ग्यारहवीं शरीफ़ क्या है और अहले सुन्नत व जमाअत में इसकी क्या अहमियत है, यह हर मुसलमान के लिए जानना बेहद ज़रूरी है। हर इस्लामी महीने की 11वीं तारीख़ को मुसलमान हुज़ूर ग़ौस-ए-आज़म शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी रदियल्लाहु अन्हु की याद में फ़ातिहा और ईसाले सवाब की महफ़िलें सजाते हैं, ग़रीबों और मिस्कीनों को खाना खिलाते हैं और क़ुरआन ख़्वानी करते हैं। कुछ लोग बिना शरई इल्म के इसे बिदअत या ग़लत समझने लगते हैं, जबकि हक़ीक़त यह है कि किसी नेक बुज़ुर्ग की रूह को सवाब पहुँचाना (ईसाले सवाब) सहीह अहादीस और क़ुरआन से साबित है। आइए ग्यारहवीं शरीफ़ की हक़ीक़त, इसके शरई सुबूत और फ़तावा रज़विया की रोशनी में इसे आसान हिंदी में समझें।
ग्यारहवीं शरीफ़ का लफ़्ज़ी व तारीखी पसमंज़र
हुज़ूर ग़ौस-ए-आज़म सैय्यिदिना शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी बग़दादी अलैहिर्रहमा (470–561 हिजरी) औलिया-ए-किराम के सरदार और इस्लाम के बहुत बड़े मुबल्लिग़ और आलिम थे। आपका विसाल 11 रबीउस सानी को हुआ था।
अहले मुहब्बत और मुरीदीन हर महीने की 11वीं तारीख़ को हुज़ूर ग़ौस-ए-पाक के नाम पर खाना, शीरीनी (मिठाई) पकाकर अल्लाह की राह में सदक़ा करते हैं और उसका सवाब आपकी बारगाह में पेश करते हैं। इसी मुनासबत से इसे ‘ग्यारहवीं शरीफ़’ कहा जाता है।
ईसाले सवाब का क़ुरआन व हदीस से पक्का सुबूत
ग्यारहवीं शरीफ़ का असल मक़सद ईसाले सवाब (सवाब पहुँचाना) और ग़रीबों को खाना खिलाना है। हदीस शरीफ़ में इसका वाज़ेह सुबूत मौजूद है:
“हज़रत साद बिन उबादा रदियल्लाहु अन्हु ने अर्ज़ किया: ‘या रसूलुल्लाह! मेरी माँ का इंतिक़ाल हो गया है, तो कौन सा सदक़ा सबसे अफ़ज़ल है?’ रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: ‘पानी।’ चुनाँचे उन्होंने एक कुआँ खुदवाया और फ़रमाया: ‘यह साद की वालिदा (के ईसाले सवाब) के लिए है।'”
📚 हवाला: सुनन अन-नसाई, किताबुल वसाया, हदीस: 3664; सुनन अबू दाऊद: 1681 (सनद हसन)
इस हदीस से साबित हुआ कि किसी मय्यत या बुज़ुर्ग के नाम पर सदक़ा करना और यह कहना कि “यह फुलाँ के लिए है”, सुन्नते सहाबा है।
खाना खिलाना और क़ुरआन पढ़ना शरीअत में अज़ीम सवाब
ग्यारहवीं शरीफ़ की महफ़िलों में दो बड़े नेक अमल किए जाते हैं:
-
इतामूत तआम (खाना खिलाना):
सहीह बुख़ारी (हदीस: 12) में रसूलुल्लाह ﷺ से पूछा गया कि इस्लाम में कौन सा अमल सबसे अच्छा है? आप ﷺ ने फ़रमाया: “तुम (भूखों को) खाना खिलाओ और हर एक को सलाम करो चाहे तुम उसे पहचानते हो या न पहचानते हो।”
-
तिलावते क़ुरआन और दरूद ओ सलाम:
सूरह फ़ातिहा, सूरह इख़्लास और दरूद शरीफ़ पढ़कर सवाब बख़्शना नेक काम है। जब क़ुरआन पढ़ना और खाना खिलाना दोनों नेकी हैं, तो इन्हें मिलाकर करने से कोई काम हराम कैसे हो सकता है?
-
तारीख़ मुक़र्रर करने की हिकमत:
किसी नेक काम के लिए कोई दिन या तारीख़ तय कर लेना (जैसे मदरसों, जलसों या ईसाले सवाब की तारीख़) सिर्फ़ सहूलत और याददिहानी के लिए होता है, शरीअत में इसकी मनाही नहीं है।
इमाम अहमद रज़ा ख़ान और शाह वलीउल्लाह देहलवी का मौक़िफ़
मुहद्दिस-ए-अकबर हज़रत शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी अलैहिर्रहमा अपनी किताब ‘ज़ुब्दतुल नसाइह’ में फ़रमाते हैं कि हमारे बुज़ुर्ग हज़रत ग़ौस-ए-आज़म के नाम की ग्यारहवीं शरीफ़ की नियाज़ बड़े एहतमाम से किया करते थे।
आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान अलैहिर्रहमा फ़तावा रज़विया (जिल्द 9) में फ़रमाते हैं कि नियाज़ व फ़ातिहा का खाना अल्लाह के नाम पर सदक़ा होता है और उसका सवाब हुज़ूर ग़ौस-ए-पाक और तमाम मोमिनीन की अरवाह को पहुँचाया जाता है, जो शरअन बिल्कुल जायज़ और बाइसे बरकत है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. क्या ग्यारहवीं शरीफ़ का खाना खाना जायज़ है?
जी हाँ, बिल्कुल जायज़ और बाइसे बरकत है। क्योंकि खाने पर अल्लाह ही का नाम लेकर क़ुरआन और फ़ातिहा पढ़ी जाती है और वह अल्लाह ही की राह का सदक़ा होता है।
2. क्या ग्यारहवीं सिर्फ़ 11 तारीख़ को ही की जा सकती है?
नहीं। ग्यारहवीं शरीफ़ का ईसाले सवाब महीने की किसी भी तारीख़, जुमेरात या जब भी सहूलत हो किया जा सकता है। 11 तारीख़ को सिर्फ़ ग़ौस-ए-आज़म की मुनासबत से तरजीह दी जाती है।
3. क्या ग़ैर-मुस्लिम या ग़रीब को नियाज़ का खाना दे सकते हैं?
जी हाँ, भूखे को खाना खिलाना इस्लाम में आम सदक़ा है। ग़रीबों, पड़ोसियों और हाजतंदों को खाना खिलाना बहुत बड़े सवाब का काम है।
4. क्या ईसाले सवाब से मुर्दों को वाक़ई फ़ायदा पहुँचता है?
अहले सुन्नत व जमाअत का पक्का अक़ीदा है कि ज़िंदों के सदक़ा, दुआ और क़ुरआन पढ़ने से मरहूमों को क़ब्र में राहत और दरजात की बुलंदी हासिल होती है (हदीस-ए-साद बिन उबादा)।
क़ब्र पर ईसाले सवाब के मसाइल के लिए क़ब्र पर अज़ान का सुबूत हिंदी में और शहादत के वाक़िए के लिए हज़रत इमाम हुसैन और वाक़िआ-ए-करबला ज़रूर पढ़ें।
Leave a Comment