सूरह अल-हदीद (Surah Al-Hadeed) क़ुरआन मजीद की 57वीं मुबारका सूरह है जिसमें 4 रुकूअ और 29 आयतें हैं। यह सूरह क़ुरआन के 27वें पारे का इख़्तिताम करती है। ‘अल-हदीद’ अरबी में ‘लोहे’ (Iron) को कहते हैं। इस अज़ीम सूरह में अल्लाह तआला ने लोहे की पैदाइश, उसके हैरतअंगेज़ ताक़तवर इस्तेमाल, अल्लाह की राह में जान व माल का सदक़ा, मैदान-ए-महशर में अहले ईमान का नूर, दुनियावी ज़िंदगी की हक़ीक़त और ईसाइयों की ख़ुद-साख़्ता रहबानियत (तर्क-ए-दुनिया) का वाज़ेह बयान फ़रमाया है।
क़ुरआन का अज़ीम साइंटिफिक एजाज़: लोहे का आसमान से उतारा जाना
सूरह अल-हदीद की आयत 25 में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने इरशाद फ़रमाया:
وَأَنزَلْنَا الْحَدِيدَ فِيهِ بَأْسٌ شَدِيدٌ وَمَنَافِعُ لِلنَّاسِ
तर्जुमा (कंज़ुल ईमान): “और हमने लोहा उतारा जिसमें सख़्त जंग का सामान और लोगों के लिए बहुत से फ़ायदे हैं।”
📖 हवाला: सूरह अल-हदीद (57), आयत: 25; तफ़्सीर ख़ज़ाइनुल इरफ़ान
आधुनिक खगोल विज्ञान (Astrophysics) ने आज यह साबित किया है कि लोहे का परमाणु (Iron atom) पृथ्वी पर कभी बन ही नहीं सकता था, क्योंकि इसके निर्माण के लिए करोड़ों डिग्री तापमान की ज़रूरत होती है जो केवल विशाल सुपरनोवा तारों में होता है। उल्कापिंडों के ज़रिए लोहा अंतरिक्ष से पृथ्वी पर उतारा गया। क़ुरआन ने 1400 साल पहले लफ़्ज़ “अन्ज़लना” (हमने उतारा) इस्तेमाल करके इस साइंटिफिक हक़ीक़त को उजागर फ़रमा दिया था!
सूरह अल-हदीद के 3 बुनियादी रूहानी मवाज़ीअ
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1
पुल सिरात पर मोमिनीन का नूर: आयत 12 में फ़रमाया गया कि क़ियामत के दिन मोमिन मर्दों और मोमिन औरतों का नूर उनके आगे और दायें दौड़ रहा होगा, जबकि मुनाफ़िक़ अंधेरे में भटकेंगे और कहेंगे कि हमें अपना थोड़ा सा नूर दे दो। लेकिन उनके दरमियान दीवार खड़ी कर दी जाएगी।
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2
दुनियावी ज़िंदगी की मिसाल: आयत 20 में दुनिया की हक़ीक़त बयान की गई कि यह सिर्फ़ खेल-कूद, ज़ीनत, आपस में फ़ख़्र और माल व औलाद में आगे बढ़ने की होड़ है—जैसे वह बारिश जिसकी उगाई हुई खेती किसानों को भाती है, फिर वह सूख कर पीली पड़ जाती है और भूसा बन जाती है।
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3
क़र्ज़-ए-हसना का सवाब: अल्लाह की राह में ख़र्च करने को अल्लाह ने अपने ज़िम्मे ‘क़र्ज़-ए-हसना’ फ़रमाया है, जिसका कई गुना अज़ीम अज्र बंदे को आख़िरत में दिया जाएगा।
सूरह अल-हदीद: मुकम्मल अरबी मतन व कंज़ुल ईमान हिंदी तर्जुमा
सूरए हदीद मक्की है या मदनी, इस में चार रूकू, उन्तीस आयतें, पांच सौ चवालीस कलिमे, दो हज़ार चार सौ छिहत्तर अक्षर हैं.
57 सूरए हदीद – पहला रूकू
सूरए हदीद मदीने में उतरी, इसमें 29 आयतें, चार रूकू हैं.
