या रब है बख़्श देना दामाने मुस्तफ़ा में अलहाज मुहम्मद ओवैस रज़ा क़ादरी और दीगर अज़ीम सनाख़्वानों की पुर-कशिश आवाज़ में पढ़ी जाने वाली एक इंतहाई दिलकश, रूहानी और पुर-दर्द नात शरीफ़ है। इस नातिया कलाम के हर मिसरे में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की बारगाह में गुनाहों की बख़्शिश, क़ब्र की तन्हाई से निजात और रसूलुल्लाह ﷺ के मुक़द्दस दामने शफ़ाअत की पनाह माँगी गई है। जब भी मोमिनों के दिल गुनाहों के ख़ौफ़ से भर जाते हैं, तो यह नात शरीफ़ दिल को तसल्ली और उम्मीद की रोशनी देती है। आइए इस मुकम्मल नात शरीफ़ के अशआर, इसका आसान तर्जुमा और रूहानी फ़ज़ीलत को समझें।
Table of Contents
- 1. या रब है बख़्श देना (मुकम्मल नात शरीफ़ लिरिक्स)
- 2. अशआर का आसान हिंदी मफ़हूम
- 3. नात शरीफ़ सुनने और पढ़ने के शरई आदाब
- 4. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
- 4.1 1. ‘या रब है बख़्श देना’ नात किस सनाख़्वान ने मशहूर की?
- 4.2 2. ‘उक़्बा’ का क्या मतलब होता है?
- 4.3 3. क्या नात के ज़रिये दुआ माँगना जायज़ है?
- 4.4 4. शफ़ाअत-ए-कुबरा का क्या मतलब है?
या रब है बख़्श देना (मुकम्मल नात शरीफ़ लिरिक्स)
या रब है बख़्श देना दामाने मुस्तफ़ा में
रखना हमें हमेशा साए में मुस्तफ़ा के
दुनिया में भी पनाह हो उक़्बा में भी पनाह हो
दोनों जहाँ में हम पर एहसाने मुस्तफ़ा हो
जब जाँ लबों पे आए और दम निकल रहा हो
मुँह हो मदीने जानिब दीदारे मुस्तफ़ा हो
क़ब्र-ओ-हश्र की सख़्ती से तू बचा ले मौला
सर पर हमारे साया रहमत का मुस्तफ़ा हो
मीज़ान पर जब आएँ आमाल के तराज़ू
उस वक़्त भी करम का तूफ़ाने मुस्तफ़ा हो
पुल से गुज़र रहे हों जब थरथरा रहे हों
दामन पकड़ के ले जाएँ सरकारे दो जहाँ को
ओवैस बे-नवा को बख़्शिश की है तमन्ना
रब से शफ़ाअत अपनी फ़रमाएँ मुस्तफ़ा ﷺ
अशआर का आसान हिंदी मफ़हूम
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शेर 1: दामाने मुस्तफ़ा की पनाह:
ऐ हमारे रब! क़यामत के दिन जब कोई साया नहीं होगा, हमें अपने प्यारे रसूल हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ के रहमत भरे दामन की छाँव में मग़्फ़िरत अता फ़रमा।
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शेर 3: दम निकलने के वक़्त दीदार:
जब हमारी ज़िंदगी का आख़िरी लम्हा आए और जान होंठों पर हो, तो हमारा चेहरा मदीना मुनव्वरा की जानिब हो और हमारी आँखें मुस्तफ़ा करीम ﷺ के हसीन दीदार से रौशन हों।
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शेर 5: मीज़ान पर शफ़ाअत:
क़यामत के दिन जब नेकियों और गुनाहों का तराज़ू (मीज़ान) क़ायम होगा, उस नाज़ुक वक़्त हुज़ूर की शफ़ाअत हमारे आमाल को भारी कर दे।
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शेर 6: पुल सिरात पर रहनुमाई:
जब लोग पुल सिरात पर डर और ख़ौफ़ से काँप रहे होंगे, तब हुज़ूर ﷺ अपनी उम्मत को बिजली की तरह सलामती से पार करा दें।
नात शरीफ़ सुनने और पढ़ने के शरई आदाब
- बा-वुज़ू होना: जब भी नात शरीफ़ पढ़ी या सुनी जाए, तो बेहतर है कि इंसान बा-वुज़ू और पाकीज़ा हालत में हो।
- हुज़ूर ﷺ के नाम पर दरूद: जब नात में प्यारे आक़ा ﷺ का ज़िक्र आए, तो दिल व ज़बान से सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पढ़ना चाहिए।
- ग़ैर-शरई साज़ों से परहेज़: नात शरीफ़ इबादत और इश्क़ का ज़रिया है, इसे फ़िल्मी तर्ज़ और बे-अदब म्यूज़िक से पाक रखना चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. ‘या रब है बख़्श देना’ नात किस सनाख़्वान ने मशहूर की?
यह नात शरीफ़ आलमी शोहरत याफ़्ता सनाख़्वान अलहाज मुहम्मद ओवैस रज़ा क़ादरी की आवाज़ में दुनिया भर में बे-पनाह मक़बूल हुई।
2. ‘उक़्बा’ का क्या मतलब होता है?
‘उक़्बा’ अरबी ज़बान का लफ़्ज़ है, जिसका मतलब ‘आख़िरत’ या ‘क़यामत के बाद की दुनिया’ होता है।
3. क्या नात के ज़रिये दुआ माँगना जायज़ है?
जी हाँ, रसूलुल्लाह ﷺ की तारीफ़ और आपकी शफ़ाअत का वसीला पेश करके अल्लाह से मग़्फ़िरत माँगना अहले सुन्नत का मुस्तनद अक़ीदा है।
4. शफ़ाअत-ए-कुबरा का क्या मतलब है?
क़यामत के दिन जब तमाम इंसान परेशान होंगे, तो हुज़ूर अकरम ﷺ सजदे में गिरकर अल्लाह से हिसाब शुरू करने और अपनी उम्मत की बख़्शिश की शफ़ाअत फ़रमाएँगे (सहीह बुख़ारी: 4712)।
गुनाहों से तौबा के लिए अस्तग़फ़ार की फ़ज़ीलत और दुआ और शजरा शरीफ़ की दुआ के लिए या इलाही हर जगह तेरी अता का साथ हो पढ़ें।
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