Skip to content
क़ज़ा नमाज़ का सही तरीक़ा हिंदी में: फ़र्ज़, नीयत, हिसाब और मुकम्मल नियम
Islam

क़ज़ा नमाज़ का सही तरीक़ा हिंदी में: फ़र्ज़, नीयत, हिसाब और मुकम्मल नियम

admin
admin
9 min read 17 views

क़ज़ा नमाज़ का तरीका जानना हर मुसलमान के लिए निहायत ज़रूरी है, क्योंकि नमाज़ एक ऐसा फ़र्ज़ है जो किसी भी हालत में माफ़ नहीं होता। अगर कोई नमाज़ नींद, भूल-चूक या किसी ग़फ़लत की वजह से अपने मुक़र्ररा वक़्त पर न पढ़ी जा सके, तो वक़्त गुज़र जाने के बाद उसकी क़ज़ा अदा करना फ़र्ज़-ए-ऐन है। जब तक पिछली छूटी हुई नमाज़ें अदा न कर ली जाएँ, बंदे के ज़िम्मे क़र्ज़ बाक़ी रहता है। सुन्नी हनफ़ी शरीअत और बहारे शरीअत की रोशनी में आइए जानते हैं कि छूटी हुई नमाज़ों की क़ज़ा कैसे पढ़ी जाती है और उम्र भर की छूटी नमाज़ों का हिसाब कैसे किया जाता है।

🕌 अदा और क़ज़ा में बुनियादी फ़र्क़: किसी भी नमाज़ को उसके मुक़र्ररा शरई वक़्त के अंदर अदा करने को ‘अदा’ कहते हैं, और वक़्त गुज़र जाने के बाद पढ़ने को ‘क़ज़ा’ कहते हैं। जानबूझकर नमाज़ को क़ज़ा करना सख्त गुनाह-ए-कबीरा है, जिसके लिए क़ज़ा पढ़ने के साथ-साथ सच्ची तौबा भी लाज़िम है।

किन नमाज़ों की क़ज़ा पढ़ना फ़र्ज़ व वाजिब है?

शरीअत-ए-मुतह्हरा के मुताबिक़ हर दिन-रात में कुल 20 रकअतों की क़ज़ा अदा की जाती है:

  • 5 वक़्त के फ़र्ज़ (17 रकअत): फ़ज्र के 2 फ़र्ज़, ज़ोहर के 4 फ़र्ज़, अस्र के 4 फ़र्ज़, मग़रिब के 3 फ़र्ज़ और इशा के 4 फ़र्ज़। इनकी क़ज़ा फ़र्ज़ है।
  • इशा के 3 वित्र (3 रकअत): वित्र वाजिब हैं, इसलिए अगर इशा छूटे तो 4 फ़र्ज़ के साथ 3 रकअत वित्र की क़ज़ा पढ़ना भी वाजिब है।
  • सुन्नतों का हुक्म: सुन्नतों की आम तौर पर क़ज़ा नहीं होती। लेकिन अगर किसी दिन फ़ज्र की नमाज़ छूट जाए और उसी दिन ज़वाल (दोपहर 12 बजे) से पहले क़ज़ा पढ़ी जा रही हो, तो फ़ज्र की 2 सुन्नत भी फ़र्ज़ के साथ क़ज़ा पढ़ी जाएगी।

📚 हवाला: बहारे शरीअत, हिस्सा 4, सफ़ा 701

उम्र भर की छूटी नमाज़ों का हिसाब (क़ज़ा-ए-उम्री)

अगर किसी शख़्स की बरसों की नमाज़ें छूटी हुई हों, तो उसे मायूस होने के बजाय तुरंत क़ज़ा पढ़ना शुरू करना चाहिए:

  1. हिसाब का तरीक़ा: बालिग़ होने की तारीख़ (कम से कम 12 साल या ज़्यादा से ज़्यादा 15 साल की उम्र) से लेकर जिस दिन पाबंदी से नमाज़ शुरू की, उस दरमियान के कुल महीनों या सालों का अंदाज़ा लगाएँ। एहतियातन थोड़ी ज़्यादा गिनती मान लें ताकि कोई कमी न रहे।
  2. एक दिन की क़ज़ा: हर दिन की क़ज़ा में 20 रकअतें होती हैं (फ़ज्र के 2, ज़ोहर के 4, अस्र के 4, मग़रिब के 3, इशा के 4 और वित्र के 3)।
  3. रोज़ाना पढ़ने की आदत: हर रोज़ की फ़र्ज़ नमाज़ के साथ उस वक़्त की एक पुरानी क़ज़ा नमाज़ पढ़ लें (जैसे फ़ज्र के साथ एक पुरानी फ़ज्र, ज़ोहर के साथ पुरानी ज़ोहर)। इस तरह एक साल में पूरे एक साल की क़ज़ा आसानी से अदा हो जाएगी।

क़ज़ा नमाज़ की नीयत कैसे करें?

