Skip to content
सूरह अल-हुजुरात हिंदी तर्जुमा व तफ़्सीर: Surah Al-Hujurat अरबी मतन, आदाब-ए-रसूल ﷺ व इस्लामी अख़लाक़
Islam

सूरह अल-हुजुरात हिंदी तर्जुमा व तफ़्सीर: Surah Al-Hujurat अरबी मतन, आदाब-ए-रसूल ﷺ व इस्लामी अख़लाक़

admin
admin
29 min read 10 views

सूरह अल-हुजुरात (Surah Al-Hujurat) क़ुरआन मजीद की 49वीं मदनी सूरह है जिसमें 2 रुकूअ और 18 आयतें हैं। यह सूरह 26वें पारे में मौजूद है। ‘अल-हुजुरात’ अरबी में ‘हुजूरों’ (कमरों/अज़वाज-ए-मुतह्हरात के मुक़द्दस मकानात) को कहते हैं। इस मुक़द्दस सूरह को इस्लामी समाज का ‘अख़लाक़ी दस्तूर’ (Moral Constitution of Islam) कहा जाता है। इसमें बारगाह-ए-रिसालत मुहम्मद ‎ﷺ‎ के आला तरीन आदाब, किसी ख़बर की तहक़ीक़ करना, मुसलमानों के दरमियान सुलह कराना, मज़ाक़ उड़ाने और बुरे नाम रखने की मुमानअत, बदगुमानी व ग़ीबत की हुरमत और इंसानी बराबरी का अज़ीम पैग़ाम दर्ज है।

बारगाह-ए-नबवी ﷺ में आवाज़ ऊँची करने की मुमानअत

सूरह अल-हुजुरात की आयत 2-3 में अल्लाह तआला ने ईमान वालों को हुज़ूर ﷺ के अदब का सख़्त तरीन हुक्म फ़रमाया:

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَرْفَعُوا أَصْوَاتَكُمْ فَوْقَ صَوْتِ النَّبِيِّ وَلَا تَجْهَرُوا لَهُ بِالْقَوْلِ كَجَهْرِ بَعْضِكُمْ لِبَعْضٍ أَن تَحْبَطَ أَعْمَالُكُمْ وَأَنتُمْ لَا تَشْعُرُونَ

तर्जुमा (कंज़ुल ईमान): “ऐ ईमान वालो! अपनी आवाज़ें नबी की आवाज़ से ऊँची न करो और न उनसे बात में इस तरह ज़ोर से बोलो जैसे आपस में एक-दूसरे से बोलते हो, कहीं तुम्हारे आमाल अकारत (बर्बाद) न हो जाएँ और तुम्हें ख़बर भी न हो!”

📖 हवाला: सूरह अल-हुजुरात (49), आयत: 2; तफ़्सीर ख़ज़ाइनुल इरफ़ान

आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान फ़ाज़िले बरेलवी फ़रमाते हैं कि इस आयत से साबित हुआ कि हुज़ूर की बारगाह में अदब की ज़रा सी कोताही ज़िंदगी भर की नमाज़, रोज़ा और हज के आमाल को बर्बाद कर देती है। नबी का अदब ही ईमान की जान है।

सूरह हुजुरात के 4 अहम मुआशरती अहकाम

  • 1

    अफ़वाहों की तहक़ीक़ (आयत 6): अगर कोई फ़ासिक़ (बुरा शख़्स) तुम्हारे पास कोई ख़बर लाए, तो पहले उसकी अच्छी तरह तहक़ीक़ कर लो, कहीं ऐसा न हो कि तुम नादानी में किसी क़ौम को नुक़सान पहुँचा बैठो और फिर शर्मिंदा हो।
  • 2

    मज़ाक़ उड़ाने और बुरे अलक़ाब की मुमानअत (आयत 11): कोई मर्द दूसरे मर्दों का और कोई औरत दूसरी औरतों का मज़ाक़ न उड़ाए, हो सकता है कि वे अल्लाह के नज़दीक उनसे बेहतर हों। और न किसी को ताने दो और न किसी का बुरा नाम रखो।
  • 3

