Zakat (ज़कात) इस्लाम के पाँच बुनियादी अरकान में से तीसरा अज़ीम रुक्न है। यह हर उस मुसलमान मर्द व औरत पर फ़र्ज़ है जो साहिब-ए-निसाब हो। ज़कात का लफ़्ज़ी मायना पाकीज़गी और बढ़ोत्तरी है। जब एक मोमिन अपने माल में से अल्लाह के बताए हुए मुस्तहिक़ीन को उनका हक़ अदा करता है, तो उसका बाक़ी माल गुनाहों और मैल-कुचैल से पाक हो जाता है और उसमें बरकत नाज़िल होती है।
क़ुरआन मजीद में ज़कात की अहमियत
क़ुरआन-ए-पाक में अल्लाह तआला ने 82 मक़ामात पर नमाज़ के साथ मिलाकर ज़कात अदा करने का हुक्म फ़रमाया है:
وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ وَارْكَعُوا مَعَ الرَّاكِعِينَ
तर्जुमा: और नमाज़ क़ायम रखो और ज़कात अदा करो और रुकू करने वालों के साथ रुकू करो।
📖 हवाला: सूरह अल-बक़रह (2), आयत: 43
ज़कात किस पर फ़र्ज़ है? (शराइत-ए-वुजूब)
सुन्नी हनफ़ी फ़िक़्ह की मोतबर किताब बहारे शरीअत (हिस्सा 5) के मुताबिक़ ज़कात फ़र्ज़ होने के लिए इन 6 शर्तों का होना लाज़िमी है:
- मुसलमान होना: ग़ैर-मुस्लिम पर ज़कात फ़र्ज़ नहीं।
- आज़ाद होना: ग़ुलाम पर ज़कात नहीं।
- आक़िल व बालिग़ होना: हनफ़ी मज़हब में नाबालिग़ बच्चे और मजनून (पागल) के माल पर ज़कात फ़र्ज़ नहीं।
- मालिक-ए-निसाब होना: अपनी बुनियादी ज़रूरतों (हाजत-ए-अस्लिया) और कर्ज़ से ज़ाइद इतना माल होना जो साढ़े सात तोला सोने या साढ़े बावन तोला चाँदी की क़ीमत तक पहुँचे।
- माल का नामी (बढ़ने वाला) होना: माल हक़ीक़तन या हुकमन बढ़ने वाला हो, जैसे नक़द रक़म, सोना-चाँदी, माल-ए-तिजारत या चराई वाले मवेशी।
- एक साल गुज़रना (हौलान-ए-हौल): निसाब पर इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक़ पूरा एक क़मरी साल गुज़रना।
ज़कात के 8 मुस्तहिक़ीन (मसारिफ़-ए-ज़कात)
क़ुरआन मजीद की सूरह अत-तौबा की आयत 60 में अल्लाह तआला ने साफ़ फ़रमा दिया है कि ज़कात किन लोगों को दी जा सकती है:
| मसरफ़ (हक़दार) | शरई परिभाषा | वज़ाहत |
|---|---|---|
| 1. फ़क़ीर (Fuqara) | जिसके पास कुछ थोड़ा माल हो मगर निसाब से कम हो। | ज़कात का सबसे बड़ा हक़दार। |
| 2. मिस्कीन (Masakeen) | जिसके पास बिल्कुल कुछ न हो और खाने-पहनने का मुहताज हो। | फ़क़ीर से भी ज़्यादा मजबूर। |
| 3. आमिल (Amileen) | इस्लामी हुकूमत द्वारा ज़कात वसूलने पर तैनात कर्मचारी। | उनकी ख़िदमत के एवज़ दिया जाता है। |
| 4. मुअल्लफ़ातुल क़ुलूब | दिलों को इस्लाम की तरफ़ राग़िब करने के लिए (शुरूआती इस्लाम में)। | हनफ़ी फ़िक़्ह में अब यह हिस्सा साक़ित है। |
| 5. फ़िर-रिक़ाब (Fi-Riqab) | ग़ुलामों को आज़ादी दिलाने के लिए। | क़ैदी या ग़ुलाम की रिहाई। |
| 6. ग़ारिमीन (Gharimeen) | क़र्ज़दार जो कर्ज़ चुकाने की ताक़त न रखता हो। | उसका कर्ज़ उतारने में मदद करना। |
| 7. फ़ी सबीलिल्लाह | अल्लाह की राह में जिहाद करने वाले या ज़रूरतमंद तालिब-ए-इल्म। | दीनी तालीम हासिल करने वाले ग़रीब तलबा। |
| 8. इब्नुस-सबील (मुसाफ़िर) | सफ़र में बे-यारो-मददगार हुआ मुसाफ़िर चाहे घर पर मालदार हो। | घर पहुँचने के ख़र्च के लिए। |
किन लोगों को ज़कात देना हराम है?
