इल्म-ए-दीन हासिल करना इस्लाम में सिर्फ़ एक ख़्वाहिश या फ़ज़ीलत का काम नहीं, बल्कि हर मुसलमान मर्द और औरत पर अल्लाह तआला का मुक़र्रर किया हुआ एक अज़ीम फ़र्ज़ है। आज के दौर में बहुत से लोग दुनियावी तालीम, डिग्री और रोज़गार की फ़िक्र में तो ज़िंदगी लगा देते हैं, लेकिन अपने दीन की बुनियादी बातों, पाकी-नापाकी, नमाज़ के फ़राइज़ और हलाल-ओ-हराम के इल्म से पूरी तरह बे-ख़बर रहते हैं। बिना सही इल्म के न तो नमाज़ सही हो सकती है, न वज़ू दुरुस्त हो सकता है और न ही इंसान गुनाहों से बच सकता है। आइए सहीह हदीस, क़ुरआन की आयतों और फ़िक़्ह-ए-हनफ़ी के हवाले से इल्म की अहमियत को आसान हिंदी में समझें।
“इल्म हासिल करना हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है” (हदीस शरीफ़)
हज़रत अनस बिन मालिक रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
तर्जुमा: “इल्म-ए-दीन हासिल करना हर मुसलमान (मर्द और औरत) पर फ़र्ज़ है।”
📚 हवाला: सुनन इब्ने माजा, मुक़द्दमा, हदीस: 224; बैहक़ी फ़ी शुअबिल ईमान (सनद सहीह)
क़ुरआन मजीद में आलिम और बे-इल्म का फ़र्क़
क़ुरआन मजीद की सूरह ज़ुमर में अल्लाह तआला इल्म वालों की बड़ाई बयान करते हुए फ़रमाता है:
तर्जुमा: “(ऐ नबी!) आप फ़रमा दीजिए: क्या इल्म वाले और बे-इल्म (अज्ञानी) बराबर हो सकते हैं? नसीहत तो वही हासिल करते हैं जो अक़्ल वाले हैं।”
📖 हवाला: सूरह अज़-ज़ुमर (39), आयत: 9
एक और मुक़ाम पर फ़रमाया कि अल्लाह के बंदों में से अल्लाह से सबसे ज़्यादा डरने वाले वही हैं जो इल्म वाले (उलमा) हैं (सूरह फ़ातिर: 28)।
कौन सा इल्म सीखना हर शख़्स पर ‘फ़र्ज़-ए-ऐन’ है?
फ़िक़्ह-ए-हनफ़ी की मशहूर किताब ‘दुर्रे मुख़्तार’ और ‘बहारे शरीअत’ में बयान किया गया है कि पूरा आलिम या मुफ़्ती बनना तो ‘फ़र्ज़-ए-किफ़ाया’ है, लेकिन रोज़मर्रा की ज़िंदगी के लिए ज़रूरी इल्म हासिल करना हर बालिग़ मुसलमान पर ‘फ़र्ज़-ए-ऐन’ है:
-
बुनियादी अक़ाइद का इल्म:
अल्लाह की वहदानियत, हुज़ूर ﷺ की ख़त्मे नुबुव्वत, फ़रिश्तों, किताबों और आख़िरत पर सही सुन्नी अक़ीदे का इल्म होना सबसे पहला फ़र्ज़ है।
-
तहारत (पाकी-नापाकी) का इल्म:
वुज़ू के 4 फ़र्ज़, ग़ुस्ल के 3 फ़र्ज़ और पाकी व नापाकी के मसाइल जानना, ताकि बदन और कपड़े नमाज़ के क़ाबिल रहें।
-
पाँचों वक़्त की नमाज़ के मसाइल:
नमाज़ की शर्तें, फ़राइज़, वाजिबात और नमाज़ किन चीज़ों से टूटती है, इसका सही इल्म होना फ़र्ज़ है।
-
हलाल व हराम की पहचान:
जो कारोबार, नौकरी या तिजारत इंसान करता है, उसमें हलाल क्या है और हराम (जैसे सूद, धोखा, झूठ) क्या है, उसका इल्म सीखना लाज़िम है।
-
हुक़ूक़ुल इबाद (रिश्तों के हक़):
माँ-बाप, बीवी, बच्चों और पड़ोसियों के क्या हुक़ूक़ हैं, इसका सही शरई इल्म होना ज़रूरी है।
इल्म की राह में चलने वाले के लिए जन्नत का आसान रास्ता
हज़रत अबू हुरैरा रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
“जो शख़्स इल्म हासिल करने के लिए किसी रास्ते पर चलता है, अल्लाह तआला उसके लिए जन्नत का रास्ता आसान फ़रमा देता है।”
📚 हवाला: सहीह मुस्लिम, किताबुज़ ज़िक्र वद-दुआ, हदीस: 2699
अबू दाऊद (हदीस: 3641) में फ़रमाया कि तालिबे इल्म की ख़ुशी के लिए फ़रिश्ते अपने पर बिछाते हैं, और पानी की मछलियाँ तक आलिम के लिए मग़्फ़िरत की दुआ करती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. क्या औरतों के लिए भी इल्म-ए-दीन सीखना फ़र्ज़ है?
जी हाँ, हदीस शरीफ़ में “कुल्लि मुस्लिम” (हर मुसलमान) का लफ़्ज़ आया है, जिसमें मर्द और औरत दोनों शामिल हैं। औरतों के लिए हैज़, निफ़ास, पाकी और पर्दा के मसाइल सीखना फ़र्ज़-ए-ऐन है।
2. अगर कोई बिना इल्म के नमाज़ पढ़ता रहे तो क्या नमाज़ होगी?
अगर किसी को नमाज़ के फ़राइज़ या वुज़ू के फ़राइज़ का इल्म न हो और अनजाने में कोई फ़र्ज़ छूट जाए, तो नमाज़ सिरे से अदा ही नहीं होगी। इसलिए पहले इल्म हासिल करना ज़रूरी है।
3. आलिम की इबादत करने वाले (आबिद) पर क्या फ़ज़ीलत है?
हदीस शरीफ़ में रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया कि आलिम की फ़ज़ीलत आबिद (महज़ इबादत करने वाले) पर ऐसी है जैसी चौदहवीं रात के चाँद की बाक़ी तमाम तारों पर होती है (अबू दाऊद: 3641)।
4. क्या दुनियावी तालीम हासिल करना इस्लाम में मना है?
नहीं, दुनियावी तालीम (साइंस, मेडिसिन, कंप्यूटर) सीखना जायज़ और मुफ़ीद है, बशर्ते कि वह इंसानियत की भलाई के लिए हो और फ़र्ज़ इल्म-ए-दीन को नज़रअंदाज़ न किया जाए।
पाकी के बुनियादी मसाइल के लिए ग़ुस्ल का सही तरीक़ा हिंदी में और नमाज़ की नीयत के लिए नमाज़ की नीयत का तरीक़ा ज़रूर पढ़ें।
Leave a Comment