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48 Surah Al Fatah: सूरह अल-फ़तह हिंदी तर्जुमा, फ़त्हे मुबीन व तफ़सीर
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48 Surah Al Fatah: सूरह अल-फ़तह हिंदी तर्जुमा, फ़त्हे मुबीन व तफ़सीर

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48 Surah Al Fatah (सूरह अल-फ़तह) क़ुरआन मजीद की 48वीं मदनी सूरह है जो 26वें पारे में मौजूद है। यह सूरह 6 हिजरी में सुलह हुदैबिया से मदीना मुनव्वरा वापसी के सफ़र में नाज़िल हुई थी। अल्लाह तआला ने सुलह हुदैबिया को “फ़त्हे मुबीन” (खुली और रौशन फ़तह) क़रार दिया क्योंकि इसी सुलह के नतीजे में फ़तहे मक्का का रास्ता हमवार हुआ।

इस अज़ीम सूरह में बैअते रिज़वान का ज़िक्र है जहाँ दरख़्त के नीचे सहाबा-ए-किराम ने रसूलुल्लाह ﷺ के दस्त-ए-मुबारक पर जानिसारी की बैअत की और अल्लाह ने उन तमाम सहाबा से अपनी रिज़ा व ख़ुशनूदी का एलान फ़रमाया (आयत 18)। सूरह की आख़िरी आयत में सहाबा की मुक़द्दस सिफ़ात का अज़ीम बयान है। यहाँ कन्ज़ुल ईमान तर्जुमा पेश है।

Table of Contents

📌 हदीस शरीफ़: सूरह फ़तह दुनिया व मा-फ़ीहा से बेहतर

अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ‎ﷺ‎ ने इरशाद फ़रमाया: “आज रात मुझ पर एक ऐसी सूरह नाज़िल हुई है जो मुझे दुनिया और जो कुछ दुनिया में है उन सब से ज़्यादा महबूब है।” फिर आपने तिलावत फ़रमाई: ‘इन्ना फ़तहना लका फ़तहम मुबीना’ (बेशक हमने तुम्हारे लिए रौशन फ़तह फ़रमा दी)।

📚 हवाला: सहीह बुख़ारी, हदीस: 4833, 5012; जामिअ तिर्मिज़ी, हदीस: 3262

1. 48 Surah Al Fatah का तारुफ़ व ओवरव्यू

मापदंड तफ़सील
सूरह नम्बर 48वीं सूरह
नुज़ूल का मक़ाम मदनी सूरह (हुदैबिया के सफ़र से वापसी पर)
कुल रूकू व आयतें 4 रूकू, 29 आयतें
पारा (जुज़) 26वाँ पारा (हामीम)
ख़ास फ़ज़ीलत व मौज़ू फ़त्हे मुबीन (सुलह हुदैबिया), बैअते रिज़वान (आयत 18), सहाबा की अज़ीम शान (आयत 29)

2. सूरह अल-फ़तह की अज़ीम फ़ज़ीलतें और शरई अहकाम

  • अज़ीम सवाब व मग़फ़िरत: अहादीस-ए-मुबारका में इस सूरह की तिलावत की बेहिसाब बरकतें और गुनाहों की मुआफ़ी की बशारत आई है।
  • रूहानी सुकून व हिफ़ाज़त: बुज़ुर्गाने दीन के मामूलात में रोज़ाना इसकी तिलावत से दिलों को सुकून और ईमान को तक़वियत मिलती है।
  • आसान रहनुमाई: हर मुसलमान के लिए आसान हिंदी तर्जुमे के साथ क़ुरआनी तालीमात को समझना और उन पर अमल करना लाज़िम है।

3. 48 Surah Al Fatah: मुकम्मल अरबी मतन, हिंदी तर्जुमा व तफ़सीर

48 सूरए फ़त्ह – 48 Surah-Fatah

सूरए फ़त्ह मदनी सूरत है इसमें चार रूकू, उन्तीस आयतें, पाँच सौ अड़सठ

📖
सूरह अल-फ़तह – पहला रूकू

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
تِلَاوَةُ الْقُرْآنِ الْكَرِيمِ
पहला रूकू (अरबी तिलावत)
إِنَّا فَتَحْنَا لَكَ فَتْحًا مُّبِينًا