    बदगुमानी, जासूसी और ग़ीबत की हुरमत (आयत 12): बहुत से गुमानों से बचो, किसी के ऐबों की जासूसी न करो, और न कोई किसी की ग़ीबत (पीठ पीछे बुराई) करे। क्या तुम में से कोई अपने मुर्दा भाई का गोश्त खाना पसंद करेगा? तुम इससे घिन करते हो, तो ग़ीबत से भी बचो!
  • 4

    तक़वा ही असल इज़्ज़त है (आयत 13): ऐ लोगो! हमने तुम्हें एक मर्द और एक औरत (आदम व हव्वा) से पैदा किया और क़बीले सिर्फ़ पहचान के लिए बनाए। बेशक अल्लाह के नज़दीक तुम में सबसे इज़्ज़तदार वही है जो सबसे ज़्यादा मुत्तक़ी (परहेज़गार) है।

सूरह अल-हुजुरात: मुकम्मल अरबी मतन व कंज़ुल ईमान हिंदी तर्जुमा

सूरए हुजुरात मदनी है, इसमें दो रूकू, अठारह आयतें, तीन सौ तैंतालीस कलिमे और एक हज़ार चार सौ छिहत्तर अक्षर हैं.

49 सूरए हुजुरात – -पहला रूकू

49 सूरए हुजुरात – पहला रूकू

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُقَدِّمُوا بَيْنَ يَدَيِ اللَّهِ وَرَسُولِهِ ۖ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌ

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَرْفَعُوا أَصْوَاتَكُمْ فَوْقَ صَوْتِ النَّبِيِّ وَلَا تَجْهَرُوا لَهُ بِالْقَوْلِ كَجَهْرِ بَعْضِكُمْ لِبَعْضٍ أَن تَحْبَطَ أَعْمَالُكُمْ وَأَنتُمْ لَا تَشْعُرُونَ

إِنَّ الَّذِينَ يَغُضُّونَ أَصْوَاتَهُمْ عِندَ رَسُولِ اللَّهِ أُولَٰئِكَ الَّذِينَ امْتَحَنَ اللَّهُ قُلُوبَهُمْ لِلتَّقْوَىٰ ۚ لَهُم مَّغْفِرَةٌ وَأَجْرٌ عَظِيمٌ

إِنَّ الَّذِينَ يُنَادُونَكَ مِن وَرَاءِ الْحُجُرَاتِ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ

وَلَوْ أَنَّهُمْ صَبَرُوا حَتَّىٰ تَخْرُجَ إِلَيْهِمْ لَكَانَ خَيْرًا لَّهُمْ ۚ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِن جَاءَكُمْ فَاسِقٌ بِنَبَإٍ فَتَبَيَّنُوا أَن تُصِيبُوا قَوْمًا بِجَهَالَةٍ فَتُصْبِحُوا عَلَىٰ مَا فَعَلْتُمْ نَادِمِينَ

وَاعْلَمُوا أَنَّ فِيكُمْ رَسُولَ اللَّهِ ۚ لَوْ يُطِيعُكُمْ فِي كَثِيرٍ مِّنَ الْأَمْرِ لَعَنِتُّمْ وَلَٰكِنَّ اللَّهَ حَبَّبَ إِلَيْكُمُ الْإِيمَانَ وَزَيَّنَهُ فِي قُلُوبِكُمْ وَكَرَّهَ إِلَيْكُمُ الْكُفْرَ وَالْفُسُوقَ وَالْعِصْيَانَ ۚ أُولَٰئِكَ هُمُ الرَّاشِدُونَ

فَضْلًا مِّنَ اللَّهِ وَنِعْمَةً ۚ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ

وَإِن طَائِفَتَانِ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ اقْتَتَلُوا فَأَصْلِحُوا بَيْنَهُمَا ۖ فَإِن بَغَتْ إِحْدَاهُمَا عَلَى الْأُخْرَىٰ فَقَاتِلُوا الَّتِي تَبْغِي حَتَّىٰ تَفِيءَ إِلَىٰ أَمْرِ اللَّهِ ۚ فَإِن فَاءَتْ فَأَصْلِحُوا بَيْنَهُمَا بِالْعَدْلِ وَأَقْسِطُوا ۖ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ

إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ إِخْوَةٌ فَأَصْلِحُوا بَيْنَ أَخَوَيْكُمْ ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ

सूरए हुजुरात मदीने में उतरी, इसमें 18 आयतें, दो रूकू हैं

-पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)

(1) सूरए हुजुरात मदनी है, इसमें दो रूकू, अठारह आयतें, तीन सौ तैंतालीस कलिमे और एक हज़ार चार सौ छिहत्तर अक्षर हैं.

