तयम्मुम का तरीका सीखना हर मुसलमान मर्द और औरत के लिए लाज़िम है, क्योंकि इस्लाम एक आसान और रहमत वाला दीन है। जब पानी मौजूद न हो या पानी के इस्तेमाल से जान या सेहत को ख़तरा हो, तो अल्लाह तआला ने वज़ू और ग़ुस्ल दोनों के बदले पाक मिट्टी से पाकी हासिल करने की इजाज़त दी है। इसी पाक मिट्टी के ज़रिए पाकी हासिल करने को ‘तयम्मुम’ (Tayammum) कहा जाता है। सुन्नी हनफ़ी शरीअत और बहारे शरीअत की रोशनी में आइए जानते हैं कि तयम्मुम के 3 फ़र्ज़, नीयत और मुकम्मल स्टेप्स क्या हैं।
📖 हवाला: सूरह अन-निसा (4), आयत: 43 [कन्ज़ुल ईमान]
तयम्मुम कब जायज़ होता है? (शरई उज़्र)
तयम्मुम हर हाल में नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए इन सूरतों में से किसी एक का होना शर्त है:
- पानी की दूरी: नमाज़ी ऐसी जगह हो जहाँ से पानी कम से कम एक मील (लगभग 1.6 किलोमीटर) या उससे ज़्यादा दूर हो।
- बीमारी या जान का डर: पानी के इस्तेमाल से बीमारी बढ़ जाने, जान जाने या किसी अंग के बेकार हो जाने का पक्का अंदेशा हो।
- सख्त सर्दी का ख़तरा: इतनी सख्त सर्दी हो कि ठंडे पानी से नहाने पर जान जाने या फ़ालिज होने का डर हो और गर्म पानी का कोई इंतज़ाम न हो सके।
- दुश्मन या दरिंदे का डर: पानी के पास कोई ज़ालिम, दुश्मन, चोर या ख़तरनाक जानवर मौजूद हो।
- पानी की कमी (प्यास का ख़तरा): पानी इतना कम हो कि अगर उससे वज़ू या ग़ुस्ल कर लिया, तो ख़ुद या साथियों या जानवरों के प्यासे मरने का अंदेशा हो।
📚 हवाला: बहारे शरीअत, हिस्सा 2, सफ़ा 345
तयम्मुम के 3 फ़र्ज़ (जिनके बिना तयम्मुम नहीं होता)
तयम्मुम में कुल तीन फ़र्ज़ होते हैं:
1. नीयत करना
पाकी हासिल करने और नमाज़ को जायज़ करने का दिल में पक्का इरादा करना। (वज़ू में नीयत सुन्नत है, लेकिन तयम्मुम में नीयत करना फ़र्ज़ है; बिना नीयत मिट्टी फेरने से तयम्मुम नहीं होगा)।
2. पूरे चेहरे पर हाथ फेरना
दोनों हाथों को पाक मिट्टी पर मारकर पूरे चेहरे पर इस तरह फेरना कि पेशानी के बालों से लेकर ठोड़ी के नीचे तक और एक कान की लौ से दूसरे कान की लौ तक कोई जगह न छूटे।
3. कोहनियों समेत दोनों हाथों पर फेरना
दोबारा दोनों हाथों को मिट्टी पर मारकर दोनों हाथों पर उंगलियों के पोरों से लेकर कोहनियों समेत अच्छी तरह फेरना।
तयम्मुम की नीयत के अल्फ़ाज़
“नीयत की मैंने तयम्मुम करने की, नापाकी दूर करने और नमाज़ को जायज़ करने के लिए, वास्ते अल्लाह तआला के—बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम।”
तयम्मुम करने का मुकम्मल तरीक़ा (स्टेप-बाय-स्टेप)
- बिस्मिल्लाह व नीयत: दिल में तयम्मुम की नीयत करें और “बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम” कहें।
- पहला ज़र्ब (मिट्टी पर हाथ मारना): दोनों हाथों की उंगलियाँ फैलाकर पाक मिट्टी, रेत या पत्थर पर मारें। हाथों को आगे-पीछे हल्का सा घसीटें। अगर हाथों पर धूल ज़्यादा लग जाए तो एक बार ताली की तरह हल्का झाड़ लें।
- चेहरे पर मसह: दोनों हाथों की हथेलियों को पूरे चेहरे पर एक सिरे से दूसरे सिरे तक अच्छी तरह फेर लें।
- दूसरा ज़र्ब: दोबारा दोनों हाथों को पाक मिट्टी पर मारें और झाड़ लें।
- दाएँ हाथ का मसह: बाएँ हाथ की चार उंगलियों के अंदरूनी हिस्से को दाएँ हाथ की उंगलियों की पुश्त (पीठ) पर रखकर कलाई से होते हुए कोहनी तक ले जाएँ, फिर हथेली घुमाकर कोहनी के अंदरूनी हिस्से से कलाई तक लाएँ और अँगूठे से अँगूठे का मसह करें।
- बाएँ हाथ का मसह: इसी तरह दाएँ हाथ से बाएँ हाथ का उंगलियों से लेकर कोहनी समेत मसह करें। आख़िर में उंगलियों का ख़िलाल (आपस में उंगलियाँ फँसाना) करें।
किन चीज़ों से तयम्मुम किया जा सकता है?
तयम्मुम सिर्फ़ उन चीज़ों से जायज़ है जो ज़मीन की जिन्स (मिट्टी के वर्ग) से ताल्लुक़ रखती हों और आग में जलने से राख न बनती हों और न पिघलती हों:
- जायज़ चीज़ें: साफ़ मिट्टी, बालू (रेत), पत्थर, चूना, पक्की या कच्ची ईंट, संगमरमर, मिट्टी के बर्तन जिन पर रोग़न न चढ़ा हो।
- नाजायज़ चीज़ें: लकड़ी, कपड़ा, लोहा, ताँबा, प्लास्टिक, सोना, चाँदी या अनाज। इन चीज़ों से तयम्मुम जायज़ नहीं (हाँ, अगर इन पर धूल की मोटी परत जमी हो तो तयम्मुम हो जाएगा)।
तयम्मुम किन चीज़ों से टूटता है?
- जिन चीज़ों से वज़ू या ग़ुस्ल टूटता है, उन तमाम चीज़ों से तयम्मुम भी टूट जाता है।
- पानी मिल जाने और उसके इस्तेमाल पर क़ादिर हो जाने से तयम्मुम तुरंत ख़त्म हो जाता है।
- जिस बीमारी या मजबूरी की वजह से तयम्मुम किया था, उस बीमारी के ठीक हो जाने से तयम्मुम टूट जाता है।
विस्तार के लिए वज़ू का तरीक़ा, ग़ुस्ल का तरीक़ा, और नमाज़ का सही तरीक़ा ज़रूर पढ़ें।
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