لِّيَغْفِرَ لَكَ اللَّهُ مَا تَقَدَّمَ مِن ذَنبِكَ وَمَا تَأَخَّرَ وَيُتِمَّ نِعْمَتَهُ عَلَيْكَ وَيَهْدِيَكَ صِرَاطًا مُّسْتَقِيمًا

وَيَنصُرَكَ اللَّهُ نَصْرًا عَزِيزًا

هُوَ الَّذِي أَنزَلَ السَّكِينَةَ فِي قُلُوبِ الْمُؤْمِنِينَ لِيَزْدَادُوا إِيمَانًا مَّعَ إِيمَانِهِمْ ۗ وَلِلَّهِ جُنُودُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ وَكَانَ اللَّهُ عَلِيمًا حَكِيمًا

لِّيُدْخِلَ الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا وَيُكَفِّرَ عَنْهُمْ سَيِّئَاتِهِمْ ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عِندَ اللَّهِ فَوْزًا عَظِيمًا

وَيُعَذِّبَ الْمُنَافِقِينَ وَالْمُنَافِقَاتِ وَالْمُشْرِكِينَ وَالْمُشْرِكَاتِ الظَّانِّينَ بِاللَّهِ ظَنَّ السَّوْءِ ۚ عَلَيْهِمْ دَائِرَةُ السَّوْءِ ۖ وَغَضِبَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ وَلَعَنَهُمْ وَأَعَدَّ لَهُمْ جَهَنَّمَ ۖ وَسَاءَتْ مَصِيرًا

وَلِلَّهِ جُنُودُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ وَكَانَ اللَّهُ عَزِيزًا حَكِيمًا

إِنَّا أَرْسَلْنَاكَ شَاهِدًا وَمُبَشِّرًا وَنَذِيرًا

لِّتُؤْمِنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَتُعَزِّرُوهُ وَتُوَقِّرُوهُ وَتُسَبِّحُوهُ بُكْرَةً وَأَصِيلًا

إِنَّ الَّذِينَ يُبَايِعُونَكَ إِنَّمَا يُبَايِعُونَ اللَّهَ يَدُ اللَّهِ فَوْقَ أَيْدِيهِمْ ۚ فَمَن نَّكَثَ فَإِنَّمَا يَنكُثُ عَلَىٰ نَفْسِهِ ۖ وَمَنْ أَوْفَىٰ بِمَا عَاهَدَ عَلَيْهُ اللَّهَ فَسَيُؤْتِيهِ أَجْرًا عَظِيمًا

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)

(1) सूरए फ़त्ह मदनी सूरत है इसमें चार रूकू, उन्तीस आयतें, पाँच सौ अड़सठ कलिमे और दो हज़ार पाँच सौ उन्सठ अक्षर है.

