वो बरेली का अहमद रज़ा है इमाम-ए-अहले सुन्नत, मुजद्दिदे दीनो मिल्लत आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान क़ादरी बरेलवी अलैहिर्रहमा की शान में पढ़ी जाने वाली एक बेहद मकबूल और रूह-परवर मनक़बत है। 14वीं सदी हिजरी के इस अज़ीम मुजद्दिद ने इश्क़-ए-रसूल ﷺ की वह शम्अ रौशन की जिसने पूरी दुनिया के मुसलमानों के ईमान को ताज़गी बख़्शी। इस मनक़बत के अशआर में आला हज़रत की विलादत (10 शव्वाल), आपकी इल्मी महारत और ग़ौस-ओ-ख़्वाजा से अक़ीदत का बड़ा दिलकश इज़हार किया गया है। आइए इस मुकम्मल मनक़बत और आला हज़रत की अज़ीम सीरत को आसान हिंदी में समझें।
वो बरेली का अहमद रज़ा है (मुकम्मल मनक़बत लिरिक्स)
ग़ौसे आज़म का दीवाना, वो है ख़्वाजा का मस्ताना
जो मुहम्मद ﷺ पे दिल से फ़िदा है, वो बरेली का अहमद रज़ा है
दसवीं तारीख़ थी, माहे शव्वाल था
घर तक़ी ख़ान के बेटा पैदा हुआ
नाम अहमद रज़ा जिस का रखा गया
आला हज़रत ज़माने का वो बन गया
वो मुजद्दिद ज़माने का निकला, दीन का हक़ अदा जिसने कर दिया
जो मुहम्मद ﷺ पे दिल से फ़िदा है, वो बरेली का अहमद रज़ा है
इल्मो हिकमत का दरिया बहाने लगा
सुन्नतों का चमन मुस्कुराने लगा
जो बद-मज़हब थे उनको भगाने लगा
हक़ का परचम ज़माने में लहराने लगा
जिसने लिखा फ़तावा रज़विया, इल्म का बागे गुलशन खिला दिया
जो मुहम्मद ﷺ पे दिल से फ़िदा है, वो बरेली का अहमद रज़ा है
जिसके शेरों में इश्क़े नबी की चमक
जिसके क़ौलों में सुन्नते पाक की महक
जिसने हमको सिखाया नबी का अदब
जिसका मशहूर है ‘मुस्तफ़ा जाने रहमत पे लाखों सलाम’
जो मुहम्मद ﷺ पे दिल से फ़िदा है, वो बरेली का अहमद रज़ा है
आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान की 4 अज़ीम इल्मी ख़िदमात
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फ़तावा रज़विया (30 ज़ख़ीम जिल्दें):
आला हज़रत का शाहकार फ़िक़्ही इनसाइक्लोपीडिया ‘अल-अताया अन-नबविय्या फ़िल-फ़तावा अर-रज़विया’ कुल 30 जिल्दों पर मुश्तमिल है, जिसमें हज़ारों पेचीदा शरई मसाइल का क़ुरआन व हदीस से अचूक हल दिया गया है।
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कन्ज़ुल ईमान (क़ुरआन मजीद का उर्दू तर्जुमा):
क़ुरआन मजीद का वह बे-मिसाल तर्जुमा जिसमें अल्लाह की वहदानियत और रसूलुल्लाह ﷺ की अज़मत व अदब का हर मुक़ाम पर कामिल लिहाज़ रखा गया है।
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हदायक़े बख़्शिश और सलातो सलाम:
आपका नातिया दीवान ‘हदायक़े बख़्शिश’ इश्क़े रसूल का शाहकार है। दुनिया भर में पढ़ा जाने वाला “मुस्तफ़ा जाने रहमत पे लाखों सलाम” आला हज़रत ही का तहरीर फ़रमूदा है।
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55 से ज़्यादा उलूम पर महारत:
हदीस, फ़िक़्ह, तफ़्सीर, रियाज़ी (Mathematics), फलकियात (Astronomy), मंतिक़ और साइंस समेत 55 से ज़्यादा उलूम पर आपने तक़रीबन 1000 किताबें तसनीफ़ फ़रमाईं।
इश्क़े मुस्तफ़ा ﷺ का आला मेयार
आला हज़रत अलैहिर्रहमा का पूरा जीवन नबी-ए-पाक ﷺ की मुहब्बत में डूबा हुआ था। आप फ़रमाते थे:
“अगर कोई मेरे दिल के दो टुकड़े कर दे, तो ब-ख़ुदा एक टुकड़े पर ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ और दूसरे टुकड़े पर ‘मुहम्मदुर रसूलुल्लाह’ लिखा हुआ पाएगा।”
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. आला हज़रत की पैदाइश कब और कहाँ हुई?
आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान की पैदाइश 10 शव्वालुल मुकर्रम 1272 हिजरी (14 जून 1856 ईसवी) को बरेली शरीफ़ (उत्तर प्रदेश, भारत) में हुई।
2. ‘मुस्तफ़ा जाने रहमत पे लाखों सलाम’ किसने लिखा?
यह आलमी शोहरत याफ़्ता सलातो सलाम आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी अलैहिर्रहमा ने लिखा है, जो हर मिलाद और महफ़िल में अक़ीदत से पढ़ा जाता है।
3. कन्ज़ुल ईमान की क्या ख़ासियत है?
कन्ज़ुल ईमान क़ुरआन मजीद का वह तर्जुमा है जिसमें तौहीद की पाकीज़गी और नबी-ए-करीम ﷺ की शान व अदब में कोई कोताही नहीं होने दी गई है।
4. क्या आला हज़रत 14वीं सदी के मुजद्दिद थे?
जी हाँ, हरमैन शरीफ़ैन (मक्का और मदीना) के अज़ीम उलमा ने आपको 14वीं सदी हिजरी का मुजद्दिद तस्लीम किया और आपकी इल्मी अज़मत की गवाही दी।
आला हज़रत के मुक़द्दस शजरे के कलाम के लिए या इलाही हर जगह तेरी अता का साथ हो और ग़ौस-ए-पाक की नियाज़ के लिए ग्यारहवीं शरीफ़ की हक़ीक़त पढ़ें।
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