Skip to content
Roze Ke Jaruri Masail: रमज़ान के रोज़े के अहम फ़िक़्ही अहकाम व मसायल
Bahar E Shariat

Roze Ke Jaruri Masail: रमज़ान के रोज़े के अहम फ़िक़्ही अहकाम व मसायल

admin
admin
7 min read 108 views

Roze Ke Jaruri Masail (रोज़े के ज़रूरी मसाइल व अहकाम): रमज़ानुल मुबारक के मुक़द्दस महीने में रोज़े की सही अदायगी के लिए शरीअत के क़वाइद व मसायल से वाक़िफ़ होना हर मुसलमान मर्द व औरत पर लाज़िम है। रोज़े की नीयत कब तक हो सकती है, कौन से आमाल रोज़े में मकरूह हैं और किन बातों से रोज़ा बातिल हो जाता है—इन तमाम बुनियादी सवालात के मुकम्मल जवाबात सुन्नी हनफ़ी फ़िक़्ह और बहारे शरीअत (हिस्सा 5) के हवाले से यहाँ संकलित किए गए हैं।

Table of Contents

रोज़े की शरई परिभाषा और 3 दर्जे

सुन्नी हनफ़ी फ़िक़्ह की मोतबर किताब अल-जौहरतुन नय्यिरा के मुताबिक़ रोज़े का मतलब है: मुसलमान का इबादत की नीयत से सुब्ह सादिक़ से ग़ुरूब-ए-आफ़ताब तक अपने आप को जानबूझकर खाने, पीने और हमबिस्तरी से रोके रखना।

रोज़े के 3 रूहानी दर्जे:

  1. आम लोगों का रोज़ा (सौमुल उमूम): सिर्फ़ पेट और शर्मगाह को खाने, पीने और शहवत से रोकना।
  2. ख़ास लोगों का रोज़ा (सौमुल ख़ुसूस): पेट के साथ-साथ आँख, कान, ज़बान, हाथ, पाँव और तमाम आज़ा को गुनाहों (झूठ, ग़ीबत, चुग़ली, फ़ुहश) से बचाना।
  3. ख़ासुल-ख़ास का रोज़ा: दिल व दिमाग़ को अल्लाह के सिवा तमाम दुनियावी ख़्यालात से पाक करके पूरी तरह रब की याद में लीन कर देना।

रोज़े की 5 शरई क़िस्में

क़िस्म मिसालें शरई हुक्म
1. फ़र्ज़ रोज़ा रमज़ान के अदा रोज़े, छूटे हुए रोज़ों की क़ज़ा, और कफ़्फ़ारे के रोज़े। रखना लाज़िम, इंकार करने वाला काफ़िर।
2. वाजिब रोज़ा मन्नत (नज़्र) के रोज़े, और नफ़्ल रोज़ा रखकर तोड़ दिया हो तो उसकी क़ज़ा। अदा करना ज़रूरी है।
3. नफ़्ल व मुस्तहब आशूरा (10 मुहर्रम + 9वीं), अराफ़ा, अय्यामे बैज़ (13, 14, 15), पीर व जुमेरात। सवाब का काम, न रखने पर गुनाह नहीं।
4. मकरूह-ए-तनज़ीही सिर्फ़ जुमे या सिर्फ़ हफ़्ते के दिन का रोज़ा, सौम-ए-विसाल (बिना इफ़्तार लगातार रोज़ा)। बचना बेहतर है।
5. मकरूह-ए-तहरीमी (हराम) ईदुल फ़ित्र के दिन और अय्यामे तशरीक़ (10 से 13 ज़िलहिज्जा – बक़रईद के 4 दिन)। रोज़ा रखना गुनाह व मना है।