इन 5 क़िस्म के लोगों को अपनी ज़कात देना शरीअत में हराम है:
- सय्यद और हाशमी ख़ानदान: हुज़ूर ﷺ की आल व औलाद (सय्यद और शरीफ़) को ज़कात देना हराम है। उनकी ख़िदमत अपने हलाल नफ़्ल माल और हदियों से करनी चाहिए।
- उसूल (माता-पिता, दादा-दादी): अपने वालिद, वालिदा, दादा, दादी, नाना, नानी को ज़कात नहीं दे सकते।
- फ़ुरूअ (औलाद व पोते-पोतियाँ): अपने बेटे, बेटी, पोते, पोती, नवासे, नवासी को ज़कात नहीं दे सकते।
- मियाँ-बीवी एक दूसरे को: शौहर बीवी को और बीवी शौहर को ज़कात नहीं दे सकती।
- ग़नी (मालदार) और ग़ैर-मुस्लिम: साहिब-ए-निसाब अमीर शख़्स को ज़कात देना जाइज़ नहीं।
सोने, चाँदी और तिजारती माल की ज़कात निकालने के लिए हमारा मक़ाला Sona Chandi OR Tijarat Ke Maal Ki Zakat और Bahar-e-Shariat ज़रूर देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1: Zakat न देने वाले का क़यामत में क्या अंजाम होगा?
क़ुरआन मजीद (सूरह अत-तौबा: 34-35) और हदीस-ए-पाक के मुताबिक़ जो लोग सोने-चाँदी का ख़ज़ाना जमा करते हैं और ज़कात नहीं देते, क़यामत के दिन उनके उस माल को जहन्नम की आग में तपाकर उनकी पेशानियों, पहलुओं और पीठों पर दागा जाएगा।
Q2: क्या अपने ग़रीब भाई या बहन को ज़कात दे सकते हैं?
हाँ, अपने ग़रीब सगे भाई, बहन, चाचा, फूफी, ख़ाला, मामूँ और दीगर क़रीबी रिश्तेदारों को ज़कात देना न सिर्फ़ जाइज़ है बल्कि दोहरा सवाब है — एक ज़कात अदा करने का और दूसरा सिला-ए-रहमी (रिश्तेदारों से भलाई) का।
Q3: क्या मस्जिद या मदरसे की तामीर (बिल्डिंग) में ज़कात का पैसा लगा सकते हैं?
नहीं, ज़कात की अदायगी के लिए किसी मुस्तहिक़ ग़रीब को मालिक बनाना (तमलीक) शर्त है। मस्जिद, मदरसा, अस्पताल या सड़क की तामीर में सीधे ज़कात का पैसा नहीं लग सकता। हाँ, मदरसे के ग़रीब तालिब-ए-इल्मों के खाने, किताबों और वज़ीफ़े में दी जा सकती है।
Q4: ज़कात का साल कब से गिना जाता है?
जिस दिन कोई शख़्स पहली बार निसाब का मालिक बना, उसी दिन से उसका साल शुरू होता है। जब अगले साल उसी इस्लामी तारीख़ पर वह दोबारा साहिब-ए-निसाब हो, तो उस पर मौजूद कुल माल की 2.5% ज़कात फ़ौरन वाजिब हो जाती है।
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