बेशक हमने तुम्हारे लिये रौशन फ़त्ह फ़रमा दी(2){1}

(2) इन्ना फतहना हुदैबिय्यह से वापस होते हुए हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर नाज़िल हुई. हुज़ूर को इसके नाज़िल होने से बहुत ख़ुशी हुई और सहाबा ने हुज़ूर को मुबारक बादे दीं. (बुख़ारी, मुस्लिम, तिरमिज़ी) हुदैबिय्यह एक कुंआ है मक्कए मुकर्रमा के नज़्दीक. संक्षिप्त विवरण यह है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ख़्वाब देखा कि हुज़ूर अपने सहाबा के हमराह अम्न के साथ मक्कए मुकर्रमा में दाख़िल हुए. कोई सर मुँडाए, कोई बाल छोटे कराए हुए, काबए मुअज़्ज़मा मे दाख़िल हुए और काबे की कुंजी ली. तवाफ़ फ़रमाया, उमरा किया. सहाबा को इस ख़्वाब की ख़बर दी. सब ख़ुश हुए. फिर हुज़ूर ने उमरे का इरादा किया और एक हज़ार चार सौ सहाबा के साथ पहली ज़िलक़अदा सन छ हिजरी को रवाना हुए. ज़ुल हलीफ़ा में पहुंचकर वहाँ मस्जिद में दो रकअतें पढ़कर उमरे का एहराम बाँधा और हुज़ूर के साथ अक्सर सहाबा ने भी. कुछ सहाबा ने जोहफ़ा से एहराम बाँधा . राह में पानी ख़त्म हो गया. सहाबा ने अर्ज़ किया कि पानी लश्कर में बिल्कुल नहीं है सिवाय हुज़ूर के आफ़ताबे यानी लोटे के कि उसमे थोड़ा पानी बाक़ी है. हुज़ूर ने अफ़ताबे में दस्ते मुबारक डाला तो नूरानी उंगलियों से चश्मे फूट निकले. तमाम लश्कर ने पिया, वुज़ू किया. जब उस्फ़ान मक़ाम पर पहुंचे तो ख़बर आई कि कुफ़्फ़ारे क़ुरैश बड़ी तैयारी से जंग के लिये उतावले हैं. जब हुदैबिय्यह पहुंचे तो उसका पानी ख़त्म हो गया. एक बूंद न रहा. गर्मी बहुत सख़्त थी. हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने कुंएं में कुल्ली फ़रमाई. उसकी बरकत से कुंआ पानी से भर गया, सब ने पिया, ऊंटों को पिलाया. यहाँ कुफ़्फ़ारे क़ुरैश की तरफ़ से हाल मालूम करने के लिये कई व्यक्ति भेजे गए. सबने जाकर यही बयान किया कि हुज़ूर उमरे के लिये आए हैं. जंग का इरादा नहीं है. लेकिन उन्हें यक़ीन न आया आख़िरकार उन्होंने अर्वा बिन मसऊद सक़फ़ी को जो ताइफ़ के बड़े सरदार और अरब के बहुत मालदार आदमी थे, हालात की जांच के लिये भेजा. उन्होंने आकर देखा कि हुज़ूर दस्ते मुबारक धोते हैं तो सहाबा तबर्रूक के लिये वह धोवन हासिल करने को टूट पड़ते हैं. अगर हुज़ूर कभी थूकते हैं तो लोग उसे हासिल करने की कोशिश करते हैं और जिसको वह मिल जाता है वह अपने चेहरे और बदन पर बरकत के लिये मलता है. कोई बाल हुज़ूर का गिरने नहीं पाता. सहाबा उसको बहुत अदब के साथ लेते और जान से ज़्यादा अज़ीज़ रखते हैं. जब हुज़ूर कलाम फ़रमाते हैं तो सब साकित हो जाते हैं. हुज़ूर के अदब और सम्मान के कारण कोई व्यक्ति नज़र ऊपर को नहीं उठाता. अर्वा ने क़ुरैश से जाकर यह सारा हाल बयान किया और कहा कि मैं फ़ारस, रोम और मिस्र के दरबारों में गया हूँ मैं ने किसी बादशाह की यह महानता नहीं देखी जो मुहम्मद की उन सहाबा में है. मुझे डर है कि तुम उनके मुक़ाबले में सफल न हो सकोगे. क़ुरैश ने कहा ऐसी बात मत कहो. हम इस साल उन्हें वापस कर देंगे. वो अगले साल आएं. अर्वा ने कहा मुझे डर है कि तुम्हें कोई मुसीबत पहुंचे. यह कहकर वह अपने साथियों समेत ताइफ़ चले गए और इस घटना के बाद अल्लाह तआला ने उन्हें इस्लाम से नवाज़ा. यहीं हुज़ूर ने अपने सहाबा से बैअत ली, इसको बैअते रिज़वान कहते हैं. बैअत की ख़बर से काफ़िर बहुत भयभीत हुए और उनके सलाहकारों ने यही मुनासिब समझा कि सुलह कर लें. चुनांन्चे सुलहनामा लिखा गया और अगले साल हुज़ूर का तशरीफ़ लाना क़रार पाया और यह सुलह मुसलमानों के हित में बड़ी लाभदायक साबित हुई बल्कि नतीजों के अनुसार विजयी सिद्ध हुई. इसी लिये अक्सर मुफ़स्सिरीन फ़त्ह से सुलह हुदैबिय्यह मुराद लेते हैं और कुछ इस्लाम की सारी फ़ूतूहात, जो आगे आने वाली थीं और भूतकाल की क्रिया से उनका ज़िक्र उनके निश्चित होने की वजह से है. (ख़ाज़िन और रूहुल बयान)

