आला हज़रत की विलादत 10 शव्वाल इस्लामी तारीख़ का वह रौशन दिन है जिसने उम्मत-ए-मुहम्मदिया को एक ऐसा अज़ीम आलिम, मुहद्दिस, फ़क़ीह और मुजद्दिद अता किया जिसने फ़ितनों के दौर में सुन्नियत और अक़ीदा-ए-इश्क़े मुस्तफ़ा ﷺ का परचम बुलंद किया। 10 शव्वालुल मुकर्रम 1272 हिजरी को बरेली शरीफ़ में पैदा होने वाले इस अज़ीम बुज़ुर्ग को दुनिया ‘इमाम-ए-अहले सुन्नत आला हज़रत अश्शाह इमाम अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी’ के नाम से जानती है। आपने अपने क़लम और इल्म से हज़ारों किताबों के ज़रिये इस्लाम की सही तालीमात को ज़िंदा किया। आइए आला हज़रत के यौमे विलादत, आपकी इब्तिदाई ज़िंदगी और अज़ीम कारनामों को आसान हिंदी में समझें।
आला हज़रत की पैदाइश और मुबारक बचपन
आला हज़रत की पैदाइश 10 शव्वालुल मुकर्रम 1272 हिजरी (मुताबिक़ 14 जून 1856 ईसवी) को शहर-ए-बरेली (जसौली मुहल्ला) में हुई। आपके वालिदे माजिद हज़रत अल्लामा मौलाना नक़ी अली ख़ान अलैहिर्रहमा अपने वक़्त के बहुत बड़े आलिम और मुसन्निफ़ थे।
बचपन में आपका तारीखी नाम ‘अल-मुख़्तार’ (1272) रखा गया, और आपके दादा हज़रत मौलाना रज़ा अली ख़ान ने आपका नाम ‘अहमद रज़ा’ रखा। बचपन ही से आप पर अल्लाह तआला का ख़ास फ़ज़्ल था और ज़हानत ऐसी थी कि सिर्फ़ 4 साल की उम्र में क़ुरआन मजीद नाज़िरा मुकम्मल फ़रमा लिया।
सिर्फ़ 13 साल की उम्र में मुफ़्ती-ए-इस्लाम का दर्जा
आला हज़रत ने अपने वालिद-ए-माजिद की ज़ेरे निगरानी तमाम मुतदाविला उलूम (तफ़्सीर, हदीस, फ़िक़्ह, उसूल, मंतिक़) की तालीम मुकम्मल की। 14 शाबान 1286 हिजरी को जब आपकी उम्र सिर्फ़ 13 साल 10 महीने 4 दिन थी, तो आपने फ़िक़्ह-ए-हनफ़ी के रज़ाअत (दूध पीने के मसले) पर अपना पहला शरई फ़तवा तहरीर फ़रमाया।
आपके वालिदे गिरामी ने जब वह तहक़ीक़ी फ़तवा देखा, तो हैरान रह गए और उसी दिन से मुफ़्ती की मसनद आपके हवाले कर दी। आपने ज़िंदगी के आख़िरी लम्हे तक 54 साल तक मुसलसल उम्मत की शरई रहनुमाई फ़रमाई।
आला हज़रत के 4 अज़ीम तारीखी कारनामे
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कन्ज़ुल ईमान फ़ी तर्जमतुल क़ुरआन:
क़ुरआन मजीद का वह बे-नज़ीर उर्दू तर्जुमा जिसमें अल्लाह की ज़ात और हुज़ूर ﷺ की शान में कोई अदना सी गुस्ताख़ी या बे-अदबी का वहम तक नहीं गुज़र सकता।
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फ़तावा रज़विया की तसनीफ़:
इस्लामी फ़िक़्ह की तारीख़ का सबसे बड़ा फ़तावा मजमूआ, जो 30 जिल्दों, 22,000 सफ़हात और तक़रीबन 6,800 सवालात के जवाबात पर मुश्तमिल है।
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अदब-ए-मुस्तफ़ा ﷺ का तहफ़्फ़ुज़:
जब कुछ फिरक़ों ने नबी-ए-पाक ﷺ की अज़मत को घटाने और गुस्ताख़ाना इबारतें लिखने की कोशिश की, तो आपने क़ुरआन व हदीस की अकाट्य दलीलों से उनका मुंहतोड़ जवाब दिया और सुन्नियत के अक़ीदे को महफ़ूज़ फ़रमाया।
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अल-दौलतुल मक्किया:
1323 हिजरी में जब आप हज के लिए मक्का मुकर्रमा पहुँचे, तो हरम शरीफ़ के उलमा के पूछने पर नबी ﷺ के इल्मे ग़ैब पर सिर्फ़ 8 घंटे के अंदर बग़ैर किसी किताब की मदद के अरबी में ‘अल-दौलतुल मक्किया बिल-माद्दातुल ग़ैबिय्या’ जैसी अज़ीम किताब लिख डाली जिसे देखकर मक्का के उलमा दंगल रह गए।
हरमैन शरीफ़ैन के उलमा की नज़र में आला हज़रत
मक्का मुकर्रमा के मुफ़्ती-ए-मालिकिया हज़रत शैख़ हुसैन बिन सालेह जुमलैल अलैहिर्रहमा ने जब आला हज़रत को देखा तो फ़रमाया: “अल्लाह की क़सम! मैं इस पेशानी में रसूलुल्लाह ﷺ के अनवार चमकते हुए देख रहा हूँ।”
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. 10 शव्वाल को कौन सा दिन मनाया जाता है?
10 शव्वालुल मुकर्रम को मुजद्दिदे दीनो मिल्लत आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान क़ादरी बरेलवी का यौमे विलादत (जन्मदिन) दुनिया भर के सुन्नी मुसलमान मनाते हैं।
2. आला हज़रत ने पहली बार फ़तवा किस उम्र में लिखा?
आला हज़रत ने अपना पहला शरई फ़तवा सिर्फ़ 13 साल 10 महीने की उम्र में 14 शाबान 1286 हिजरी को लिखा था।
3. आला हज़रत का मज़ार शरीफ़ कहाँ है?
आला हज़रत का मुक़द्दस मज़ार शरीफ़ दरगाह आला हज़रत, सौदागरान, बरेली शरीफ़ (उत्तर प्रदेश, भारत) में ज़ियारतगाह-ए-ख़लाएक़ है।
4. आला हज़रत की कुल कितनी तसानीफ़ (किताबें) हैं?
आला हज़रत ने मुख़्तलिफ़ उलूम व फ़ुनून पर तक़रीबन 1000 किताबें, रिसाले और हाशिए तहरीर फ़रमाए हैं।
आला हज़रत के अज़ीम कलाम के लिए वो बरेली का अहमद रज़ा है मनक़बत और शजरा शरीफ़ के लिए या इलाही हर जगह तेरी अता का साथ हो पढ़ें।
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