गुरूर और तकब्बुर (घमंड) एक ऐसा बातिनी गुनाह है जो इंसान की तमाम नेकियों को बर्बाद कर देता है। जिस इंसान को अपने हुस्न, दौलत, ताक़त या ओहदे पर घमंड होता है, वह यह भूल जाता है कि यह तमाम नेमतें अल्लाह तआला की दी हुई अमानत हैं और एक दिन सब ख़ाक में मिल जाने वाला है।
इंसान को किस बात और किस चीज़ पर गुरूर है?
ऐ आदम और हव्वा की औलाद! ज़रा सोचो कि तुम्हें किस चीज़ पर नाज़ है? उस ख़ूबसूरत जिस्म पर जिसका अंजाम वक़्त गुज़रने के साथ ही मिट्टी का ढेर होना है? जिस ख़ूबसूरत चेहरे पर तुम इतराते हो, क्या पता कल बीमारी या बुढ़ापा उसे बदसूरत बना दे? बेशक अल्लाह तआला हर शै पर क़ादिर है।
क्या तुमने कभी अपने सेहतमंद और ख़ूबसूरत होने पर अल्लाह तआला का शुक्र अदा किया, या फिर अपने से कमतर दिखने वाले लोगों का मज़ाक़ उड़ाया? दुनिया में हर इंसान को अल्लाह सुब्हानहु व तआला ने पैदा फ़रमाया है। किसी की बनावट या ग़रीबी का मज़ाक़ उड़ाना दरअस्ल अल्लाह की तख़लीक़ पर ऐब लगाना है, जो सख़्त गुनाह-ए-कबीरा है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है: ‘और ज़मीन में अकड़ कर मत चल, बेशक न तू ज़मीन को फाड़ सकेगा और न हरगिज़ पहाड़ों की बुलंदी को पहुँच सकेगा।’ (सूरह अल-इसरा: 37)
क़ुरआन मजीद में गुरूर और तकब्बुर की मुमानअत
क़ुरआन-ए-पाक में अल्लाह तआला ने घमंड करने वालों को सख़्त नापसंद फ़रमाया है। हज़रत लुक़मान ने अपने बेटे को नसीहत करते हुए फ़रमाया था:
وَلَا تُصَعِّرْ خَدَّكَ لِلنَّاسِ وَلَا تَمْشِ فِي الْأَرْضِ مَرَحًا ۖ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ كُلَّ مُخْتَالٍ فَخُورٍ
तर्जुमा: और लोगों से अपना रुख़ न फेर और ज़मीन में इतराता हुआ न चल, बेशक अल्लाह किसी इतराने वाले बड़ाई मारने वाले को पसंद नहीं फ़रमाता।
📖 हवाला: सूरह लुक़मान (31), आयत: 18
हदीस-ए-पाक की रोशनी में तकब्बुर का अंजाम
प्यारे आक़ा हुज़ूर सय्यिदुल मुर्सलीन रसूलुल्लाह ﷺ ने गुरूर और घमंड के ख़िलाफ़ सख़्त ताकीद फ़रमाई है:
हदीस-ए-मुबारका:
“वह शख़्स जन्नत में दाख़िल नहीं होगा जिसके दिल में राई के दाने बराबर भी तकब्बुर (घमंड) होगा।”
📚 हवाला: सहीह मुस्लिम, किताबुल ईमान, हदीस: 91
सहाबा-ए-किराम ने अर्ज़ किया: “या रसूलुल्लाह ﷺ! इंसान चाहता है कि उसके कपड़े अच्छे हों और जूते अच्छे हों (क्या यह भी तकब्बुर है)?” आप ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
“अल्लाह जमील (ख़ूबसूरत) है और जमाल को पसंद फ़रमाता है। तकब्बुर तो हक़ बात को झुठलाना और लोगों को हक़ीर (कमतर) समझना है।” (सहीह मुस्लिम: 91)
इंसान की असलियत और ग़फ़लत का आईना
ज़रा तन्हाई में बैठकर अपने एक दिन के आमाल पर ग़ौर करें तो तमाम हक़ीक़त सामने आ जाएगी:
- सुबह की शुरुआत: आँख खुलते ही रब का शुक्र अदा करने और नमाज़-ए-फ़ज्र के लिए खड़े होने के बजाय हाथ मोबाइल पर जाता है।
- फ़र्ज़ से ग़फ़लत: दुनियावी मसरूफ़ियात को नमाज़ पर तरजीह दी जाती है और दिल में यह झूठी तसल्ली रखी जाती है कि ‘अल्लाह तो ग़फ़ूरुर्रहीम है, बख़्श देगा।’
- अल्लाह का क़हार होना: यह याद रखना चाहिए कि अल्लाह रहीम व करीम है, लेकिन वह ‘अल्-क़ह्हा़र’ और ‘ज़ुनतिक़ाम’ (अज़ाब नाज़िल फ़रमाने वाला) भी है।
- नेमतों की नाक़द्री: सेहत, दौलत और इज़्ज़त पाकर दूसरों पर हुक्म चलाना और उन्हें कमतर समझना इब्लीस का तरीक़ा है जिसने हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) के मुक़ाबले में ‘अना ख़ैरुन मिन्हु’ (मैं उससे बेहतर हूँ) कहा था।
घमंड और आजिज़ी में फ़र्क़ (तुलनात्मक चार्ट)
| सिफ़त | गुरूर व तकब्बुर (घमंड) | आजिज़ी व इनकिसारी (تواضع) |
|---|---|---|
| नतीजा | रुसवाई, ज़िल्लत और जहन्नम की आग | बुलंद दरजात और जन्नत की नेमतें |
| अल्लाह की बारगाह | अल्लाह घमंड करने वालों को नापसंद फ़रमाता है। | अल्लाह आजिज़ी करने वालों को इज़्ज़त देता है। |
| लोगों के साथ बर्ताव | दूसरों को नीचा दिखाना और हक़ बात न मानना | सबके साथ हुस्न-ए-अख़लाक़ और नर्मी से पेश आना |
अपने नफ़्स की इस्लाह और दीनी अहकाम की जानकारी के लिए हमारी गाइड Namaz Me Kitne Farz Hai और Bahar-e-Shariat का मुतालआ ज़रूर करें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1: इस्लामी शरीअत में गुरूर और तकब्बुर की क्या परिभाषा है?
सहीह मुस्लिम की हदीस (91) के मुताबिक़ तकब्बुर का मतलब है हक़ बात को क़बूल करने से इंकार करना और लोगों को अपने से कमतर व हक़ीर समझना। साफ़-सुथरे अच्छे कपड़े पहनना तकब्बुर नहीं है।
Q2: क्या गुरूर करने वाले की नमाज़ और इबादत क़बूल होती है?
अल्लाह तआला सिर्फ़ वही इबादत क़बूल फ़रमाता है जो ख़ालिस इख़्लास और आजिज़ी के साथ की जाए। अगर दिल में रियाकारी (दिखावा) और तकब्बुर हो तो वह अमल अल्लाह की बारगाह में रद्द हो जाता है।
Q3: इंसान अपने दिल से घमंड कैसे ख़त्म करे?
दिल से घमंड दूर करने के लिए अपनी पैदाइश की हक़ीक़त (पानी की एक बूँद और मिट्टी) और अपनी मौत व क़ब्र की तन्हाई को याद करें। हमेशा ग़रीबों, मिस्कीनों के साथ बैठें और सलाम में पहल करने की आदत डालें।
Q4: इब्लीस को बारगाह-ए-इलाही से क्यों निकाला गया था?
इब्लीस हज़ारों साल इबादत करने के बावजूद सिर्फ़ अपने तकब्बुर और घमंड की वजह से हमेशा के लिए मरदूद और लानती हो गया, क्योंकि उसने हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) को सज्दा करने से इंकार किया और ख़ुद को आग से बना होने के सबब बेहतर समझा।
Leave a Comment