ताकि अल्लाह तुम्हारे कारण से गुनाह बख़्शे तुम्हारे अगलों के और तुम्हारे पिछलों के (3)

(3) और तुम्हारी बदौलत उम्मत की मग़फ़िरत फ़रमाए.(ख़ाज़िन और रूहुल बयान)

और अपनी नेअमतें तुम पर पूरी कर दे (4)

(4) दुनियावी भी और आख़िरत का भी.

और तुम्हें सीधी राह दिखा दे (5){2}

(5) रिसालत की तबलीग़ और रियासत के कामों की मज़बूती में (बैज़ावी)

और अल्लाह तुम्हारी ज़बरदस्त मदद फ़रमाए(6){3}

(6) दुश्मनों पर भरपूर ग़लबा अता करे.

वही है जिसने ईमान वालों के दिलों में इत्मीनान उतारा ताकि उन्हें यक़ीन पर यक़ीन बढ़े(7)

(7) और भरपूर अक़ीदे के बावुजूद नफ़्स का इत्मीनान हासिल हो.

और अल्लाह ही की मिल्क (स्वामित्व में) हैं तमाम लश्कर आसमानों और ज़मीन के(8)

(8) वह क़ादिर है जिससे चाहे अपने रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की मदद फ़रमाए. आसमान ज़मीन के लश्करों से या तो आसमान और ज़मीन के फ़रिश्ते मुराद है या आसमानों के फ़रिश्ते और ज़मीन के जानदार.

और अल्लाह इल्म व हिकमत (बोध) वाला है(9){4}

(9) उसने ईमान वालों के दिलों को तसल्ली और विजय का वादा फ़रमाया.

ताकि ईमान वाले मर्दों और ईमान वाली औरतों को बाग़ों में ले जाए जिनके नीचे नेहरें बहे हमेशा उनमें रहें और उनकी बुराइयाँ उनसे उतार दे, और यह अल्लाह के यहाँ बड़ी कामयाबी है{5} और अज़ाब दे मुनाफ़िक़ (दोग़ले) मर्दों और मुनाफ़िक़ औरतों और मुश्रिक मर्दों और मुश्रिक औरतों को जो अल्लाह पर गुमान रखते हैं(10)

(10) कि वह अपने रसूल सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और उनपर ईमान लाने वालों की मदद न फ़रमाएगा.

उन्हीं पर है बड़ी गर्दिश (मुसीबत) (11)

(11) अज़ाब और हलाकत का.

और अल्लाह ने उन पर ग़ज़ब फ़रमाया और उन्हें लअनत की और उनके लिये जहन्नम तैयार फ़रमाया, और वह क्या ही बुरा अंजाम {6} और अल्लाह ही की मिल्क में आसमानों और ज़मीन के सब लश्कर, और अल्लाह इज़्ज़त व हिकमत (बोध) वाला है {7} बेशक हमने तुम्हें भेजा हाज़िर व नाज़िर (सर्व द्ष्टा) (12)

(12) अपनी उम्मत के कर्मों और हालात का. ताकि क़यामत के दिन उनकी गवाही दो.

और ख़ुशी और डर सुनाता (13){8}

(13) यानी सच्चे ईमान वालों को जन्नत की ख़ुशी और नाफ़रमानों को दोज़ख़ के अज़ाब का डर सुनाता.

ताकि ऐ लोगों तुम अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ और रसूल की तअज़ीम व तौक़ीर (आदर व सत्कार) करो, और सुबह शाम अल्लाह की पाकी (प्रशंसा) बोलो(14) {9}

(14) सुब्ह की तस्बीह में नमाज़े फ़ज्र और शाम की तस्बीह में बाक़ी चारों नमाज़ें दाख़िल हैं.

