हुज़ूर ऐसा कोई इंतिज़ाम हो जाए दुनिया भर के आशिक़ाने रसूल के दिलों में मदीना मुनव्वरा की तड़प जगाने वाली एक बेहद मकबूल और रूह-परवर नात शरीफ़ है। जब किसी बे-क़रार उम्मती का दिल मदीने की गलियों, सबज़ गुंबद और मुवाजिहा शरीफ़ की हाज़िरी के लिए मचल उठता है, तो उसकी ज़बान पर यही इल्तिजा जारी होती है कि “सलाम के लिए हाज़िर ग़ुलाम हो जाए।” इस नातिया कलाम के हर शेर में हुज़ूर सरवरे कायनात ﷺ की बारगाह-ए-अक़्दस में इस्तिक़बाल, शफ़ाअत और क़दमों में दम निकलने की आरज़ू की गई है। आइए इस मुकम्मल नात शरीफ़, इसके अशआर का तर्जुमा और मदीने की हाज़िरी के आदाब को समझें।
Table of Contents
- 1. हुज़ूर ऐसा कोई इंतिज़ाम हो जाए (मुकम्मल नात शरीफ़ लिरिक्स)
- 2. अशआर का आसान हिंदी तर्जुमा व मफ़हूम
- 3. मदीना मुनव्वरा की ज़ियारत की अज़ीम फ़ज़ीलत (हदीस शरीफ़)
- 4. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
- 4.1 1. ‘हुज़ूर ऐसा कोई इंतिज़ाम हो जाए’ के शायर कौन हैं?
- 4.2 2. ‘कासा-ए-दिल-ओ-जाँ’ का क्या मतलब है?
- 4.3 3. मदीना मुनव्वरा में हाज़िरी के क्या आदाब हैं?
- 4.4 4. क्या मदीने में मौत माँगना सुन्नत है?
हुज़ूर ऐसा कोई इंतिज़ाम हो जाए (मुकम्मल नात शरीफ़ लिरिक्स)
हुज़ूर ऐसा कोई इंतिज़ाम हो जाए
सलाम के लिए हाज़िर ग़ुलाम हो जाए
मैं सिर्फ़ देख लूँ एक बार सुब्ह-ए-तैबा को
क़ज़ा से फिर मेरी दुनिया में शाम हो जाए
तजल्लियात से भर लूँ मैं कासा-ए-दिल-ओ-जाँ
कभी जो उन की गली में क़याम हो जाए
हुज़ूर आप जो सुन लें तो बात बन जाए
हुज़ूर आप जो कह दें तो काम हो जाए
हुज़ूर आप जो चाहें तो बात कुछ भी नहीं
मुक़द्दर आशिक़-ए-ज़ार का तमाम हो जाए
मदीने जाऊँ फिर आऊँ मदीने फिर जाऊँ
इसी ख़याल में पैदा पयाम हो जाए
वो जिसके हाथ में कौसर का जाम है साक़ी
उसी के नाम ये मेरा भी जाम हो जाए
दुआ क़बूल हो शब्बीर बे-नवा की भी
शहे मदीना की चौखट पे शाम हो जाए
अशआर का आसान हिंदी तर्जुमा व मफ़हूम
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शेर 1: मुवाजिहा शरीफ़ पर हाज़िरी:
ऐ अल्लाह के प्यारे रसूल ﷺ! मेरे लिए ग़ैब से मदीना मुनव्वरा का ऐसा वसीला और इंतिज़ाम फ़रमा दीजिए कि यह नाचीज़ ग़ुलाम आपकी सुनहरी जाली के सामने हाज़िर होकर सलाम अर्ज़ कर सके।
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शेर 2: सुब्हे तैबा का दीदार और मौत:
काश मुझे मदीना शरीफ़ की एक सुब्ह का नूरानी दीदार नसीब हो जाए, उसके बाद अगर मौत (क़ज़ा) भी आ जाए तो मेरी ज़िंदगी का मक़सद पूरा हो जाएगा।
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शेर 4: हुज़ूर ﷺ की तवज्जोह की तासीर:
या रसूलुल्लाह! अगर आप मेरी फ़रियाद सुन लें तो बिगड़ी बन जाए, और अगर आप अपने लब-ए-मुबारक से मेरी बख़्शिश फ़रमा दें तो दोनों जहाँ का काम बन जाए।
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शेर 7: हौज़े कौसर की उम्मीद:
क़यामत के रोज़ जब हर तरफ़ नफ़्सा-नफ़्सी होगी, उस वक़्त कौसर के मालिक हुज़ूर अकरम ﷺ अपने दस्ते मुबारक से हमें जाम पिलाएँगे।
मदीना मुनव्वरा की ज़ियारत की अज़ीम फ़ज़ीलत (हदीस शरीफ़)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रदियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
“जिस शख़्स ने मेरी क़ब्र (रोज़ा-ए-मुबारक) की ज़ियारत की, उसके लिए मेरी शफ़ाअत वाजिब हो गई।”
📚 हवाला: सुनन दारक़ुतनी, किताबुल हज, हदीस: 2695; शुअबुल ईमान लिल-बैहक़ी: 4159 (सनद हसन)
एक और हदीस में फ़रमाया कि जिसने हज किया और मेरी ज़ियारत न की, उसने मुझ पर ज़ुल्म किया।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. ‘हुज़ूर ऐसा कोई इंतिज़ाम हो जाए’ के शायर कौन हैं?
यह मशहूर नातिया कलाम अज़ीम शाइरे अहले सुन्नत हज़रत शब्बीर हसन और दीगर अज़ीम शोअरा के कलाम से मंसूब है, जिसे आलमी शोहरत याफ़्ता सनाख़्वानों ने पढ़ा है।
2. ‘कासा-ए-दिल-ओ-जाँ’ का क्या मतलब है?
‘कासा’ का मतलब प्याला या कटोरा होता है। ‘कासा-ए-दिल’ का मतलब है दिल का प्याला, जिसे बंदा मदीने के अनवार-ओ-तजल्लियात से भरने की दुआ करता है।
3. मदीना मुनव्वरा में हाज़िरी के क्या आदाब हैं?
मदीने के हरम में निहायत अदब, आहिस्ता आवाज़, बा-वुज़ू होकर और कसरत से दरूद ओ सलाम पढ़ते हुए हाज़िर होना लाज़िम है।
4. क्या मदीने में मौत माँगना सुन्नत है?
जी हाँ, हज़रत उमर फ़ारूक़ रदियल्लाहु अन्हु यह दुआ माँगा करते थे: “ऐ अल्लाह! मुझे अपने रास्ते में शहादत अता फ़रमा और अपने रसूल के शहर (मदीना) में मौत नसीब फ़रमा” (सहीह बुख़ारी: 1890)।
हुज़ूर के चेहरे के नूरानी दीदार के लिए कुछ ऐसा करदे मेरे किर्दिगार नात शरीफ़ और शजरा शरीफ़ की नात के लिए या इलाही हर जगह तेरी अता का साथ हो पढ़ें।
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