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कन्ज़ुल ईमान क्या है? आला हज़रत का शाहकार क़ुरआनी तर्जुमा, विशेषताएं और दीगर तराजिम से फ़र्क़
Ala Hazrat

कन्ज़ुल ईमान क्या है? आला हज़रत का शाहकार क़ुरआनी तर्जुमा, विशेषताएं और दीगर तराजिम से फ़र्क़

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कन्ज़ुल ईमान (Kanzul Iman) यानी ‘कन्ज़ुल ईमान फ़ी तर्जमतुल क़ुरआन’ (ईमान का ख़ज़ाना) मुजद्दिद-ए-आज़म, इमाम-ए-इश्क़-ओ-मोहब्बत आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान फ़ाज़िले बरेलवी رضي الله عنه (1856–1921 ई.) का वह अज़ीम शाहकार उर्दू व हिंदी तर्जुमा-ए-क़ुरआन है जिसने पूरी इस्लामी दुनिया में क़ुरआनी तराजिम के मयार को बुलंदियों पर पहुँचा दिया। 1330 हिजरी (1911 ई.) में जब आला हज़रत ने अपनी ज़बानी यह तर्जुमा सद्रुश-शरीआ अल्लामा मुफ़्ती अमजद अली आज़मी को इमला कराया, तो उन्होंने किसी लफ़्ज़ या अक़ीदे में ज़रा सी भी झोल नहीं आने दी। इस मुक़द्दस तर्जुमे की सबसे बड़ी खुसूसियत यह है कि इसमें अल्लाह तआला की बेमिसाल शान और प्यारे मुस्तफ़ा करीम मुहम्मद ‎ﷺ‎ की अज़ीम अज़्मत व इस्मत पर कभी कोई आंच नहीं आने दी गई।

कन्ज़ुल ईमान की 3 अज़ीम खुसूसियात (Unique Features)

उलमा-ए-अहले सुन्नत और मुहाक़्क़िक़ीन ने कन्ज़ुल ईमान की बेमिसाल खूबियों को सराहा है:

  • 1

    अदब-ए-उलूहियत और तंज़ीह (अल्लाह की पाकी): क़ुरआन में जहां मुताशाबिहात (जैसे ‘यदुल्लाह’ यानी अल्लाह का हाथ, या ‘मकरल्लाह’) का ज़िक्र आया, वहाँ दीगर मुतरजिमीन ने लफ़्ज़ी तर्जुमा करके अल्लाह के लिए हाथ या मक्र (धोखा) जैसे अल्फ़ाज़ लिख दिए जिससे गुमराहियत फैलती थी। लेकिन आला हज़रत ने कन्ज़ुल ईमान में “अल्लाह की कुदरत का हाथ” और “अल्लाह ने अपनी ख़ुफ़िया तदबीर फ़रमाई” लिखकर तौहीद की हक़ीक़त को महफ़ूज़ रखा।
  • 2

    अदब-ए-रिसालत और नबुव्वत की इस्मत: सूरह अज़-ज़ुहा (आयत 7) में लफ़्ज़ “व-वजदक दाल्लन फ़-हदा” का तर्जुमा कई लोगों ने ‘आपको भटका हुआ पाया तो हिदायत दी’ जैसा गुस्ताख़ाना तर्जुमा कर दिया था। लेकिन आला हज़रत ने कन्ज़ुल ईमान में लिखा: “और तुम्हें अपनी मुहब्बत में खुद-रफ़्ता पाया तो अपनी तरफ़ राह दी!” इसी तरह सूरह फ़तह में ‘गुनाह माफ़ किए’ के बजाय “तुम्हारे सबब से तुम्हारे अगलों और पिछलों के गुनाह बख़्शे” लिखकर नबी की मासूमियत पर मुहर लगा दी।
  • 3

    सुन्नी हनफ़ी अक़ाइद की हिफ़ाज़त: कन्ज़ुल ईमान का हर लफ़्ज़ अहले सुन्नत वल जमाअत के हक़ीक़ी अक़ीदे के मुताबिक़ है। इसमें सहाबा-ए-किराम, अहले बैत-ए-अतहार और औलिया-ए-किराम की अज़्मत साफ़ छलकती है।

कन्ज़ुल ईमान लिखने का हैरतअंगेज़ वाक़िआ

सद्रुश-शरीआ हज़रत मौलाना मुफ़्ती अमजद अली आज़मी رضي الله عنه (मुसन्निफ़े बहारे शरीअत) फ़रमाते हैं:

मैंने आला हज़रत की ख़िदमत में कई बार अर्ज़ किया कि हुज़ूर! क़ुरआन करीम का एक ऐसा बा-मुहावरा और सहीह तर्जुमा होना चाहिए जो अक़ाइद-ए-बातिला से पाक हो। आला हज़रत ने अपनी मसरूफ़ियात के बावजूद मंज़ूर फ़रमाया। रात को जब काम से फ़ारिग़ होते, तो आला हज़रत लेट जाते और ज़बानी अरबी आयत सुनकर फ़ौरन उसका उर्दू तर्जुमा बोल देते। मैं उसे लिखता जाता था। हैरत की बात यह थी कि आला हज़रत के सामने न कोई तफ़्सीर की किताब खुली होती थी और न कोई लुग़ात! ऐसा लगता था जैसे क़ुरआन के तमाम उलूम आला हज़रत के सीने में महफ़ूज़ हैं। जब बाद में बड़ी-बड़ी तफ़्सीरों से मिलाया गया तो एक लफ़्ज़ का भी फ़र्क़ न निकला!

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1. कन्ज़ुल ईमान तर्जुमा कब मुकम्मल हुआ?

कन्ज़ुल ईमान का यह अज़ीम तर्जुमा 1330 हिजरी (मुताबिक़ 1911 ईस्वी) में बरेली शरीफ़ में मुकम्मल हुआ।

2. कन्ज़ुल ईमान पर सबसे मशहूर हाशिया (तफ़्सीर) कौन सी है?

कन्ज़ुल ईमान के साथ सबसे मशहूर और मुस्तनद तफ़्सीर ‘ख़ज़ाइनुल इरफ़ान’ है, जिसे आला हज़रत के ख़लीफ़ा सद्रुल अफ़ाज़िल हज़रत अल्लामा नईमुद्दीन मुरादाबादी رضي الله عنه ने तहरीर फ़रमाया।

3. क्या कन्ज़ुल ईमान हिंदी में भी दस्तियाब है?

जी हाँ, आज कन्ज़ुल ईमान साफ़ हिंदी देवनागरी लिपि में बा-आसानी दस्तियाब है और लाखों हिंदी भाषी मुसलमान इसे पढ़कर क़ुरआन के सहीह मफ़हूम को समझते हैं।

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