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47 Surah Al Muhammad: सूरह मुहम्मद हिंदी तर्जुमा, फ़ज़ीलत व तफ़सीर
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47 Surah Al Muhammad: सूरह मुहम्मद हिंदी तर्जुमा, फ़ज़ीलत व तफ़सीर

admin
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47 Surah Al Muhammad (सूरह मुहम्मद) क़ुरआन मजीद की 47वीं मदनी सूरह है जो 26वें पारे में वाक़ेअ है। इस सूरह की अज़ीम शान यह है कि इसकी दूसरी आयत में हमारे प्यारे आक़ा व मौला हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ‎ﷺ‎ का मुबारक नामे नामी ज़िक्र हुआ है।

इस सूरह का दूसरा नाम सूरह अल-क़िताल भी है क्योंकि इसमें दीन की हिफ़ाज़त, हक़ व बातिल के मारके और मुनाफ़िक़ीन की ख़ामियों को वाज़ेह किया गया है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि जो लोग रसूलुल्लाह ﷺ पर नाज़िल शुदा क़ुरआन पर ईमान लाए, अल्लाह ने उनकी बुराइयाँ दूर फ़रमा दीं और उनके हाल की इस्लाह फ़रमाई। यहाँ कन्ज़ुल ईमान तर्जुमा दस्तयाब है।

Table of Contents

📌 हदीस शरीफ़: रसूलुल्लाह ﷺ की पैरवी और आमाल की क़बूलियत

रसूलुल्लाह ‎ﷺ‎ ने इरशाद फ़रमाया: “मेरी पूरी उम्मत जन्नत में जाएगी सिवाए उसके जिसने इन्कार किया।” सहाबा ने अर्ज़ किया: या रसूलल्लाह! इन्कार कौन करेगा? फ़रमाया: “जिसने मेरी फ़रमांबरदारी की वो जन्नत में दाख़िल हुआ और जिसने मेरी नाफ़रमानी की उसने इन्कार किया।” (और सूरह मुहम्मद की आयत 33 में हुक्म है: अल्लाह की इताअत करो और रसूल की इताअत करो और अपने आमाल बातिल न करो)।

📚 हवाला: सहीह बुख़ारी, हदीस: 7280; सहीह मुस्लिम, हदीस: 1835

1. 47 Surah Al Muhammad का तारुफ़ व ओवरव्यू

मापदंड तफ़सील
सूरह नम्बर 47वीं सूरह
नुज़ूल का मक़ाम मदनी सूरह
कुल रूकू व आयतें 4 रूकू, 38 आयतें
पारा (जुज़) 26वाँ पारा (हामीम)
ख़ास फ़ज़ीलत व मौज़ू इस्म-ए-गिरामी मुहम्मद ﷺ (आयत 2), जिहाद व क़िताल, आमाल की बक़ा

2. सूरह मुहम्मद की अज़ीम फ़ज़ीलतें और शरई अहकाम

  • अज़ीम सवाब व मग़फ़िरत: अहादीस-ए-मुबारका में इस सूरह की तिलावत की बेहिसाब बरकतें और गुनाहों की मुआफ़ी की बशारत आई है।
  • रूहानी सुकून व हिफ़ाज़त: बुज़ुर्गाने दीन के मामूलात में रोज़ाना इसकी तिलावत से दिलों को सुकून और ईमान को तक़वियत मिलती है।
  • आसान रहनुमाई: हर मुसलमान के लिए आसान हिंदी तर्जुमे के साथ क़ुरआनी तालीमात को समझना और उन पर अमल करना लाज़िम है।

