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सूरह असर हिंदी में: वल-असर अरबी टेक्स्ट, कन्ज़ुल ईमान तर्जुमा और इंसानी कामयाबी के 4 उसूल
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सूरह असर हिंदी में: वल-असर अरबी टेक्स्ट, कन्ज़ुल ईमान तर्जुमा और इंसानी कामयाबी के 4 उसूल

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सूरह असर (Surah Asr / Al-Asr) क़ुरआन मजीद की 103वीं सूरह है। यह मक्की सूरह है, जिसमें 3 आयतें और 1 रुकूअ है। यह सूरह अल्फ़ाज़ के लिहाज़ से बहुत मुख़्तसर है, लेकिन अपने मानी और मफ़हूम के ऐतबार से क़ुरआन मजीद का एक अज़ीम निचोड़ (ख़ुलासा) है। इमाम शाफ़ई रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि “अगर लोग सिर्फ़ इस एक सूरह (सूरह असर) पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र कर लें, तो यही उनके दीन व दुनिया की हिदायत के लिए काफ़ी हो जाए।” इस सूरह में अल्लाह तआला ने ज़माने (वक़्त) की क़सम खाकर फ़रमाया है कि तमाम इंसान घाटे (नुक़सान) में हैं, सिवाए उन लोगों के जिनमें 4 ख़ास सिफ़ात मौजूद हों। आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान के कन्ज़ुल ईमान तर्जुमे के साथ यहाँ मुकम्मल सूरह दर्ज है।

सूरह का नाम नंबर आयतें पारा नुज़ूल (स्थान)
सूरह अल-असर (العصر) 103वीं 3 आयतें 30वाँ पारा (अम्म पारा) मक्की
Table of Contents

सूरह असर अरबी मतन, हिंदी उच्चारण और तर्जुमा (आयत दर आयत)

بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیْمِ ۝

“अल्लाह के नाम से शुरू जो निहायत मेहरबान रहमत वाला।”


وَالْعَصْرِ ۙ ۝۱

हिंदी उच्चारण: वल-असर (1)

कन्ज़ुल ईमान तर्जुमा: ज़माने-ए-महबूब की क़सम। (या उस वक़्त की क़सम)।

اِنَّ الْاِنْسَانَ لَفِیْ خُسْرٍ ۙ ۝۲

हिंदी उच्चारण: इन्नल इंसाना लफ़ी ख़ुस्र (2)

कन्ज़ुल ईमान तर्जुमा: बेशक आदमी ज़रूर नुक़सान में है।

اِلَّا الَّذِیْنَ اٰمَنُوْا وَعَمِلُوا الصّٰلِحٰتِ وَتَوَاصَوْا بِالْحَقِّ ۬ۙ وَتَوَاصَوْا بِالصَّبْرِ ۝۳

हिंदी उच्चारण: इल्लल्लज़ीना आमनू व अमिलुस सालिहाति व तवासौ बिल-हक़्क़ि व तवासौ बिस-सब्र (3)

कन्ज़ुल ईमान तर्जुमा: मगर जो ईमान लाए और अच्छे काम किए और एक दूसरे को हक़ की ताकीद की और एक दूसरे को सब्र की वसीयत की।

इंसानी नुक़सान से बचने के 4 सुनहरे उसूल

सूरह असर की तीसरी आयत में अल्लाह तआला ने घाटे से बचकर दोनों जहाँ में कामयाब होने के लिए चार शर्ते बयान फ़रमाई हैं:

  1. सच्चा ईमान (अल-ईमान): अल्लाह, उसके रसूलों, फ़रिश्तों, किताबों और आख़िरत पर बिना किसी शक के कामिल ईमान लाना।
  2. नेक आमाल (आमाल-ए-सालिहा): नमाज़, रोज़ा, ज़कात, हुक़ूक़ुल इबाद और सुन्नत पर पाबंदी से अमल करना। (देखें: नमाज़ का सही तरीक़ा)।
  3. हक़ की ताकीद (तवासी बिल-हक़): लोगों को भलाई, सच्चाई और शरीअत की दावत देना और बुराई से रोकना।
  4. सब्र की ताकीद (तवासी बिस-सब्र): दीन की राह में आने वाली मुश्किलात, बीमारियों और नफ़्स की ख़्वाहिशों के ख़िलाफ़ सब्र व इस्तिक़ामत इख़्तियार करना।

सहाबा-ए-किराम का मसनून अमल

🤝 सहाबा की मुबारक़ सुन्नत: हज़रत उबैदुल्लाह बिन हिस्न रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ‎ﷺ‎ के सहाबा में से जब दो साहिब आपस में मुलाक़ात फ़रमाते, तो उस वक़्त तक एक दूसरे से जुदा न होते जब तक कि एक दूसरे को सूरह असर (वल-असर) पढ़कर न सुना लेते, और फिर एक दूसरे को सलाम करके विदा होते।
📚 हवाला: अल-मुअजमुल औसत लित-तबरानी, हदीस: 5124; सुननुल बैहक़ी, शुअबुल ईमान

सूरह क़ुरैश के लिए सूरह क़ुरैश हिंदी में, और सब्र की दुआ के लिए बीमारी और मुसीबत के वक़्त सब्र पढ़ें।

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