रोज़े की नीयत के अहम मसाइल

  1. नीयत का वक़्त: रमज़ान के रोज़े की नीयत रात से लेकर अगले दिन ज़वाल से पहले (दहवा-ए-कुबरा) तक किसी भी वक़्त की जा सकती है, बशर्ते सुब्ह सादिक़ के बाद जानबूझकर कुछ खाया-पिया न हो।
  2. ज़बान से कहना मुस्तहब है: दिल में इरादा होना असल शर्त है, लेकिन ज़बान से कह लेना मुस्तहब है: “नवैतु अन असूम ग़दन लिल्लाहि तआला मिन शहरि रमज़ान।”
  3. सहरी खाना भी नीयत है: अगर कोई शख़्स रात में सहरी खाने उठा, तो उसका सहरी खाना ही रोज़े की अमली नीयत माना जाएगा, जब तक कि उसका इरादा रोज़ा न रखने का न हो।
  4. हर दिन नई नीयत: रमज़ान के हर रोज़े के लिए अलग नीयत की ज़रूरत होती है। पहले दिन पूरे महीने की इकट्ठी नीयत सिर्फ़ पहले ही रोज़े के लिए काफ़ी होगी।

वे आमाल जो रोज़े की हालत में मकरूह हैं

  • बिला ज़रूरत किसी चीज़ को चबाना या ज़बान पर रखकर चखना और थूक देना (अगर शौहर बद-मिज़ाज हो तो औरत के लिए हांडी का नमक चख कर थूक देना जाइज़ है)।
  • टूथपेस्ट, मंजन या कोयला इस्तेमाल करना (मिस्वाक करना सुन्नत है)।
  • ग़ीबत करना, चुग़ली खाना, झूठ बोलना या गाली-गलौज करना (ये काम वैसे भी हराम हैं, रोज़े में इनकी वजह से रोज़े की रूहानियत ख़त्म हो जाती है)।
  • ऐसा कोई काम करना जिससे सख़्त कमज़ोरी आ जाए और रोज़ा तोड़ना पड़ जाए (जैसे भारी मशक़्क़त या कमज़ोरी में ख़ून का दान करना)।

📚 हवाला: बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफ़ा 95-110; दुर्रे मुख़्तार व रद्दुल मुहतार; व फ़तावा आलमगीरी।

सहरी व इफ़्तार की हदीसों के लिए हमारा लेख Sehri Aur Iftar Ki Hadees In Hindi और नमाज़ के तरीक़े के लिए Namaz Ka Tarika ज़रूर पढ़ें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1: Roze Ke Jaruri Masail में शक के दिन (यौमुश्शक) का क्या हुक्म है?

शाबान की 30वीं तारीख़ जब चाँद का पक्का सुबूत न हो, उसे ‘यौमुश्शक’ कहते हैं। उस दिन रमज़ान का समझकर रोज़ा रखना मकरूह-ए-तहरीमी है। अलबत्ता अगर कोई हमेशा नफ़्ल रोज़ा रखता हो तो ख़ालिस नफ़्ल की नीयत से रख सकता है।

Q2: क्या रोज़े में मुँह का थूक निगल सकते हैं?

हाँ, मुँह में बनने वाला अपना क़ुदरती थूक निगलना पूरी तरह जाइज़ है और इससे रोज़े पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

Q3: अगर किसी ने रोज़ा रखकर तोड़ दिया तो क्या हुक्म है?

अगर नफ़्ल रोज़ा रखकर तोड़ दिया तो सिर्फ़ उसकी क़ज़ा लाज़िम है। लेकिन रमज़ान का फ़र्ज़ रोज़ा जानबूझकर बिला उज़्र तोड़ा तो क़ज़ा के साथ 60 रोज़ों का कफ़्फ़ारा भी फ़र्ज़ होगा।

Q4: क्या रोज़ेदार औरत बच्चे के लिए खाना चबा सकती है?

अगर कोई दूसरा चारा न हो और बच्चा छोटा हो तो औरत के लिए खाना चबाकर बच्चे को खिलाना जाइज़ है, बशर्ते हलक़ में खाने का कोई हिस्सा न उतरे।

How useful was this post?

Click on a star to rate it!

0.0 out of 5 · 0 votes

No comments yet

Be the first to share your thoughts.

Leave a Comment

1-Click Google Verification to post comment:
To prevent spam, comments require a verified Google account (no password needed, only name & email).