सूरह क़ाफ़ (Surah Qaf) क़ुरआन मजीद की 50वीं मक्की सूरह है जिसमें 3 रुकूअ और 45 आयतें हैं। यह सूरह 26वें पारे में मौजूद है। यह सूरह ‘हुरूफ़-ए-मुक़त्तआत’ में से हर्फ़ ‘क़ाफ़’ (ق) से शुरू होती है। सरकार-ए-दो आलम मुहम्मद ﷺ को इस सूरह से ख़ास मुहब्बत थी और आप जुमुआ के ख़ुत्बे और ईद की नमाज़ों में कसरत से इसकी तिलावत फ़रमाया करते थे। इस मुक़द्दस सूरह में मरने के बाद दोबारा ज़िंदा होने की हक़ीक़त, सकरात-ए-मौत (मौत की बेहोशी), किरामन कातेबीन और सबसे मशहूर आयत—अल्लाह इंसान की शह-रग से भी ज़्यादा क़रीब है—का ऐसा पुर-असर बयान है जो दिलों को हिला कर रख देता है।
अल्लाह इंसान की शह-रग से भी ज़्यादा क़रीब है
सूरह क़ाफ़ की आयत 16 में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने अपने इल्म और क़ुर्ब का एलान फ़रमाया:
وَلَقَدْ خَلَقْنَا الْإِنسَانَ وَنَعْلَمُ مَا تُوَسْوِسُ بِهِ نَفْسُهُ ۖ وَنَحْنُ أَقْرَبُ إِلَيْهِ مِنْ حَبْلِ الْوَرِيدِ
तर्जुमा (कंज़ुल ईमान): “और बेशक हमने आदमी को पैदा किया और हम जानते हैं जो वसवसा उसका नफ़्स डालता है; और हम उसकी शह-रग (गर्दन की ख़ास नस) से भी ज़्यादा उससे नज़दीक हैं।”
📖 हवाला: सूरह क़ाफ़ (50), आयत: 16; तफ़्सीर ख़ज़ाइनुल इरफ़ान
अहले सुन्नत के मुफ़स्सिरीन फ़रमाते हैं कि ‘हबलिल वरीद’ (शह-रग) कट जाए तो इंसान की ज़िंदगी ख़त्म हो जाती है। अल्लाह का इल्म और उसकी क़ुदरत इंसान से इतनी क़रीब है कि दिल में पैदा होने वाले ख़यालात भी उससे छुपे नहीं रह सकते।
सूरह क़ाफ़ की अज़ीम सुन्नतें व फ़ज़ीलत (सहीह मुस्लिम हदीस)
सहीह मुस्लिम में हज़रत उम्म-ए-हिशाम बिन्ते हारिसा رضي الله عنها फ़रमाती हैं:
हदीस शरीफ़: “मैंने सूरह ‘क़ाफ़ वल-क़ुरआनिल मजीद’ रसूलुल्लाह ﷺ की ज़बान-ए-मुबारक से सुन-सुन कर ही याद की थी, क्योंकि आप हर जुमुआ को मिंबर पर ख़ुत्बे के दौरान इसकी तिलावत फ़रमाया करते थे।”
📚 हवाला: सहीह मुस्लिम, किताबुल जुमुआ, हदीस: 873; बहारे शरीअत, हिस्सा 4
हुज़ूर ﷺ जुमुआ के दिन सूरह क़ाफ़ इसलिए पढ़ते थे ताकि इसमें मौजूद मौत, क़ब्र, हश्र और जन्नत-ओ-दोज़ख़ की याद सुनकर लोगों के दिल नर्म हों और वे गुनाहों से तौबा करें।
सूरह क़ाफ़: मुकम्मल अरबी मतन व कंज़ुल ईमान हिंदी तर्जुमा
सूरए क़ाफ़ मक्के में उतरी. इसमें तीन रूकू, पैंतालीस आयतें, तीन सौ सत्तावन कलिमे और एक हज़ार चार सौ चौरानवे अक्षर हैं.