चूँकि छूटी हुई नमाज़ों की सही तारीख़ याद नहीं होती, इसलिए हनफ़ी फ़िक़्ह ने बहुत आसान और मुकम्मल नीयत सिखाई है:

फ़ज्र की क़ज़ा की नीयत: “नीयत की मैंने पहली फ़ज्र की जो मुझसे छूटी, उसकी 2 रकअत फ़र्ज़ क़ज़ा नमाज़, वास्ते अल्लाह तआला के, रुख़ मेरा काबा शरीफ़ की तरफ़—अल्लाहु अकबर।”

ज़ोहर / अस्र / इशा की नीयत: “नीयत की मैंने पहली ज़ोहर (या अस्र/इशा) की जो मुझसे छूटी, उसकी 4 रकअत फ़र्ज़ क़ज़ा नमाज़, वास्ते अल्लाह तआला के, रुख़ मेरा काबा शरीफ़ की तरफ़—अल्लाहु अकबर।”

वित्र की नीयत: “नीयत की मैंने पहले वित्र की जो मुझसे छूटे, उसकी 3 रकअत वित्र वाजिब क़ज़ा नमाज़, वास्ते अल्लाह तआला के, रुख़ मेरा काबा शरीफ़ की तरफ़—अल्लाहु अकबर।”

क़ज़ा नमाज़ जल्द अदा करने की शरई सहूलतें (आसानियाँ)

फ़िक़्ह-ए-हनफ़ी में जिस शख़्स के ज़िम्मे बहुत ज़्यादा नमाज़ें क़ज़ा हों, उसके लिए कुछ सहूलतें दी गई हैं ताकि वह नफ़्ल नमाज़ों के बजाय अपनी फ़र्ज़ क़ज़ा नमाज़ों को जल्दी मुकम्मल कर सके:

  • चार रकअत वाले फ़र्ज़ की तीसरी-चौथी रकअत: सिर्फ़ तीन बार “सुब्हानल्लाह” कह कर भी रुकूअ में जाया जा सकता है, या सिर्फ़ सूरह फ़ातिहा पढ़ी जा सकती है।
  • रुकूअ व सजदे की तस्बीह: तीन बार के बजाय कम से कम एक बार “सुब्हाना रब्बियल अज़ीम” और “सुब्हाना रब्बियल आला” कह लेना काफ़ी है।
  • क़ादा-ए-अख़ीरा: अत्तहिय्यात के बाद दुरूद शरीफ़ की जगह सिर्फ़ “अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिंव व आलिही” और दुआ की जगह सिर्फ़ “रब्बिग़फ़िर ली” कहकर सलाम फेरा जा सकता है।
  • वित्र में दुआ-ए-क़ुनूत: पूरी दुआ याद न हो तो तीन बार “अल्लाहुम्मग़फ़िर ली” या “रब्बना आतिना फ़िद्दुन्या हसनह…” पढ़ सकते हैं।

📚 फ़िक़्ही हवाला: रद्दुल मुहतार (फ़तावा शामी), जिल्द 2, सफ़ा 547

किन औक़ात में क़ज़ा नमाज़ पढ़ना हराम है?

क़ज़ा नमाज़ दिन-रात में कभी भी पढ़ी जा सकती है, सिवाय इन 3 मकरूह औक़ात के:

  • तुलू-ए-आफ़ताब (Sunrise): सुबह सूरज निकलते वक़्त से लेकर लगभग 20 मिनट बाद तक।
  • ज़वाल का वक़्त (Nisfun-Nahar): ठीक दोपहर जब सूरज आसमान के बीचों-बीच हो (ज़ोहर के वक़्त से 10 मिनट पहले तक)।
  • ग़ुरूब-ए-आफ़ताब (Sunset): शाम को सूरज डूबने से 20 मिनट पहले का वक़्त। (सिर्फ़ उसी दिन की अस्र की नमाज़ अगर बाक़ी हो तो डूबते वक़्त भी पढ़ सकते हैं, पुरानी क़ज़ा नहीं पढ़ सकते)।

क़ज़ा नमाज़ से जुड़े आम सवाल (FAQs)

1. क्या नफ़्ल नमाज़ पढ़ने से छूटी हुई फ़र्ज़ नमाज़ें माफ़ हो जाती हैं?

नहीं, नफ़्ल इबादत कभी फ़र्ज़ का मुक़ाबला नहीं कर सकती। जिसके ज़िम्मे फ़र्ज़ नमाज़ें बाक़ी हों, उसके लिए नफ़्ल नमाज़ों (तहज्जुद, इशराक़ आदि) के वक़्त में भी पुरानी क़ज़ा नमाज़ें अदा करना ज़्यादा अफ़ज़ल और लाज़िम है।

2. क्या क़ज़ा नमाज़ जमाअत से पढ़ी जा सकती है?

हाँ, अगर कई लोगों की एक ही दिन की एक ही नमाज़ छूटी हो (जैसे सफ़र में फ़ज्र छूट गई), तो वे जमाअत के साथ क़ज़ा अदा कर सकते हैं। लेकिन अगर सबकी अलग-अलग दिनों की नमाज़ें हों, तो अकेले ही पढ़नी होगी।

3. क्या दूसरों के सामने ज़िक्र करना चाहिए कि मेरी नमाज़ें क़ज़ा हैं?

नहीं, नमाज़ का क़ज़ा होना गुनाह है और अपने गुनाहों का इज़हार दूसरों के सामने करना मना है। क़ज़ा नमाज़ अपने घर में या तन्हाई में छुपकर पढ़नी चाहिए।

नमाज़ के मुकम्मल बुनियादी तरीक़े के लिए नमाज़ का सही तरीक़ा हिंदी में, सुबह की नमाज़ के लिए फ़ज्र की नमाज़ का तरीक़ा, और नीयत के लिए नमाज़ की नीयत का तरीक़ा पढ़ें।

How useful was this post?

Click on a star to rate it!

0.0 out of 5 · 0 votes

No comments yet

Be the first to share your thoughts.

Leave a Comment

1-Click Google Verification to post comment:
To prevent spam, comments require a verified Google account (no password needed, only name & email).