3. 47 Surah Al Muhammad: मुकम्मल अरबी मतन, हिंदी तर्जुमा व तफ़सीर

📖
सूरह मुहम्मद – पहला रूकू

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
تِلَاوَةُ الْقُرْآنِ الْكَرِيمِ
पहला रूकू (अरबी तिलावत)
الَّذِينَ كَفَرُوا وَصَدُّوا عَن سَبِيلِ اللَّهِ أَضَلَّ أَعْمَالَهُمْ
وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَآمَنُوا بِمَا نُزِّلَ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَهُوَ الْحَقُّ مِن رَّبِّهِمْ ۙ كَفَّرَ عَنْهُمْ سَيِّئَاتِهِمْ وَأَصْلَحَ بَالَهُمْ
ذَٰلِكَ بِأَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا اتَّبَعُوا الْبَاطِلَ وَأَنَّ الَّذِينَ آمَنُوا اتَّبَعُوا الْحَقَّ مِن رَّبِّهِمْ ۚ كَذَٰلِكَ يَضْرِبُ اللَّهُ لِلنَّاسِ أَمْثَالَهُمْ
فَإِذَا لَقِيتُمُ الَّذِينَ كَفَرُوا فَضَرْبَ الرِّقَابِ حَتَّىٰ إِذَا أَثْخَنتُمُوهُمْ فَشُدُّوا الْوَثَاقَ فَإِمَّا مَنًّا بَعْدُ وَإِمَّا فِدَاءً حَتَّىٰ تَضَعَ الْحَرْبُ أَوْزَارَهَا ۚ ذَٰلِكَ وَلَوْ يَشَاءُ اللَّهُ لَانتَصَرَ مِنْهُمْ وَلَٰكِن لِّيَبْلُوَ بَعْضَكُم بِبَعْضٍ ۗ وَالَّذِينَ قُتِلُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ فَلَن يُضِلَّ أَعْمَالَهُمْ
سَيَهْدِيهِمْ وَيُصْلِحُ بَالَهُمْ
وَيُدْخِلُهُمُ الْجَنَّةَ عَرَّفَهَا لَهُمْ
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِن تَنصُرُوا اللَّهَ يَنصُرْكُمْ وَيُثَبِّتْ أَقْدَامَكُمْ
وَالَّذِينَ كَفَرُوا فَتَعْسًا لَّهُمْ وَأَضَلَّ أَعْمَالَهُمْ
ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَرِهُوا مَا أَنزَلَ اللَّهُ فَأَحْبَطَ أَعْمَالَهُمْ
۞ أَفَلَمْ يَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَيَنظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ دَمَّرَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ ۖ وَلِلْكَافِرِينَ أَمْثَالُهَا
ذَٰلِكَ بِأَنَّ اللَّهَ مَوْلَى الَّذِينَ آمَنُوا وَأَنَّ الْكَافِرِينَ لَا مَوْلَىٰ لَهُمْ

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) मदनी है. इसमें चार रूकू, अड़तीस आयतें, पाँच सौ अट्ठावन कलिमे और दो हज़ार चार सौ पछतर अक्षर है.

जिन्होंने कुफ़्र किया और अल्लाह की राह से रोका(2)
(2) यानी जो लोग ख़ुद इस्लाम में दाख़िल न हुए और दूसरों को उन्होंने इस्लाम से रोका.

अल्लाह ने उनके कर्म बर्बाद किये(3){1}
(3) जो कुछ भी उन्होंने किए हों, भूखों को खिलाया हो या क़ैदियों को छुड़ाया हो या ग़रीबों की मदद की हो या मस्जिदे हराम यानी ख़ानए काबा की इमारत में कोई ख़िदमत की हो, सब बर्बाद हुई. आख़िरत में उसका कुछ सवाब नहीं. ज़ुहाक का क़ौल है कि मुराद यह है कि काफ़िरों ने सैयदे आलम सल्ल्ल्लाहो अलैहे वसल्लम के लिये जो मक्र सोचे थे और बहाने बनाए थे अल्लाह तआला ने उनके वो तमाम काम बातिल कर दिये.

और जो ईमान लाए और अच्छे काम किये और उसपर ईमान लाए जो मुहम्मद पर उतारा गया(4)
(4) यानी क़ुरआने पाक.

