद कर देगा. १५वीं रात में फ़रिश्ते और अर्श और कुर्सी उठाने वाले फ़रिश्ते उसपर रहमत भेजते हैं, सोलहवीं रात में अल्लाह तआला दोज़ख़ से आज़ादी और जन्नत में दाखिल होने का परवाना लिख देता है, १७वीं रात में नबियों के बराबर सवाब मिलता है, १८वीं रात में एक फ़रिश्ता पुकारता है कि ऐ खुदा के बन्दे तुझ से और तेरे माँ बाप से खुदा रज़ामन्द है. १९वीं रात में अल्लाह तआला जन्नतुल फ़िरदौस में उसके दर्जे बलन्द कर देता है, बीसवीं रात में शहीदों और नेकों का सवाब मिलता है, इक्कीसवीं रात में अल्लाह तआला उसके लिये जन्नत में एक महल तैयार करता है, २२वीं रात में यह बरकत हासिल होती है कि वह क़यामत के दिन हर तरह के ग़म और अन्देशे से बेख़ौफ़ रहेगा. २३वीं रात में अल्लाह तआला उसके लिये बहिश्त में एक शहर तैयार करता है, २४वीं रात में चालीस साल की इबादत का सवाब मिलता है, २५वीं रात में उससे कब्र का अज़ाब उठा लिया जाता है, २८वीं रात में चालीस साल की इबादत का सवाब मिलता है, २७वीं रात की फ़ज़ीलत से वह पुले सिरात पर से कड़कती हुई बिजली की तरह गुज़र जाएगा, २८वीं रात में अल्लाह तआला उसके लिये जन्नत में हज़ार दर्जे बलन्द कर देता है, २९वीं रात में हज़ार मक़बूल हज्ज का सवाब मिलता है, तीसवीं रात में अल्लाह तआला फ़रमाता है ऐ मेरे बन्दे जन्नत के मेवे खा और सलसबील के पानी से नहा और आबे कौसर पी. में तेरा रब हूँ और तू मेरा बन्दह.

(नुहतुल मजालिस)



 

( 54 ) हज़रत इब्ने उमर रदियल्लाहो तआला अन्हो से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया जिसने रमज़ान के बाद शव्वाल के 6 रोज़े रख लिये वह गुनाहों से ऐसा पाक हो जाता है जैसे माँ के पेट से आज पैदा हुआ है.

(तोहफ़्तुल वाइज़ीन)

( 55 ) रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया जो शख्स रमज़ान के पूरे रोजे रखकर शव्वाल के 6 रोज़े रखता है अल्लाह तआला उसे 6 पैग़म्बरों का सवाब देता है जिनमें पहले आदम हैं, दूसरे यूसुफ़, तीसरे यअक्कूब, चौथे मूसा, पांचवें ईसा, छटे मुहम्मद, अला नबिय्यिना व अलैहिमुस्सलातो वरसलाम.

(जुल्दतुल वाड़ज़ीन)



 

🎁 हज़रत आदम अलैहिस्सलाम कौन हैं ?

( 56 ) हदीस शरीफ़ में है कि क़यामत के दिन रमज़ान निहायत अच्छी सूरत में होकर अल्लाह तआला को सज्दा रेगा. वहाँ उसे हुक्म होगा ऐ रमज़ान मांग क्या मांगता है और जिसने तेरा हक़ अदा किया हो उसका हाथ पकड़ ले. रमज़ान अपना हक़ अदा करने वालों का हाथ पकड़ कर हुजूर में खड़ा हो जाएगा. फिर हुक्म होगा ऐ रमज़ान तू क्या चाहता है. रमज़ान अर्ज करेगा कि इलाही जिसने मेरा हक अदा किया है उसके सर पर इज्ज़त और वकार का ताज रख दे. चुनान्चे अल्लाह तआला उसे एक हज़ार ताज अता फ़रमाएगा और सत्तर हज़ार गुनाहे कबीरह करने वालों की बाबत उसकी शफाअत कुबूल फ़रमाएगा और ऐसी एक हज़ार हूरों के साथ उसका निकाह कर देगा जिनमें एक एक हूर के आगे सत्तर सत्तर हज़ार लौंडियां होंगी. फिर उसे बुराक़ पर सवार कराके पूछेगा ऐ रमज़ान अब तू क्या चाहता है. रमज़ान अर्ज़ करेगा कि इलाही इसे अपने पैग़म्बर के पड़ोस में जगह दे. तो अल्लाह तआला उसे फ़िरदौस में भेज देगा और इरशाद फ़रमाएगा कि ऐ रमज़ान अब क्या चाहता है. रमज़ान कहेगा कि इलाही तूने मेरी हाजत तो पूरी कर दी लेकिन इस शख्स का सवाब और इज्जत किधर है. चुनान्चे अल्लाह तआला उसे सुर्ख याकूत और सब्ज़ जबरजद के सौ शहर कि हर शहर में एक हज़ार महल होंगे और इनायत करेगा.

(तोहफ़तुल वाइज़ीन)

( 57 ) रोज़ा रखने की मन्नत मानी तो काम पूरा हो जाने के बाद उसका रखना वाजिब हो गया.

(कानूने शरीअत)

( 58 ) अगर किसी ने नफ़्ल रोज़ा रखकर तोड़ दिया तो अब उसकी क़ज़ा वाजिब है.

(क़ानूने शरीअत)

 

📚 क्या आप जानते हैं – तेरहवाँ अध्याय ६२७

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