50 सूरए क़ाफ़ – -पहला रूकू
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
50|1| ق ۚ وَالْقُرْآنِ الْمَجِيدِ
50|2|بَلْ عَجِبُوا أَن جَاءَهُم مُّنذِرٌ مِّنْهُمْ فَقَالَ الْكَافِرُونَ هَٰذَا شَيْءٌ عَجِيبٌ
50|3|أَإِذَا مِتْنَا وَكُنَّا تُرَابًا ۖ ذَٰلِكَ رَجْعٌ بَعِيدٌ
50|4|قَدْ عَلِمْنَا مَا تَنقُصُ الْأَرْضُ مِنْهُمْ ۖ وَعِندَنَا كِتَابٌ حَفِيظٌ
50|5|بَلْ كَذَّبُوا بِالْحَقِّ لَمَّا جَاءَهُمْ فَهُمْ فِي أَمْرٍ مَّرِيجٍ
50|6|أَفَلَمْ يَنظُرُوا إِلَى السَّمَاءِ فَوْقَهُمْ كَيْفَ بَنَيْنَاهَا وَزَيَّنَّاهَا وَمَا لَهَا مِن فُرُوجٍ
50|7|وَالْأَرْضَ مَدَدْنَاهَا وَأَلْقَيْنَا فِيهَا رَوَاسِيَ وَأَنبَتْنَا فِيهَا مِن كُلِّ زَوْجٍ بَهِيجٍ
50|8|تَبْصِرَةً وَذِكْرَىٰ لِكُلِّ عَبْدٍ مُّنِيبٍ
50|9|وَنَزَّلْنَا مِنَ السَّمَاءِ مَاءً مُّبَارَكًا فَأَنبَتْنَا بِهِ جَنَّاتٍ وَحَبَّ الْحَصِيدِ
50|10|وَالنَّخْلَ بَاسِقَاتٍ لَّهَا طَلْعٌ نَّضِيدٌ
50|11|رِّزْقًا لِّلْعِبَادِ ۖ وَأَحْيَيْنَا بِهِ بَلْدَةً مَّيْتًا ۚ كَذَٰلِكَ الْخُرُوجُ
50|12|كَذَّبَتْ قَبْلَهُمْ قَوْمُ نُوحٍ وَأَصْحَابُ الرَّسِّ وَثَمُودُ
50|13|وَعَادٌ وَفِرْعَوْنُ وَإِخْوَانُ لُوطٍ
50|14|وَأَصْحَابُ الْأَيْكَةِ وَقَوْمُ تُبَّعٍ ۚ كُلٌّ كَذَّبَ الرُّسُلَ فَحَقَّ وَعِيدِ
50|15|أَفَعَيِينَا بِالْخَلْقِ الْأَوَّلِ ۚ بَلْ هُمْ فِي لَبْسٍ مِّنْ خَلْقٍ جَدِيدٍ
सूरए क़ाफ़ मक्के में उतरी, इसमें तीन रूकू हैं,
-पहला रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए क़ाफ़ मक्के में उतरी. इसमें तीन रूकू, पैंतालीस आयतें, तीन सौ सत्तावन कलिमे और एक हज़ार चार सौ चौरानवे अक्षर हैं.
क़ाफ़ {1} इज़्ज़त वाले क़ुरआन की क़सम (2){2}
(2) हम जानते हैं कि मक्के के काफ़िर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान नहीं लाए.
बल्कि उन्हें इसका अचंभा हुआ कि उनके पास उन्हीं में का एक डर सुनाने वाला तशरीफ़ लाया(3)
(3) जिसकी अदालत और अमानत और सच्चाई और रास्तबाज़ी को वो ख़ूब जानते हैं और यह भी उनके दिमाग़ में बैठा हुआ है कि ऐसी विशेषताओ वाला व्यक्ति सच्ची नसीहत करने वाला होता है. इसके बावुजूद उनका सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत और हुज़ूर के अन्दाज़ में तअज्जुब और इन्कार करना आश्चर्यजनक है.
तो काफ़िर बोले यह तो अजीब बात है {3} क्या जब हम मर जाएं और मिट्टी हो जाएंगे फिर जियेंगे यह पलटना दूर है (4)
(4) उनकी इस बात के रद और जवाब में अल्लाह तआला फ़रमाता है.
