सूरह फ़ील (Surah Fil / Al-Feel) क़ुरआन मजीद की 105वीं सूरह है। यह मक्की सूरह है, जिसमें 5 आयतें और 1 रुकूअ है। ‘फ़ील’ का अरबी में मतलब होता है ‘हाथी’। इस सूरह में यमन के ईसाई हाकिम अब्रहा अल-अशरम के लश्कर (असहाबे फ़ील) की तबाही का अज़ीम तारीखी वाक़िआ बयान किया गया है, जो हाथियों का बड़ा लश्कर लेकर खाना-ए-काबा को ढाने आया था। अल्लाह तआला ने उस ज़ालिम लश्कर पर छोटे-छोटे अबाबील परिंदों की फ़ौज भेजी, जिन्होंने कंकरियों की ऐसी मार मारी कि हाथियों का लश्कर खाये हुए भूसे (भूसे के टुकड़ों) की तरह पामाल हो गया। यह वाक़िआ हुज़ूर ﷺ की विलादत से ठीक 50-55 दिन पहले पेश आया था, जिसे अरब की तारीख़ में ‘आमुल फ़ील’ (हाथियों वाला साल) कहा जाता है।
| सूरह का नाम | नंबर | आयतें | पारा | नुज़ूल (स्थान) |
|---|---|---|---|---|
| सूरह अल-फ़ील (الفيل) | 105वीं | 5 आयतें | 30वाँ पारा (अम्म पारा) | मक्की |
सूरह फ़ील अरबी मतन, हिंदी उच्चारण और तर्जुमा (आयत दर आयत)
بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیْمِ
“अल्लाह के नाम से शुरू जो निहायत मेहरबान रहमत वाला।”
اَلَمْ تَرَ كَیْفَ فَعَلَ رَبُّكَ بِاَصْحٰبِ الْفِیْلِ ؕ ۱
हिंदी उच्चारण: अलम तरा कैफ़ा फ़अला रब्बुका बि-असहाबिल् फ़ील (1)
कन्ज़ुल ईमान तर्जुमा: ऐ महबूब! क्या तुमने न देखा तुम्हारे रब ने उन हाथी वालों का क्या हाल किया?
اَلَمْ یَجْعَلْ كَیْدَهُمْ فِیْ تَضْلِیْلٍ ۙ ۲
हिंदी उच्चारण: अलम यजअल कैदहुम फ़ी तज़लील (2)
कन्ज़ुल ईमान तर्जुमा: क्या उनके मक्र को तबाही में न डाला?
وَّاَرْسَلَ عَلَیْهِمْ طَیْرًا اَبَابِیْلَ ۙ ۳
हिंदी उच्चारण: व अर्सला अलैहिम तैरन अबाबील (3)
कन्ज़ुल ईमान तर्जुमा: और उन पर परिंदों के झुंड के झुंड भेजे।
تَرْمِیْهِمْ بِحِجَارَةٍ مِّنْ سِجِّیْلٍ ۪ ۙ ۴
हिंदी उच्चारण: तरमीहिम बिहिजारतिम मिन् सिज्जील (4)
कन्ज़ुल ईमान तर्जुमा: जो उन पर पक्की मिट्टी के पत्थर फेंकते थे।
فَجَعَلَهُمْ كَعَصْفٍ مَّاْكُوْلٍ ۵
हिंदी उच्चारण: फ़जअलहुम क-अस्फ़िम माकूल (5)
कन्ज़ुल ईमान तर्जुमा: तो उन्हें ऐसा कर डाला जैसे खाया हुआ भूसा।
असहाबे फ़ील और अब्रहा की तबाही का तारीखी वाक़िआ
यमन के हाकिम अब्रहा ने सनआ में एक बहुत बड़ा कलीसा (चर्च) बनाया जिसका नाम ‘क़ुलैस’ रखा। उसका इरादा था कि अरब के लोग खाना-ए-काबा का हज छोड़कर उसके चर्च में आएँ। जब अहले अरब ने इससे इंकार किया, तो ग़ुस्से में आकर उसने महमूद नामी बड़े हाथी समेत हाथियों की फ़ौज लेकर मक्का पर हमला करने की ठानी।
जब वह मक्का के क़रीब पहुँचा, तो हुज़ूर के दादा हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने कुरैश से फ़रमाया कि पहाड़ों पर चले जाओ, और काबा के दरवाज़े की ज़ंजीर पकड़कर दुआ की: “ऐ अल्लाह! बंदा अपने घर की हिफ़ाज़त करता है, तू अपने घर की हिफ़ाज़त फ़रमा।” फिर जब हाथी को काबा की तरफ़ बढ़ाया गया तो वह ज़मीन पर बैठ गया और आगे न बढ़ा, लेकिन जब यमन की तरफ़ मोड़ा जाता तो दौड़ने लगता। अचानक समंदर की तरफ़ से काले-काले परिंदों (अबाबील) के झुंड आए, हर परिंदे की चोंच में एक और दोनों पंजों में दो-दो कंकरी थीं। वे कंकरियाँ जिस सिपाही या हाथी के सर पर गिरतीं, वह जिस्म को चीरती हुई ज़मीन में धंस जातीं और लश्कर वहीं सड़-गलकर ख़ाक हो गया।
सूरह फ़ील से मिलने वाला सबक़ और फ़ज़ीलत
- अल्लाह का घर महफ़ूज़ है: दुनिया की कोई भी ताक़त खाना-ए-काबा को कोई नुक़सान नहीं पहुँचा सकती।
- तकब्बुर और ज़ुल्म का अंजाम: बड़ी से बड़ी फ़ौज और हथियारों का घमंड अल्लाह की कुदरत के सामने चींटी बराबर भी नहीं है।
- दुश्मनों के शर से हिफ़ाज़त: बुज़ुर्गों का तजरबा है कि ज़ालिम और मुहासिब दुश्मन के ज़ुल्म से बचने के लिए सूरह फ़ील का विर्द करना बेहद मुफ़ीद है।
सूरह क़ुरैश के लिए सूरह क़ुरैश हिंदी में, और जुमे की फ़ज़ीलत के लिए जुमे के दिन की अज़ीम फ़ज़ीलत पढ़ें।
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