ऐ ईमान वालों अल्लाह और उसके रसूल से आगे न बढ़ो(2)

(2) यानी तुम्हें लाज़िम है कि कभी तुम से तक़दीम वाक़े न हो, न क़ौल में न फ़ेअल, यानी न कहनी में न करनी में कि पहल करना रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के अदब और सम्मान के ख़िलाफ़ है. उनकी बारगाह में नियाज़मन्दी और आदाब लाज़िम हैं. कुछ लोगों ने बक़्र ईद के दिन सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से पहले क़ुर्बानी कर ली तो उनको हुक्म दिया गया कि दोबारा क़ुर्बानी करें और हज़रत आयशा रदियल्लाहो अन्हा से रिवायत है कि कुछ लोग रम़जान से एक रोज़ पहले ही रोज़ा रखना शुरू कर देते थे उनके बारे में यह आयत उतरी और हुक्म दिया गया कि रोज़ा रखने में अपने नबी से आगे मत जाओ.

और अल्लाह से डरो, बेशक अल्लाह सुनता जानता है {1} ऐ ईमान वालों अपनी आवाज़ें ऊंची न करो उस ग़ैब बताने वाले (नबी) की आवाज़ से(3)

(3) यानी जब हुज़ूर में कुछ अर्ज़ करो तो आहिस्ता धीमी आवाज़ में अर्ज़ करो यही दरबारे रिसालत का अदब और एहतिराम है.

और उनके हुज़ूर (समक्ष) बात चिल्लाकर न कहो जैसे आपस में एक दूसरे के सामने चिल्लाते हो कि कहीं तुम्हारे कर्म अक़ारत न हो जाएं और तुम्हें ख़बर न हो(4){2}

(4) इस आयत में हुज़ूर की बुज़ुर्गी और उनका सम्मान बताया गया और हुक्म दिया गया कि पुकारने में अदब का पूरा ध्यान रखें जैसे आपस में एक दूसरे को नाम लेकर पुकारते हैं उस तरह न पुकारें बल्कि अदब और सम्मान के शब्दों के साथ अर्ज़ करो जो अर्ज़ करना हो, कि अदब छोड़ देने से नेकियों के बर्बाद होने का डर है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि यह आयत साबित बिन क़ैस बिन शम्मास के बारे में उतरी. वो ऊंचा सुनते थे और आवाज़ उनकी ऊंची थी. बात करने में आवाज़ बलन्द हो जाया करती थी. जब यह आयत उतरी तो हज़रत साबित अपने घर बैठ रहे और कहने लगे मैं दोज़ख़ी हूँ. हुज़ूर ने हज़रत सअद से उनका हाल दर्याफ़त किया. उन्होंने अर्ज़ किया कि वह मेरी पड़ौसी हैं और मेरी जानकारी में उन्हें कोई बीमारी तो नहीं हुई. फिर आकर हज़रत साबित से इसका ज़िक्र किया. साबित ने कहा यह आयत उतरी है और तुम जानते हो कि मैं तुम सबसे ज़्यादा ऊंची आवाज़ वाला हूँ तो मैं जहन्नमी हो गया. हज़रत सअद ने यह हाल ख़िदमते अक़दस में अर्ज़ किया तो हुज़ूर ने फ़रमाया कि वह जन्नत वालों में से हैं.

बेशक वो जो अपनी आवाज़ें पस्त करते हैं रसूलुल्लाह के पास(5)

(5) अदब और सम्मान के तौर पर. आयत “या अय्युहल्लज़ीना आमनू ला तरफ़ऊ असवातकुम” के उतरने के बाद हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ और उमरे फ़ारूक रदियल्लाहो अन्हुमा और कुछ और सहाबा ने बहुत एहतियात लाज़िम करली और ख़िदमत अक़दस में बहुत ही धीमी आवाज़ से बात करते. उन हज़रात के हक़ में यह आयत उतरी.