हम जानते हैं जो कुछ ज़मीन उनमें से घटाती है(5)
(5) यानी उनके जिस्म के जो हिस्से गोश्त ख़ून हडिडयाँ वग़ैरह ज़मीन खा जाती है उनमें से कोई चीज़ हमसे छुपी नहीं, तो हम उनको वैसा ही ज़िन्दा करने पर क़ादिर हैं जैसे कि वो पहले थे.
और हमारे पास एक याद रखने वाली किताब है (6){4}
(6) जिसमें उनके नाम, गिन्ती और जो कुछ उनमें से ज़मीन ने ख़ाया सब साबित और लिखा हुआ और मेहफ़ूज़ है.
बल्कि उन्होंने हक़ (सत्य) को झुटलाया (7)
(7) बग़ैर सोचे समझे, और हक़ से या मुराद नबुव्वत है जिसके साथ खुले चमत्कार हैं या क़ुरआने मजीद.
जब वह उनके पास आया तो वह एक मुज़तरिब बेसबात बात में हैं (8){5}
(8) तो कभी नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को शायर, कभी जादूगर, कभी तांत्रिक और इसी तरह क़ुरआन शरीफ़ को शेअर, जादू और तंत्रविद्या कहते हैं. किसी एक बात पर क़रार नहीं.
तो क्या उन्होंने अपने ऊपर आसमान को न देखा(9)
(9) देखने वाली आँख और मानने वाली नज़र से कि उसकी आफ़रीनश (उत्पत्ति या पैदाइश) मैं हमारी क़ुदरत के आसार नुमायाँ हैं.
हमने उसे कैसा बनाया(10)
(10) बग़ैर सुतून के बलन्द किया.
और संवारा(11)
(11) सितारे किये रौशन ग्रहों से.
और उसमें कहीं रखना नहीं(12){6}
(12) कोई दोष और क़ुसूर नहीं.
और ज़मीन को हम ने फ़ैलाया(13)
(13) पानी तक.
और उसमें लंगर डाले(14)
(14)पहाड़ों के कि क़ायम रहे.
और उसमें हर रौनक वाला जोड़ा उगाया {7} सूझ और समझ(15)
(15) कि उससे बीनाई और नसीहत हासिल हो.
हर रूजू वाले बन्दे के लिये(16){8}
(16) जो अल्लाह तआला की बनाई हुई चीज़ों में नज़र करके उसकी तरफ़ रूजू हो.
और हमने आसमान से बरकत वाला पानी उतारा(17)
(17)यानी बारिश जिससे हर चीज़ की ज़िन्दगी और बहुत ख़ैरो बरकत है.
तो उससे बाग़ उगाए और अनाज कि काटा जाता है(18){9}
(18) तरह तरह का गेंहूँ जौ चना वग़ैरह.
और ख़जूर के लम्बे दरख़्त जिन का पक्का गाभा{10} बन्दों की रोज़ी के लिये और हमने उस (19)
(19)बारिश के पानी.
से मुर्दा शहर जिलाया(20)
(20) जिसकी वनस्पति सूख चुकी थी फिर उसको हरा भरा कर दिया.
यूंही क़ब्रों से तुम्हारा निकलना है(21){11}
(21) तो अल्लाह तआला की क़ुदरत के आसार देख कर मरने के बाद फिर ज़िन्दा होने का क्यों इन्कार करते हो.
उनसे पहले झुटलाया(22)
(22) रसूलों को.
नूह की क़ौम और रस वालों(23)
(23) रस्स का एक कुँवा है जहाँ ये लोग अपने मवेशी के साथ ठहरे हुए थे और बुतों को पूजते थे. यह कुँआ ज़मीन में धँस गया और उसके क़रीब की ज़मीन भी. ये लोग और उनके अमवाल उसके साथ धँस गए.
और समूद {12} और आद और फ़िरऔन और लूत के हमक़ौमों {13} और बन वालों और तुब्बा की क़ौम ने(24)
(24) उन सब के तज़किरे सूरए फ़ुरक़ान व हिजर और दुख़ान में गुज़र चुके.