57|1|بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ سَبَّحَ لِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۖ وَهُوَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ
57|2|لَهُ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۖ يُحْيِي وَيُمِيتُ ۖ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
57|3|هُوَ الْأَوَّلُ وَالْآخِرُ وَالظَّاهِرُ وَالْبَاطِنُ ۖ وَهُوَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ
57|4|هُوَ الَّذِي خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ فِي سِتَّةِ أَيَّامٍ ثُمَّ اسْتَوَىٰ عَلَى الْعَرْشِ ۚ يَعْلَمُ مَا يَلِجُ فِي الْأَرْضِ وَمَا يَخْرُجُ مِنْهَا وَمَا يَنزِلُ مِنَ السَّمَاءِ وَمَا يَعْرُجُ فِيهَا ۖ وَهُوَ مَعَكُمْ أَيْنَ مَا كُنتُمْ ۚ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ
57|5|لَّهُ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ وَإِلَى اللَّهِ تُرْجَعُ الْأُمُورُ
57|6|يُولِجُ اللَّيْلَ فِي النَّهَارِ وَيُولِجُ النَّهَارَ فِي اللَّيْلِ ۚ وَهُوَ عَلِيمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ
57|7|آمِنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَأَنفِقُوا مِمَّا جَعَلَكُم مُّسْتَخْلَفِينَ فِيهِ ۖ فَالَّذِينَ آمَنُوا مِنكُمْ وَأَنفَقُوا لَهُمْ أَجْرٌ كَبِيرٌ
57|8|وَمَا لَكُمْ لَا تُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ ۙ وَالرَّسُولُ يَدْعُوكُمْ لِتُؤْمِنُوا بِرَبِّكُمْ وَقَدْ أَخَذَ مِيثَاقَكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
57|9|هُوَ الَّذِي يُنَزِّلُ عَلَىٰ عَبْدِهِ آيَاتٍ بَيِّنَاتٍ لِّيُخْرِجَكُم مِّنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ ۚ وَإِنَّ اللَّهَ بِكُمْ لَرَءُوفٌ رَّحِيمٌ
57|10|وَمَا لَكُمْ أَلَّا تُنفِقُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَلِلَّهِ مِيرَاثُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ لَا يَسْتَوِي مِنكُم مَّنْ أَنفَقَ مِن قَبْلِ الْفَتْحِ وَقَاتَلَ ۚ أُولَٰئِكَ أَعْظَمُ دَرَجَةً مِّنَ الَّذِينَ أَنفَقُوا مِن بَعْدُ وَقَاتَلُوا ۚ وَكُلًّا وَعَدَ اللَّهُ الْحُسْنَىٰ ۚ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए हदीद मक्की है या मदनी, इस में चार रूकू, उन्तीस आयतें, पांच सौ चवालीस कलिमे, दो हज़ार चार सौ छिहत्तर अक्षर हैं.
अल्लाह की पाकी बोलता है जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है(2)
(2) जानदार हो या बेजान.
और वही इज़्ज़त व हिकमत (बोध) वाला है{1}उसी के लिये है आसमानों और ज़मीन की सल्तनत, जिलाता है(3)
(3) मख़लूक़ को पैदा करके या ये मानी हैं कि मुर्दां को ज़िन्दा करता है.
और मारता(4)
(4) यानी मौत देता है ज़िन्दों को.
और वह सब कुछ कर सकता है {2} वही अव्वल (आदि) (5)
(5) क़दीम, हर चीज़ को पहल से पहले, यानी आदि, बेइब्तिदा, कि वह था और कुछ न था.
वही आख़िर (अनन्त) (6)
(6) हर चीज़ की हलाकत और नाश होने के बाद रहने वाला यानी अनंत, सब फ़ना हो जाएंगे और वह हमेशा रहेगा उसके लिये अंत नहीं.
वही ज़ाहिर(7)
(7) दलीलों और निशानियों से, या ये मानी कि ग़ालिब हर चीज़ पर.
वही बातिन(8)
(8) हवास उसे समझने से मजबूर या ये मानी कि हर चीज़ का जानने वाला.
और वही सब कुछ जानता है {3} वही है जिसने आसमान और ज़मीन छ दिन में पैदा किये(9)
(9) दुनिया के दिनों से कि पहला उनका यकशम्बा और पिछला जुमआ है. हसन रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि वह अगर चाहता तो आनन फ़ानन पैदा कर देता लेकिन उसकी हिकमत यही थी कि छ को अस्ल बनाए और उनपर मदार रखे.
फिर अर्श पर इस्तिवा फ़रमाया जैसा कि उसकी शान के लायक़ है जानता है जो ज़मीन के अन्दर जाता है (10)
(10) चाहे वह दाना हो या क़तरा या ख़ज़ाना हो या मुर्दा.
और जो उससे बाहर निकलता है(11)
(11) चाहे वह नबात हो या धात या और कोई चीज़.
और जो आसमान से उतरता है (12)
(12) रहमत व अज़ाब और फ़रिश्ते और बारिश.
और जो उसमें चढ़ता है(13)
(13) आमाल और दुआएं.
और वह तुम्हारे साथ है(14)
(14) अपने इल्म और क़ुदरत के साथ आम तौर से, और फ़ज़्ल व रहमत के साथ ख़ास तौर पर.