वो हैं जिनका दिल अल्लाह ने परहेज़गारी के लिये परख लिया है, उनके लिये बख़्शिश और बड़ा सवाब है {3} बेशक वो जो तुम्हें हुजरों के बाहर से पुकारते हैं उनमें अक्सर बे अक़्ल है (6) {4}

(6) यह आयत बनी तमीम के वफ़्द के हक़ में उतरी कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में दोपहर को पहुंचे जब कि हुज़ूर आराम कर रहे थे. इन लोगों ने हुजरे के बाहर से हुज़ूर को पुकारना शुरू किया. हुज़ूर तशरीफ़ ले आए. उन लोगों के हक़ में यह आयत उतरी और हुज़ूर की शान की बुज़ुर्गी का बयान फ़रमाया गया कि हुज़ूर की बारगाह में इस तरह पुकारना जिहालत और बेअक़्ली है और उनको अदब की तलक़ीन की गई.

और अगर वो सब्र करते यहाँ तक कि तुम आप उनके पास तशरीफ लाते(7)

(7) उस वक़्त वो अर्ज़ करते जो उन्हें अर्ज़ करना था. यह अदब उन पर लाज़िम था, इसको बजा लाते.

तो यह उनके लिये बेहतर था, और अल्ला बख़्शने वाला मेहरबान है (8){5}

(8) इन में से उनके लिये जो तौबह करें.

ऐ ईमान वालों अगर कोई फ़ासिक़ तुम्हारे पास कोई ख़बर लाए तो तहक़ीक़ कर लो(9)

(9) कि सही है या ग़लत. यह आयत वलीद बिन अक़बह के हक़ में उतरी कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उनको बनी मुस्तलक़ से सदक़ात वुसूल करने भेजा था और जिहालत के ज़माने में इनके और उनके दर्मियान दुश्मनी थी. जब वलीद उनके इलाक़े के क़रीब पहुंचे और उन्हें ख़बर हुई तो इस ख़याल से कि वो रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के भेजे हुए हैं, बहुत से लोग अदब से उनके स्वागत के लिये आए. वलीद ने गुमान किया कि ये पुरानी दुश्मनी से मुझे क़त्ल करने आ रहे हैं. यह ख़याल करके वलीद वापस हो गए और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से अर्ज़ कर दिया कि हुज़ूर उन लोगों ने सदक़ा देने को मना कर दिया और मेरे क़त्ल का इरादा किया. हुज़ूर ने ख़ालिद बिन वलीद को तहक़ीक़ के लिये भेजा. हज़रत ख़ालिद ने देखा कि वो लोग अज़ानें कहते हैं, नमाज़ पढ़ते हैं और उन लोगों ने सदक़ात पेश कर दिये. हज़रत ख़ालिद ये सदक़ात ख़िदमते अक़दस में लेकर हाज़िर हुए और हाल अर्ज़ किया. इस पर आयत उतरी. कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा कि यह आयत आम है, इस बयान में उतरी है कि फ़ासिक़ के क़ौल पर भरोसा न किया जाए. इस आयत से साबित हुआ कि एक व्यक्ति अगर आदिल हो तो उसकी ख़बर भरोसे के लायक़ है.

कि कहीं किसी क़ौम को बेजा ईजा (कष्ट) न दे बैठो फिर अपने किये पर पछताते रह जाओ{6} और जान लो कि तुम में अल्लाह के रसूल है(10)

(10) अगर तुम झूट बोलोगे तो अल्लाह तआला के ख़बरदार करने से वह तुम्हारा राज़ ख़ोल कर तुम्हें रूसवा कर देंगे.

बहुत मामलों में अगर यह तुम्हारी ख़ुशी करें(11)

(11) और तुम्हारी राय के मुताबिक हुक्म दे दें.

तो तुम ज़रूर मशक़्क़त में पड़ो लेकिन अल्लाह ने तुम्हें ईमान प्यारा कर दिया है और उसे तुम्हारे दिलों में आरास्ता कर दिया और कुफ़्र और हुक्म अदूली और नाफ़रमानी तुम्हें नागवार कर दी, ऐसे ही लोग राह पर हैं(12){7}

(12) कि सच्चाई के रास्ते पर क़ायम रहे.