उनसे हर एक ने रसूलों को झुटलाया तो मेरे अज़ाब का वादा साबित हो गया(25){14}
(25) इसमें सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली और क़ुरैश को चेतावनी है. नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से फ़रमाया गया है कि आप क़ुरैश के कुफ़्र से तंग दिल न हों, हम हमेशा रसूलों की मदद फ़रमाते और उनके दुश्मनों पर अज़ाब करते रहे हैं. इसके बाद दोबारा ज़िन्दा किये जाने का इन्कार करने वालों का जवाब इरशाद होता है.
तो क्या हम पहली बार बनाकर थक गए (26)
(26) जो दोबारा पैदा करना हमें दूश्वार हो. इसमें दोबारा ज़िन्दा किये जाने का इन्कार करने वालों की जिहालत का इज़हार है कि इस इक़रार के बावुजूद कि सृष्टि अल्लाह तआला ने पैदा की, उसके दोबारा पैदा करने को असम्भव समझते हैं.
बल्कि वो नए बनने से (27)
(27) यानी मौत के बाद पैदा किये जाने से.
शुबह में हैं {15}
50 सूरए क़ाफ़ -दूसरा रूकू
50|16|وَلَقَدْ خَلَقْنَا الْإِنسَانَ وَنَعْلَمُ مَا تُوَسْوِسُ بِهِ نَفْسُهُ ۖ وَنَحْنُ أَقْرَبُ إِلَيْهِ مِنْ حَبْلِ الْوَرِيدِ
50|17|إِذْ يَتَلَقَّى الْمُتَلَقِّيَانِ عَنِ الْيَمِينِ وَعَنِ الشِّمَالِ قَعِيدٌ
50|18|مَّا يَلْفِظُ مِن قَوْلٍ إِلَّا لَدَيْهِ رَقِيبٌ عَتِيدٌ
50|19|وَجَاءَتْ سَكْرَةُ الْمَوْتِ بِالْحَقِّ ۖ ذَٰلِكَ مَا كُنتَ مِنْهُ تَحِيدُ
50|20|وَنُفِخَ فِي الصُّورِ ۚ ذَٰلِكَ يَوْمُ الْوَعِيدِ
50|21|وَجَاءَتْ كُلُّ نَفْسٍ مَّعَهَا سَائِقٌ وَشَهِيدٌ
50|22|لَّقَدْ كُنتَ فِي غَفْلَةٍ مِّنْ هَٰذَا فَكَشَفْنَا عَنكَ غِطَاءَكَ فَبَصَرُكَ الْيَوْمَ حَدِيدٌ
50|23|وَقَالَ قَرِينُهُ هَٰذَا مَا لَدَيَّ عَتِيدٌ
50|24|أَلْقِيَا فِي جَهَنَّمَ كُلَّ كَفَّارٍ عَنِيدٍ
50|25|مَّنَّاعٍ لِّلْخَيْرِ مُعْتَدٍ مُّرِيبٍ
50|26|الَّذِي جَعَلَ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ فَأَلْقِيَاهُ فِي الْعَذَابِ الشَّدِيدِ
50|27|۞ قَالَ قَرِينُهُ رَبَّنَا مَا أَطْغَيْتُهُ وَلَٰكِن كَانَ فِي ضَلَالٍ بَعِيدٍ
50|28|قَالَ لَا تَخْتَصِمُوا لَدَيَّ وَقَدْ قَدَّمْتُ إِلَيْكُم بِالْوَعِيدِ
50|29|مَا يُبَدَّلُ الْقَوْلُ لَدَيَّ وَمَا أَنَا بِظَلَّامٍ لِّلْعَبِيدِ
और बेशक हमने आदमी को पैदा किया और हम जानते हैं जो वसवसा उसका नफ़्स डालता है(1)
(1) हमसे उसके भेद और अन्दर की बातें छुपी नहीं.
और हम दिल की रग से भी उससे ज़्यादा नज़्दीक़ हैं(2){16}
(2) यह भरपूर इल्म का बयान है कि हम बन्दे के हाल को ख़ुद उससे ज़्यादा जानने वाले हैं. वरीद वह रग है जिसमें ख़ून जारी होकर बदन के हर हर अंग में पहुंचता है. यह रग गर्दन में है. मानी ये हैं कि इन्सान के अंग एक दूसरे से पर्दे में हैं मगर अल्लाह तआला से कोई चीज़ पर्दे में नहीं.