तुम कहीं हो, और अल्लाह तुम्हार काम देख रहा है(15) {4}
(15) तो तुम्हें कर्मो के अनुसार बदला देगा.
उसी की है आसमानों और ज़मीन की सल्तनत और अल्लाह ही की तरफ़ सब कामों की रूजू{5} रात को दिन के हिस्से में लाता है(16)
(16) इस तरह कि रात को घटाता है और दिन की मिक़दार बढ़ाता है.
और दिन को रात के हिस्से में लाता है(17)
(17) दिन घटाकर और रात की मिक़दार बढ़ा कर.
और वह दिलों की बात जानता है (18){6}
(18) दिल के अक़ीदे और राज़ सबको जानता है.
अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ और उसकी राह में कुछ वह ख़र्च करो जिसमें तुम्हें औरों का जानशीन किया (19)
(19) जो तुमसे पहले थे और तुम्हारा जानशीन करेगा तुम्हारे बाद वालों को. मानी ये हैं कि जो माल तुम्हारे क़ब्ज़े में हैं सब अल्लाह तआला के हैं उसने तुम्हें नफ़ा उठाने के लिये दिये हैं. तुम अस्ल में इन के मालिक नहीं हो बल्कि नायब और वकील की तरह हो. इन्हें ख़ुदा की राह में खर्च करो और जिस तरह नायब और वकील को मालिक के हुक्म से ख़र्च करने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती, तुम्हें भी कोई हिचकिचाहट न हो.
तो जो तुम में ईमान लाए और उसकी राह में ख़र्च किया उनके लिये बड़ा सवाब है {7} और तुम्हें क्या है कि अल्लाह पर ईमान न लाओ, हालांकि ये रसूल तुम्हें बुला रहे हैं कि अपने रब पर ईमान लाओ(20)
(20) और निशानियाँ और हुज्जतें पेश करते हैं और अल्लाह की किताब सुनाते हैं तो अब तुम्हें क्या उज्र हो सकता है.
और बेशक वह
(21)
(21) यानी अल्लाह तआला.
तुमसे पहले ही एहद ले चुका है(22)
(22) जब उसने तुम्हें आदम अलैहिस्सलाम की पुश्त से निकाला था. कि अल्लाह तआला तुम्हारा रब है उसके सिवा कोई मअबूद नहीं.
अगर तुम्हें यक़ीन हो {8} वही है कि अपने बन्दे पर(23)
(23) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर.
रौशन आयतें उतारता है ताकि तुम्हें अंधेरियों से(24)
(24) कुफ़्र और शिर्क की.
उजाले की तरफ़ ले जाए (25)
(25) यानी ईमान के नूर की तरफ़.
और बेशक अल्लाह तुम पर ज़रूर मेहरबान रहम वाला {9} और तुम्हें क्या है कि अल्लाह की राह में ख़र्च न करो हालांकि आसमानों और ज़मीन में सब का वारिस अल्लाह ही है(26)
(26) तुम हलाक हो जाओगे और माल उसी की मिल्क रह जाएंगे और तुम्हें ख़र्च करने का सवाब भी न मिलेगा और अगर तुम ख़ुदा की राह में ख़र्च करो तो सवाब भी पाओ.
तुम में बराबर नहीं वो जिन्हों ने मक्के की विजय से पहले ख़र्च और जिहाद किया(27)
(27) जबकि मुसलमान कम और कमज़ोर थे, उस वक़्त जिन्होंने ख़र्च किया और जिहाद किया वो मुहाजिरीन व अन्सार में से साबिक़ीने अव्वलीन हैं. उनके हक़ में नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि अगर तुममें से कोई उहद पहाड़ के बराबर सोना ख़र्च कर दे तो भी उनके एक मुद की बराबर न हो न आधे मुद की. मुद एक पैमाना है जिससे जौ नापे जाते हैं. कलबी ने कहा कि यह आयत हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हो के हक़ में उतरी क्यों कि आप पहले वो शख़्स हैं जिसने ख़ुदा की राह में माल ख़र्च किया और रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की हिमायत की.
वो मर्तबे में उनसे बड़े हैं जिन्होंने विजय के बाद ख़र्च और जिहाद किया और उन सबसे(28)
(28) यानी पहले ख़र्च करने वालो से भी फ़त्ह के बाद ख़र्च करने वालों से भी.
अल्लाह जन्नत का वादा फ़रमा चुका(29)
(29) अलबत्ता दर्जो में अन्तर है. फ़त्ह से पहले खर्च करने वालों का दर्जा ऊंचा है.