अल्लाह का फ़ज़्ल और एहसान, और अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है {8} और अगर मुसलमानों के दो दल आपस में लड़े तो उनमें सुलह कराओ(13)

(13) नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम दराज़ गोश (गधे) पर सवार तशरीफ़ ले जाते थे. अन्सार की मज़लीस पर गुज़र हुआ. वहाँ थोड़ी देर ठहरे. उस जगह गधे ने पेशाब किया तो इब्ने उबई ने नाक बन्द कर ली. हज़रत अब्दुल्लाह बिन रवाहा रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि हुज़ूर के दराज़गोश का पेशाब तेरे मुश्क से बेहतर ख़ुश्बू रखता हैं. हुज़ूर तो तशरीफ़ ले गए. उन दोनों में बात बढ़ गई और उन दोनों की क़ौमें आपस में लड़ गई और हाथा पाई की नौबत आई तो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम तशरीफ़ लाए और उनमें सुलह करा दी. इस मामले में यह आयत उतरी.

फिर अगर एक दूसरे पर ज़ियादती करे(14)

(14) जुल्म करे और सुलह से इन्कारी हो जाए. बाग़ी दल का यही हुक्म है कि उससे जंग की जाए यहाँ तक कि वह लड़ाई से बाज़ आए.

तो उस ज़ियादती वाले से लड़ो यहाँ तक कि वह अल्लाह के हुक्म की तरफ़ पलट आए फिर अगर पलट आए तो इन्साफ़ के साथ उनमें इस्लाह कर दो और इन्साफ़ करो, बेशक इन्साफ़ वाले अल्लाह को प्यारे हैं {9} मुसलमान मुसलमान भाई हैं(15)

(15) कि आपस में दीनी सम्बन्ध और इस्लामी महब्बत के साथ जुड़े हुए हैं. यह रिश्ता सारे दुनियवी रिश्तों से ज़्यादा मज़बूत है.

तो अपने दो भाइयों में सुलह करो(16)

(16) जब कभी उनमें मतभेद वाक़े हो.

और अल्लाह से डरो कि तुम पर रहमत हो(17){10}

(17) क्योंकि अल्लाह तआला से डरना और परहेज़गारी इख़्तियार करना ईमान वालों की आपसी महब्बत और दोस्ती का कारण है और जो अल्लाह तआला से डरता है, अल्लाह तआला की रहमत उस पर होती है.

49 सूरए हुजुरात – दूसरा रूकू

49 सूरए हुजुरात -दूसरा रूकू

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا يَسْخَرْ قَوْمٌ مِّن قَوْمٍ عَسَىٰ أَن يَكُونُوا خَيْرًا مِّنْهُمْ وَلَا نِسَاءٌ مِّن نِّسَاءٍ عَسَىٰ أَن يَكُنَّ خَيْرًا مِّنْهُنَّ ۖ وَلَا تَلْمِزُوا أَنفُسَكُمْ وَلَا تَنَابَزُوا بِالْأَلْقَابِ ۖ بِئْسَ الِاسْمُ الْفُسُوقُ بَعْدَ الْإِيمَانِ ۚ وَمَن لَّمْ يَتُبْ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اجْتَنِبُوا كَثِيرًا مِّنَ الظَّنِّ إِنَّ بَعْضَ الظَّنِّ إِثْمٌ ۖ وَلَا تَجَسَّسُوا وَلَا يَغْتَب بَّعْضُكُم بَعْضًا ۚ أَيُحِبُّ أَحَدُكُمْ أَن يَأْكُلَ لَحْمَ أَخِيهِ مَيْتًا فَكَرِهْتُمُوهُ ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ تَوَّابٌ رَّحِيمٌ

يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَاكُم مِّن ذَكَرٍ وَأُنثَىٰ وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُوا ۚ إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِندَ اللَّهِ أَتْقَاكُمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرٌ

۞ قَالَتِ الْأَعْرَابُ آمَنَّا ۖ قُل لَّمْ تُؤْمِنُوا وَلَٰكِن قُولُوا أَسْلَمْنَا وَلَمَّا يَدْخُلِ الْإِيمَانُ فِي قُلُوبِكُمْ ۖ وَإِن تُطِيعُوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ لَا يَلِتْكُم مِّنْ أَعْمَالِكُمْ شَيْئًا ۚ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ

إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ الَّذِينَ آمَنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ ثُمَّ لَمْ يَرْتَابُوا وَجَاهَدُوا بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ ۚ أُولَٰئِكَ هُمُ الصَّادِقُونَ

قُلْ أَتُعَلِّمُونَ اللَّهَ بِدِينِكُمْ وَاللَّهُ يَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۚ وَاللَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ

يَمُنُّونَ عَلَيْكَ أَنْ أَسْلَمُوا ۖ قُل لَّا تَمُنُّوا عَلَيَّ إِسْلَامَكُم ۖ بَلِ اللَّهُ يَمُنُّ عَلَيْكُمْ أَنْ هَدَاكُمْ لِلْإِيمَانِ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ

إِنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ غَيْبَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ وَاللَّهُ بَصِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ

ऐ ईमान वालों न मर्द मर्दों पर हंसे(1)

(1) यह आयत कई घटनाओं में उतरी. पहली घटना यह है कि साबित बिन क़ैस शम्मास ऊंचा सुनते थे. जब वह सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की मजलिस शरीफ़ में हाज़िर होते तो सहाबा उन्हें आगे बिठाते और उनके लिये जगह ख़ाली कर देते ताकि वह हुज़ूर के क़रीब हाज़िर रहकर कलामे मुबारक सुन सकें. एक रोज़ उन्हें हाज़िरी में देर हो गई और मजलिस शरीफ़ ख़ूब भर गई, उस वक़्त साबित आए और क़ायदा यह था कि जो व्यक्ति ऐसे वक़्त आता और मजलिस में जगह न पाता तो जहाँ होता खड़ा रहता. साबित आए तो वह रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के क़रीब बैठने के लिये लोगों को हटाते हुए यह कहते चले कि जगह दो, जगह दो. यहाँ तक कि वह हुज़ूर के क़रीब पहुंच गए और उनके और हुज़ूर के बीच में सिर्फ़ एक व्यक्ति रह गया. उन्होंने उससे भी कहा कि जगह दो. उसने कहा कि तुम्हे जगह मिल गई. बैठ जाओ. साबित ग़ुस्से में आकर उससे पीछे बैठ गए और जब दिन ख़ूब रौशन हुआ तो साबित ने उसका बदन दबा कर कहा कि कौन? उसने कहा मैं फ़लाँ व्यक्ति हूँ. साबित ने उसकी माँ का नाम लेकर कहा कि फ़लानी का लड़का. इस पर उस आदमी ने शर्म से सर झुका लिया. उस ज़माने में ऐसा कलिमा शर्म दिलाने के लिये बोला जाता था. इसपर यह आयत उतरी. दूसरा वाक़िआ ज़ुहाक ने बयान किया कि यह आयत बनी तमीम के हक़ में उतरी जो हज़रत अम्मार व ख़बाब व बिलालद व सुहैब व सलमान व सालिम वग़ैरह ग़रीब सहाबा की ग़रीबी देखकर उनका मज़ाक़ उड़ाते थे. उनके हक़ में यह आयत उतरी और फ़रमाया गया कि मर्द मर्दों से न हंसे यानी मालदार ग़रीबों की हंसी न बनाएं, न ऊंचे ख़ानदान वाले नीचे ख़ानदान वालों की, और न तन्दुरूस्त अपाहिज की, न आँख वाले उसकी जिसकी आँख में दोष हो.

अजब नहीं कि वो उन हंसने वालों से बेहतर हों(2)

(2) सच्चाई और इख़लास में.

और न औरतें औरतों से दूर नहीं कि वो उन हंसने वालियों से बेहतर हो(3)

(3) यह आयत उम्मुल मूमिनीन हज़रत सफ़िया बिन्ते हैय रदियल्लाहो अन्हा के हक़ में उतरी. उन्हें मालूम हुआ था कि उम्मुल मूमिनीन हज़रत हफ़सा ने उन्हें यहूदी की बेटी कहा. इस पर उन्हें दुख हुआ और रोईं और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से शिकायत की तो हुज़ूर ने फ़रमाया कि तुम नबीज़ादी और नबी की बीबी हो तुम पर वह क्या फ़ख्र रखती हैं और हज़रत हफ़सा से फ़रमाया, ऐ हफ़सा ख़ुदा से डरो. (तिरमिज़ी)

और आपस में तअना न करो(4)

(4) एक दूसरे पर ऐब न लगाओ. अगर एक मूमिन ने दूसरे मूमिन पर ऐब लगाया तो गोया अपने ही आपको ऐब लगाया.