जब उससे लेते हैं दो लेने वाले(3)
(3) फ़रिश्ते, और वो इन्सान का हर काम और उसकी हर बात लिखने पर मुक़र्रर हैं.
एक दाएं बैठा और एक बाएं(4){17}
(4) दाईं तरफ़ वाला नेकियाँ लिखता है और बाई तरफ़ वाला गुनाह. इसमें इज़हार है कि अल्लाह तआला फ़रिश्तों के लिखने से भी ग़नी है, वह छुपी से छुपी बात का जानने वाला है. दिल के अन्दर की बात तक उससे छुपी नहीं है. फ़रिश्तों का लिखना तो अल्लाह तआला की हिकमत का एक हिस्सा है कि क़यामत के दिन हर व्यक्ति का कर्म लेखा या नामए अअमाल उसके हाथ में दे दिया जाएगा.
कोई बात वह ज़बान से नहीं निकालता कि उसके पास एक मुहाफ़िज़ तैयार न बैठा हो(5){18}
(5) चाहे वह कहीं हो सिवाए पेशाब पाख़ाना या हमबिस्तरी करते समय के. उस वक़्त ये फ़रिश्ते आदमी के पास हट जाते हैं. इन दोनों हालतों में आदमी को बात करना जायज़ नहीं ताकि उसके लिखने के लिये फ़रिश्तों को उस हालत में उससे क़रीब होने की तकलीफ़ न हो. ये फ़रिश्ते आदमी की हर बात लिखते हैं बीमारी का कराहना तक. और यह भी कहा गया है कि सिर्फ़ वही चीज़ें लिखते हैं जिन में अज्र व सवाब या गिरफ़्त और अज़ाब हो. इमाम बग़वी ने एक हदीस रिवायत की है कि जब आदमी एक नेकी करता है तो दाई तरफ़ वाला फ़रिश्ता दस लिखता है, और जब बदी करता है तो दाई तरफ़ वाला फ़रिश्ता बाईं तरफ़ वाले फ़रिश्ते से कहता है कि अभी रूका रह कि शायद यह व्यक्ति इस्तिग़फ़ार कर ले. मौत के बाद उठाए जाने का इन्कार करने वालों का रद फ़रमाने और अपनी क़ुदरत व इल्म से उन पर हुज्जतें क़ायम करने के बाद उन्हें बताया जाता है कि वो जिस चीज़ का इन्कार करते हैं वह जल्द ही उनकी मौत और क़यामत के वक़्त पेश आने वाली है और भूतकाल से उनकी आमद की ताबीर फ़रमाकर उसके क़ुर्ब का इज़हार किया जाता है चुनांन्चे इरशाद होता है.
और आई मौत की सख़्ती (6)
(6) जो अक़्ल और हवास को बिगाड़ देती है.
हक़ के साथ (7)
(7) हक़ से मुराद या मौत की हक़ीक़त है या आख़िरत का वुजूद जिसको इन्सान ख़ुद मुआयना करता है या आख़िरी अंजाम, सआदत और शक़ावत. सकरात यानी जान निकलते वक़्त मरने वाले से कहा जाता है कि मौत—
यह है जिससे तू भागता था {19} और सूर फूंका गया(8)
(8) दोबारा उठाने के लिये.
यह है अज़ाब के वादे का दिन(9){20}
(9) जिसका अल्लाह तआला ने काफ़िरों से वादा फ़रमाया था.
और हर जान यूं हाज़िर हुई कि उसके साथ एक हांकने वाला(10)
(10) फ़रिश्ता जो उसे मेहशर की तरफ़ हाँके.
और एक गवाह(11){21}
(11) जो उसके कर्मों की गवाही दे. हज़रत इब्दे अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि हाँकने वाला फ़रिश्ता होगा और गवाह ख़ुद उसका अपना नफ़्स. ज़ुहाक का क़ौल है कि हाँकने वाला फ़रिश्ता है और गवाह अपने बदन के हिस्से हाथ पाँव बग़ैर. हज़रत उस्माने ग़नी रदियल्लाहो अन्हो ने मिम्बर से फ़रमाया कि हाँकने वाला भी फ़रिश्ता है और गवाह भी फ़रिश्ता (जुमल). फिर काफ़िर से कहा जाएगा.