वो जो तुम्हारी बैअत करते (अपना हाथ तुम्हारे हाथ में देते) हैं(15)

(15) इस बैअत से मुराद बैअते रिज़वान है जो नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हुदैबिय्यह में ली थी.

वो तो अल्लाह ही से बैअत करते हैं(16)

(16) क्योंकि रसूल से बैअत करना अल्लाह तआला ही से बैअत करना है जैसे कि रसूल की इताअत अल्लाह तआला की इताअत है.

उनके हाथों पर(17)

(17) जिनसे उन्होंने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की बैअत का सम्मान प्राप्त किया.

अल्लाह का हाथ है, तो जिसने एहद तोड़ा उसने अपने बड़े एहद को तोड़ा, (18)

(18) इस एहद तोड़ने का वबाल उसी पर पड़ेगा.

और जिसने पूरा किया वह एहद जो उसने अल्लाह से किया था तो बहुत जल्द अल्लाह उसे बड़ा सवाब देगा (19) {10}

(19) यानी हुदैबिय्यह से तुम्हारी वापसी के वक़्त.

48 सूरए फ़त्ह 

📖
सूरह अल-फ़तह – दूसरा रूकू

تِلَاوَةُ الْقُرْآنِ الْكَرِيمِ
दूसरा रूकू (अरबी तिलावत)
سَيَقُولُ لَكَ الْمُخَلَّفُونَ مِنَ الْأَعْرَابِ شَغَلَتْنَا أَمْوَالُنَا وَأَهْلُونَا فَاسْتَغْفِرْ لَنَا ۚ يَقُولُونَ بِأَلْسِنَتِهِم مَّا لَيْسَ فِي قُلُوبِهِمْ ۚ قُلْ فَمَن يَمْلِكُ لَكُم مِّنَ اللَّهِ شَيْئًا إِنْ أَرَادَ بِكُمْ ضَرًّا أَوْ أَرَادَ بِكُمْ نَفْعًا ۚ بَلْ كَانَ اللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرًا

بَلْ ظَنَنتُمْ أَن لَّن يَنقَلِبَ الرَّسُولُ وَالْمُؤْمِنُونَ إِلَىٰ أَهْلِيهِمْ أَبَدًا وَزُيِّنَ ذَٰلِكَ فِي قُلُوبِكُمْ وَظَنَنتُمْ ظَنَّ السَّوْءِ وَكُنتُمْ قَوْمًا بُورًا

وَمَن لَّمْ يُؤْمِن بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ فَإِنَّا أَعْتَدْنَا لِلْكَافِرِينَ سَعِيرًا

وَلِلَّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ يَغْفِرُ لِمَن يَشَاءُ وَيُعَذِّبُ مَن يَشَاءُ ۚ وَكَانَ اللَّهُ غَفُورًا رَّحِيمًا

سَيَقُولُ الْمُخَلَّفُونَ إِذَا انطَلَقْتُمْ إِلَىٰ مَغَانِمَ لِتَأْخُذُوهَا ذَرُونَا نَتَّبِعْكُمْ ۖ يُرِيدُونَ أَن يُبَدِّلُوا كَلَامَ اللَّهِ ۚ قُل لَّن تَتَّبِعُونَا كَذَٰلِكُمْ قَالَ اللَّهُ مِن قَبْلُ ۖ فَسَيَقُولُونَ بَلْ تَحْسُدُونَنَا ۚ بَلْ كَانُوا لَا يَفْقَهُونَ إِلَّا قَلِيلًا

قُل لِّلْمُخَلَّفِينَ مِنَ الْأَعْرَابِ سَتُدْعَوْنَ إِلَىٰ قَوْمٍ أُولِي بَأْسٍ شَدِيدٍ تُقَاتِلُونَهُمْ أَوْ يُسْلِمُونَ ۖ فَإِن تُطِيعُوا يُؤْتِكُمُ اللَّهُ أَجْرًا حَسَنًا ۖ وَإِن تَتَوَلَّوْا كَمَا تَوَلَّيْتُم مِّن قَبْلُ يُعَذِّبْكُمْ عَذَابًا أَلِيمًا