और एक दूसरे के बुरे नाम न रखो (5)

(5) जो उन्हें नागवार मालूम हो. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि अगर किसी आदमी ने किसी बुराई से तौबह कर ली हो, उसको तौबह के बाद उस बुराई से शर्म दिलाना भी इस मनाही में दाख़िल है. कुछ उलमा ने फ़रमाया कि किसी मुसलमान को कुत्ता या गधा या सुअर कहना भी इसी में दाख़िल है. कुछ उलमा ने फ़रमाया कि इससे वो अलक़ाब मुराद हैं जिन से मुसलमान की बुराई निकलती हो और उसको नागवार हो, लेकिन तारीफ़ के अलक़ाब जो सच्चे हों मना नहीं जैसे कि हज़रत अबू बक्र का लक़ब अतीक़ और हज़रत उमर का फ़ारूक और हज़रत उस्मान का ज़ुन-नूरैन और हज़रत अली का अबू तुराब और हज़रत ख़ालिद का सैफ़ुल्लाह, रदियल्लाहो अन्हुम. और जो अलक़ाब पहचान की तरह हो गए और व्यक्ति विशेष को नागवार नहीं वो अलक़ाब भी मना नहीं जैसे कि अअमश, अअरज.

क्या ही बुरा नाम है मुसलमान होकर फ़ासिक़ कहलाना(6)

(6) तो ऐ मुसलमानों किसी मुसलमान की हंसी बनाकर या उसको ऐब लगाकर या उसका नाम बिगाड़ कर अपने आपको फ़ासिक़ न कहलाओ.

और जो तौबह न करें तो वही ज़ालिम हैं {11} ऐ, ईमान वालों बहुत ग़ुमानों से बचो(7)

(7) क्योंकि हर गुमान सही नहीं होता.

बेशक कोई ग़ुमान गुनाह हो जाता है (8)

और पढ़ें

नमाज़ की जानकारी के लिए नमाज़ का बयान और पाकी के लिए वज़ू का तरीक़ा पढ़ें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1. सूरह हुजुरात को ‘सूरतुल अख़लाक़’ क्यों कहा जाता है?

क्योंकि इसमें किसी इंसान के ज़ाती, ख़ानदानी और मुआशरती अख़लाक़ को संवारने के तमाम बुनियादी क़वानीन जैसे अदब, भाईचारा, ग़ीबत से परहेज़ और तहक़ीक़ करने का हुक्म दिया गया है।

2. क्या हुज़ूर ﷺ के रोज़ा-ए-अक़दस पर भी आवाज़ पस्त रखना वाजिब है?

हाँ! उलमा-ए-किराम और अइम्मा फ़रमाते हैं कि हुज़ूर ﷺ का एहतिराम आज भी रोज़ा-ए-मुबारक पर वैसा ही वाजिब है जैसा आपकी ज़ाहिरी हयात में था। मस्जिद-ए-नबवी और मुवाजिहा शरीफ़ पर आवाज़ बुलंद करना सख़्त हराम है।

3. ग़ीबत और तोहमत में क्या फ़र्क़ है?

सहीह मुस्लिम (हदीस: 2589) के मुताबिक़ अगर किसी भाई के अंदर मौजूद ऐब को उसकी पीठ पीछे बयान किया जाए तो यह ‘ग़ीबत’ है; और अगर वह बुराई उसके अंदर न हो और झूठी बात कही जाए तो यह ‘बोहतन’ (तोहमत) है, जो उससे भी बड़ा गुनाह है।

How useful was this post?

Click on a star to rate it!

0.0 out of 5 · 0 votes

No comments yet

Be the first to share your thoughts.

Leave a Comment

1-Click Google Verification to post comment:
To prevent spam, comments require a verified Google account (no password needed, only name & email).