बेशक तू इस से ग़फ़लत में था(12)
(12) दुनिया में.
तो हमने तुझ पर से पर्दा उठाया(13)
(13) जो तेरे दिल और कानों और आँखों पर पड़ा था.
तो आज तेरी निगाह तेज़ है(14) {22}
(14) कि तू उन चीज़ों को देख रहा है जिनका दुनिया में इन्कार करता था.
और उसका हमनशीं फ़रिश्ता(15)
(15) जो उसके कर्म लिखने वाला और उसपर गवाही देने वाला है. (मदारिक और ख़ाजिन)
बोला यह है(16)
(16) उसके कर्मों का लेखा (मदारिक)
जो मेरे पास हाज़िर है {23} हुक्म होगा तुम दोनों जहन्नम में डाल दो हर बड़े नाशुक्रे हटधर्म को {24} जो भलाई से बहुत रोकने वाला हद से बढ़ने वाला शक करने वाला(17){25}
(17) दीन में.
जिसने अल्लाह के साथ कोई और मअबूद ठहराया तुम दोनों उसे सख़्त अज़ाब में डालो{26} उसके साथी शैतान ने कहा (18)
(18) जो दुनिया में उसपर मुसल्लत था.
हमारे रब मैं ने इसे सरकश न किया (19)
(19) यह शैतान की तरफ़ से काफ़िर का जवाब है जो जहन्नम में डाले जाते वक़्त कहेगा कि ऐ हमारे रब मुझे शैतान ने बहकाया. उसपर शैतान कहेगा कि मैं ने इसे गुमराह न किया.
हाँ यह आप ही दूर की गुमराही में था(20){27}
(20) मैं ने उसे गुमराही की तरफ़ बुलाया उसने क़ुबूल कर लिया. इसपर अल्लाह तआला का इरशाद होगा अल्लाह तआला.
फ़रमाएगा मेरे पास न झगड़ों(21)
(21) कि हिसाब और जज़ा के मैदान में झगड़ा करने का कोई फ़ायदा नहीं.
मैं तुम्हें पहले ही अज़ाब का डर सुना चुका था(22){28}मेरे यहाँ बहुत बदलती नहीं और न मैं बन्दों पर ज़ुल्म करूं{29}
(22) अपनी किताबों में, अपने रसूलों की ज़बानों पर, मैं ने तुम्हारे लिये कोई हुज्जत बाक़ी न छोड़ी.
50 सूरए क़ाफ़ -तीसरा रूकू
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नमाज़ की जानकारी के लिए नमाज़ का बयान और पाकी के लिए वज़ू का तरीक़ा पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. सूरह क़ाफ़ में ‘सकरातुल मौत’ के बारे में क्या आया है?
आयत 19 में फ़रमाया गया: “वजा-अत सकरातुल मौति बिल-हक़्क़” (और मौत की सख़्ती हक़ के साथ आ पहुँची; यह वही है जिससे तू भागता था)। यह आयत इंसान को मौत की तैयारी करने की दावत देती है।
2. सूरह क़ाफ़ में किरामन कातेबीन का ज़िक्र किस आयत में है?
आयत 17-18 में फ़रमाया गया कि जब दो फ़रिश्ते दायें और बाएँ बैठे लिखते हैं; कोई बात ज़बान पर नहीं आती मगर उसके पास निगहबान तैयार बैठा होता है।
3. जुमुआ के ख़ुत्बे में सूरह क़ाफ़ पढ़ने की क्या हिकमत है?
क्योंकि इसमें आख़िरत का मुकम्मल मंज़र निहायत पुर-असर अल्फ़ाज़ में बयान हुआ है जो ग़ाफ़िल दिलों को झकझोरने और इस्लामी अक़ाइद को ताज़ा करने के लिए सबसे बेहतरीन मौइज़त (नसीहत) है।
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