لَّيْسَ عَلَى الْأَعْمَىٰ حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْأَعْرَجِ حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْمَرِيضِ حَرَجٌ ۗ وَمَن يُطِعِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ يُدْخِلْهُ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ۖ وَمَن يَتَوَلَّ يُعَذِّبْهُ عَذَابًا أَلِيمًا

अब तुम से कहेंगे जो गंवार पीछे रह गए थे(1)

(1) क़बीलए ग़िफ़ार और मुज़ैय्यिनह व जुहैनह व अशजअ व असलम के, जब कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हुदैबिय्यह के साल उमरा की नियत से मक्कए मुकर्रमा का इरादा फ़रमाया तो मदीने के आस पास के गाँवों वाले और सहराओ में रहने वाले क़ुरैश के डर से आपके साथ जाने से रूके जबकि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उमरे का एराम बाँधा था और कर्बानी के जानवर साथ थे और इससे साफ़ ज़ाहिर था कि जंग का इरादा नहीं है फिर भी बहुत से लोगों पर जाना बोझ हुआ और वो काम का बहाना करके रह गए और उनका गुमान यह था कि क़ुरैश बहुत ताक़तवर हैं. मुसलमान उनसे बचकर न आएंगे सब वही हलाक हो जाएंगे. अब जबकि अल्लाह की मदद से मामला उनके गुमान के बिल्कुल विपरीत हुआ तो उन्हें अपने न जाने पर अफ़सोस होगा और मुअज़िरत करेंगे.

कि हमें हमारे माल और हमारे घर वालों ने जाने से मश्ग़ूल रखा(2)

(2) क्योंकि औरतें और बच्चे अकेले थे और उनका कोई ख़बरगीरी करने वाला न था इसलिये हम बेबस हो गए.

अब हुज़ूर हमारी मग़फ़िरत चाहें(3)

(3) अल्लाह उनको झुटलाता है.

अपनी ज़बानों से वो बात कहते हैं जो उनके दिलों में नहीं (4)

(4) यानी वो बहाना बनाने और माफ़ी मांगने में झूटे हैं.

तुम फ़रमाओ तो अल्लाह के सामने किसे तुम्हारा कुछ इख़्तियार है अगर वह तुम्हारा बुरा चाहे या तुम्हारी भलाई का इरादा फ़रमाए बल्कि अल्लाह को तुम्हारे कामों की ख़बर है {11} बल्कि तुम तो ये समझे हुए थे कि रसूल और मुसलमान हरगिज़ घरों को वापस न आएंगे (5)

(5) दुश्मन उन सबका वहीं ख़ात्मा कर देंगे.

और उसी को अपने दिलों में भला समझे हुए थे और तुमने बुरा गुमान किया(6)

(6) कुफ़्र और फ़साद के ग़लबे का और अल्लाह के वादे के पूरा न होने का.

और तुम हलाक होने वाले लोग थे(7){12}

(7) अल्लाह के अज़ाब के हक़दार.

और जो ईमान न लाए अल्लाह और उसके रसूल पर (8)

(8) इस आयत में चुनौती है कि जो अल्लाह तआला पर और उसके रसूल पर ईमान न लाए, उनमें से किसी एक का भी इन्कारी हों, वह काफ़िर है.

तो बेशक हमने काफ़िरों के लिये भड़कती आग तैयार कर रखी है {13} और अल्लाह ही के लिये है आसमानों और ज़मीन की सल्तनत जिसे चाहे बख़्शे और जिसे चाहे अज़ाब करे (9)

(9) यह सब उसकी मर्ज़ी और हिकमत पर है.

और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है{14} अब कहेंगे पीछे बैठ रहने वाले(10)

(10) जो हुदैबिय्यह की हाज़िरी से लाचार रहे, ऐ ईमान वालों.

जब तुम ग़नीमतें लेने चलो(11)

(11) ख़ैबर की. इसका वाकिआ यह था कि जब मुसलमान सुलह हुदैबिय्यह से फ़ारिग़ होकर वापस हुए तो अल्लाह तआला ने उनसे ख़ैबर की विजय का वादा फ़रमाया और वहाँ की ग़नीमतें हुदैबिय्यह में हाज़िर होने वालों के लिये मख़सूस कर दीं गई. जब मुसलमानों के ख़ैबर की तरफ़ रवाना होने का वक़्त आया तो उन लोगों को लालच आया और उन्होंने ग़नीमत के लालच में कहा.

