या इलाही हर जगह तेरी अता का साथ हो नात अलहाज मुहम्मद ओवैस रज़ा क़ादरी की दिलकश और पुर-दर्द आवाज़ में दुनिया भर में मकबूल वह अज़ीम शजरा-ए-क़ादरिया कलाम है जिसे आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी अलैहिर्रहमा ने तहरीर फ़रमाया। इस रूहानी कलाम में बंदा ज़िंदगी, मौत, नज़्अ़ की सख़्ती, क़ब्र की तन्हाई और हश्र की गर्मी में अल्लाह तआला की रहमत और हुज़ूर सरवरे कायनात ﷺ व औलिया-ए-किराम की शफ़ाअत की इल्तिजा करता है। ओवैस रज़ा क़ादरी की आवाज़ में यह कलाम हर महफ़िल में समां बाँध देता है। आइए इस मुकम्मल नातिया कलाम के लिरिक्स, आसान तर्जुमा और शजरा शरीफ़ की फ़ज़ीलत को समझें।
या इलाही हर जगह तेरी अता का साथ हो (मुकम्मल लिरिक्स)
या इलाही हर जगह तेरी अता का साथ हो
जब पड़े मुश्किल शहे मुश्किल कुशा का साथ हो
या इलाही भूल जाऊँ नज़्अ़ की तकलीफ़ को
शादिये दीदारे हुस्ने मुस्तफ़ा का साथ हो
या इलाही गोरे तीरह् की जब आए सख़्त रात
उनके प्यारे मुँह की सुब्हे जाँ फ़ज़ा का साथ हो
या इलाही जब पड़े महशर में शोरे दारो गीर
अम्न देने वाले प्यारे पेशवा का साथ हो
या इलाही जब ज़बानें बाहर आएँ प्यास से
साहबे कौसर शहे जूदो अता का साथ हो
या इलाही गर्मी-ए-महशर से जब भड़कें बदन
दामने महबूब की ठंडी हवा का साथ हो
या इलाही जब चले तारीक राहे पुल सिरात
आफ़ताबे हाशमी की रोशनी का साथ हो
या इलाही जब रज़ा ख़्वाब-ए-गिराँ से सर उठाए
दौलते बेदार बख़्शे मुस्तफ़ा का साथ हो
कलाम के अहम अशआर का रूहानी तर्जुमा
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शेर 1: मुश्किल कुशा का साथ:
ऐ हमारे रब! दुनिया और आख़िरत के हर मोड़ पर तेरी रहमत शामिल रहे, और जब कोई सख़्त आज़माइश आए, तो मुश्किलों को आसान करने वाले आक़ा हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ और हज़रत अली मुर्तज़ा का वसीला हासिल हो।
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शेर 2: नज़्अ़ (जान निकलने) के वक़्त दीदार:
जब रूह जिस्म से जुदा हो और मौत की सख़्ती हो, तो उस वक़्त प्यारे मुस्तफ़ा ﷺ के नूरानी दीदार की ख़ुशी में मौत का हर दर्द आसान हो जाए।
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शेर 3: क़ब्र की अंधेरी रात में नूर:
क़ब्र (गोरे तीरह्) की तन्हा और ख़ौफ़नाक रात में जब मुनकर-नकीर सवाल करें, तो मुस्तफ़ा करीम के मुक़द्दस चेहरे की रोशनी मेरी क़ब्र को बाग़ बना दे।
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शेर 7: पुल सिरात पर रहनुमाई:
पुल सिरात के अंधेरे रास्ते पर चलते वक़्त आफ़ताबे हाशमी (हुज़ूर ﷺ के नूर) की रोशनी हमें सलामती से पार करा दे।
ओवैस रज़ा क़ादरी और शजरा शरीफ़ की मक़बूलियत
बुलबुले मदीना अलहाज मुहम्मद ओवैस रज़ा क़ादरी ने इस कलाम को अपनी मख़्सूस पुर-दर्द और रूहानी कैफ़ियत में पढ़कर आलमी शोहरत बख़्शी। सिलसिला-ए-क़ादरिया के मुरीदीन और मोमिनीन इसे हर नमाज़ के बाद और शब-ए-जुमा को दुआ के तौर पर कसरत से पढ़ते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. ‘या इलाही हर जगह तेरी अता का साथ हो’ किसकी लिखी हुई है?
यह अज़ीम कलाम इमाम-ए-अहले सुन्नत आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी अलैहिर्रहमा का तहरीर फ़रमूदा है, जो शजरा-ए-क़ादरिया रज़विया का हिस्सा है।
2. ‘गोरे तीरह्’ का क्या मतलब होता है?
‘गोरे तीरह्’ फ़ारसी ज़बान का लफ़्ज़ है, जिसका मतलब ‘अंधेरी और काली क़ब्र’ होता है।
3. क्या शजरा शरीफ़ पढ़ने से क़ब्र के अज़ाब से नजात मिलती है?
जी हाँ, सिलसिला-ए-आलिया क़ादरिया के अज़ीम औलिया (जैसे हुज़ूर ग़ौस-ए-पाक) का वसीला लेकर दुआ माँगना ईमान की हिफ़ाज़त और क़ब्र की राहत का सबब है।
4. ओवैस रज़ा क़ादरी की आवाज़ में यह कलाम कहाँ सुना जाता है?
ओवैस रज़ा क़ादरी की आवाज़ में यह नात शरीफ़ महफ़िले नात, मिलाद और रूहानी इज्तिमाआत में दुनिया भर के मुसलमान बड़े ज़ौक़-ओ-शौक़ से सुनते हैं।
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