और अल्लाह को तुम्हार कामों की ख़बर है{10}
57 सूरए हदीद -दूसरा रूकू
57|11|مَّن ذَا الَّذِي يُقْرِضُ اللَّهَ قَرْضًا حَسَنًا فَيُضَاعِفَهُ لَهُ وَلَهُ أَجْرٌ كَرِيمٌ
57|12|يَوْمَ تَرَى الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ يَسْعَىٰ نُورُهُم بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَبِأَيْمَانِهِم بُشْرَاكُمُ الْيَوْمَ جَنَّاتٌ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا ۚ ذَٰلِكَ هُوَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ
57|13|يَوْمَ يَقُولُ الْمُنَافِقُونَ وَالْمُنَافِقَاتُ لِلَّذِينَ آمَنُوا انظُرُونَا نَقْتَبِسْ مِن نُّورِكُمْ قِيلَ ارْجِعُوا وَرَاءَكُمْ فَالْتَمِسُوا نُورًا فَضُرِبَ بَيْنَهُم بِسُورٍ لَّهُ بَابٌ بَاطِنُهُ فِيهِ الرَّحْمَةُ وَظَاهِرُهُ مِن قِبَلِهِ الْعَذَابُ
57|14|يُنَادُونَهُمْ أَلَمْ نَكُن مَّعَكُمْ ۖ قَالُوا بَلَىٰ وَلَٰكِنَّكُمْ فَتَنتُمْ أَنفُسَكُمْ وَتَرَبَّصْتُمْ وَارْتَبْتُمْ وَغَرَّتْكُمُ الْأَمَانِيُّ حَتَّىٰ جَاءَ أَمْرُ اللَّهِ وَغَرَّكُم بِاللَّهِ الْغَرُورُ
57|15|فَالْيَوْمَ لَا يُؤْخَذُ مِنكُمْ فِدْيَةٌ وَلَا مِنَ الَّذِينَ كَفَرُوا ۚ مَأْوَاكُمُ النَّارُ ۖ هِيَ مَوْلَاكُمْ ۖ وَبِئْسَ الْمَصِيرُ
57|16|۞ أَلَمْ يَأْنِ لِلَّذِينَ آمَنُوا أَن تَخْشَعَ قُلُوبُهُمْ لِذِكْرِ اللَّهِ وَمَا نَزَلَ مِنَ الْحَقِّ وَلَا يَكُونُوا كَالَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ مِن قَبْلُ فَطَالَ عَلَيْهِمُ الْأَمَدُ فَقَسَتْ قُلُوبُهُمْ ۖ وَكَثِيرٌ مِّنْهُمْ فَاسِقُونَ
57|17|اعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ يُحْيِي الْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَا ۚ قَدْ بَيَّنَّا لَكُمُ الْآيَاتِ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
57|18|إِنَّ الْمُصَّدِّقِينَ وَالْمُصَّدِّقَاتِ وَأَقْرَضُوا اللَّهَ قَرْضًا حَسَنًا يُضَاعَفُ لَهُمْ وَلَهُمْ أَجْرٌ كَرِيمٌ
57|19|وَالَّذِينَ آمَنُوا بِاللَّهِ وَرُسُلِهِ أُولَٰئِكَ هُمُ الصِّدِّيقُونَ ۖ وَالشُّهَدَاءُ عِندَ رَبِّهِمْ لَهُمْ أَجْرُهُمْ وَنُورُهُمْ ۖ وَالَّذِينَ كَفَرُوا وَكَذَّبُوا بِآيَاتِنَا أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ الْجَحِيمِ
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. सूरह हदीद की तिलावत की क्या फ़ज़ीलत है?
जामे तिर्मिज़ी (हदीस: 3406) के मुताबिक़ हुज़ूर अकरम ﷺ रात को सोने से पहले मुसब्बिहात (सूरह हदीद, हश्र, सफ़, जुमुआ, तग़ाबुन) की तिलावत फ़रमाते थे और फ़रमाते थे कि इनमें एक ऐसी आयत है जो हज़ार आयतों से अफ़ज़ल है।
2. ‘रहबानियत’ (Monasticism) क्या है और इस्लाम में इसका क्या हुक्म है?
सूरह हदीद की आयत 27 में फ़रमाया गया कि ईसाइयों ने दुनिया छोड़कर जंगलों में रहना और निकाह न करना खुद ईजाद किया था। इस्लाम में रहबानियत मना है; हुज़ूर ने फ़रमाया: “ला रहबानिय्यता फ़िल इस्लाम” (इस्लाम में वैराग्य नहीं, शरीअत के साथ गृहस्थ जीवन बिताना ही इबादत है)।
3. सूरह हदीद किस पारे में है?
सूरह अल-हदीद क़ुरआन मजीद के 27वें पारे (क़ाल फ़मा ख़तबुकुम) के आख़िरी हिस्से में मौजूद है।
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