तो हमें भी अपने पीछे आने दो(12)

(12) यानी हम भी ख़ैबर को तुम्हारे साथ चलें और जंग में शरीक हों अल्लाह तआला फ़रमाता है.

वो चाहते हैं अल्लाह का कलाम बदल दें(13)

(13)यानी अल्लाह तआला का वादा तो जो हुदैबिय्यह वालों के लिये फ़रमाया था कि ख़ैबर की ग़नीमत ख़ास उनके लिये है.

तुम फ़रमाओ हरगिज़ तुम हमारे साथ न आओ अल्लाह न पहले से यूंही फ़रमा दिया है (14)

(14) यानी हमारे मदीना आने से पहले.

तो अब कहेंगे बल्कि तुम हमसे जलते हो(15)

(15) और यह गवारा नहीं करते कि हम तुम्हारे साथ ग़नीमतें पाएं. अल्लाह तआला फ़रमाता है.

बल्कि वो बात न समझते थे(16)

(16) दीन की.

मगर थोड़ी (17){15}

(17) यानी मात्र दुनिया की. यहाँ तक कि उनका ज़बानी इक़रार भी दुनिया ही की ग़रज़ से था और आख़िरत की बातों को बिल्कुल नहीं समझते थे. (जुमल)

उन पीछे रह गए हुए गंवारों से फ़रमाओ (18)

(18) जो विभिन्न क़बीलों के लोग हैं और उनमें कुछ ऐसे भी हैं जिनके तौबह करने की आस की जाती है. कुछ ऐसे भी हैं जो दोहरी प्रवृत्ति या दोग़लेपन में बहुत पुख़्ता और सख़्ता हैं. उन्हें आज़माइश में डालना मन्ज़ूर है ताकि तौबह करने वालों और न करने वालों में फ़र्क़ हो जाए इसलिये हुक्म हुआ कि उनसे फ़रमा दीजिये.

बहुत जल्द तुम एक सख़्त लड़ाई वाली क़ौम की तरफ़ बुलाए जाओगे (19)

और पढ़ें

नमाज़ की जानकारी के लिए नमाज़ का बयान और पाकी के लिए वज़ू का तरीक़ा पढ़ें।

4. 48 Surah Al Fatah से मुतअल्लिक़ अक्सर पूछे जाने वाले सवालात (FAQ)

❓ 48 Surah Al Fatah में फ़त्हे मुबीन से क्या मुराद है?

जम्हूर मुफ़स्सिरीन और सहीह अहादीस के मुताबिक़ फ़त्हे मुबीन से मुराद सुलह हुदैबिया है, क्योंकि इसी सुलह के बाद इस्लाम तेज़ी से फैला और चंद ही सालों में मक्का मुकर्रमा बिना जंग के फ़तह हो गया।

❓ सूरह फ़तह में बैअते रिज़वान की क्या फ़ज़ीलत आई है?

आयत 18 में अल्लाह तआला ने फ़रमाया: “बेशक अल्लाह राज़ी हुआ ईमान वालों से जब वो उस दरख़्त के नीचे तुमसे बैअत करते थे, तो अल्लाह ने जाना जो उनके दिलों में था और उन पर तस्कीन उतारी।”

❓ सूरह अल-फ़तह में कुल कितने रूकू और आयतें हैं?

सूरह अल-फ़तह में कुल 4 रूकू और 29 आयतें हैं। यह 26वें पारे में मौजूद है।

❓ सहाबा-ए-किराम की शान में सूरह फ़तह की आख़िरी आयत क्या फ़रमाती है?

आयत 29 में इरशाद है: “मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं और जो उनके साथ हैं वो काफ़िरों पर सख़्त हैं और आपस में निहायत रहम-दिल, तुम उन्हें देखोगे रुकूअ और सजदे करते हुए, अल्लाह का फ़ज़्ल और उसकी रज़ा तलाश करते हुए।”

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