और वही उनके रब के पास से हक़ है अल्लाह ने उनकी बुराइयाँ उतार दीं और उनकी हालतें संवार दीं(5){2}
(5) दीन के कामों में तौफ़ीक़ अता फ़रमाकर और दुनिया में उनके दुश्मनों के मुक़ाबिल उनकी मदद फ़रमाकर. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो तआला अन्हुमा ने फ़रमाया कि उनकी ज़िन्दगी के दिनों में उनकी हिफ़ाज़त फ़रमाकर कि उनसे कोई गुनाह ने हो.

यह इसलिये कि काफ़िर बातिल (असत्य) के पैरो (अनुयायी) हुए और ईमान वालों ने हक़ (सत्य) की पैरवी (अनुकरण) की जो उनके रब की तरफ़ से है (6)
(6) यानी क़ुरआन शरीफ़

अल्लाह लोगों से उनके अहवाल यूंही बयान फ़रमाता है(7){3}
(7) यानी पक्षों के कि काफ़िरों के कर्म अकारत और ईमान वालों की ग़ल्तियाँ भी माफ़.

तो जब काफ़िरों से तुम्हारा सामना हो(8)
(8) यानी जंग हो.

तो गर्दनें मारना है(9)
(9) यानी उनको क़त्ल करो.

यहाँ तक कि जब उन्हें ख़ूब क़त्ल कर लो(10)
(10) यानी बहुतात से क़त्ल कर चुको और बाक़ी को क़ैद करने का मौक़ा आ जाए.

तो मज़बूत बांधो, फिर उसके बाद चाहे एहसान करके छोड़ दो चाहे फिदिया ले लो(11)
(11)  दोनों बातों का इख़्तियार है. मुश्रिकों के क़ैदियों का हुक्म हमारे नज़्दीक यह है कि उन्हें क़त्ल किया जाए या ग़ुलाम बना लिया जाए और एहसान से छोड़ना और फ़िदिया लेना जो इस आयत में बयान किया गया है वह सूरए बराअत की आयत “उक़्तलुल मुश्रिकीन”  से मन्सूख़ हो गया.

यहाँ तक कि लड़ाई अपना बोझ रख दे(12)
(12) यानी जंग ख़त्म हो जाए इस तरह कि मुश्रिक इताअत क़ुबूल कर लें और इस्लाम लाएं.

बात यह है, और अल्लाह चाहता तो आप ही उनसे बदला ले लेता (13)
(13) बग़ैर क़िताल के उन्हें ज़मीन में धंसा कर या उन पर पत्थर बरसाकर या और किसी तरह.

मगर इसलिये(14)
(14) तुम्हें क़िताल का हुक्म दिया.

कि तुम में एक को दूसरे से जांचे (15)
(15) क़िताल में ताकि मुसलमान मक़तूल सवाब पाएं और काफ़िर अज़ाब.

और जो अल्लाह की राह में मारे गए अल्लाह हरगिज़ उनके अमल ज़ाया न फ़रमाएगा(16){4}
(16) उनके कर्मों का सवाब पूरा पूरा देगा.

जल्द उन्हें राह देगा(17)
(17) ऊंचे दर्जों की तरफ़.

और उनका काम बना देगा{5} और उन्हें जन्नत में ले जाएगा उन्हें उसकी पहचान करा दी है (18){6}
(18) वो जन्नत की मंज़िलों में अजनबी और अनजान की तरह न पहुंचेगें जो किसी जगह जाता है तो उसको हर चीज़ पूछने की हाजत होती है. बल्कि वो जाने पहचाने अन्दाज़ में दाख़िल होंगे अपनी मंज़िलों और ठिकानों को पहचानते होंगे अपनी बीवी और ख़ादिमों को जानते होंगे. हर चीज़ का मौक़ा उनकी जानकारी में होगा जैसे कि वो हमेशा से यहीं के रहने वाले हों.

ऐ ईमान वालो अगर तुम ख़ुदा के दीन की मदद करोगे अल्लाह तुम्हारी मदद करेगा(19)
(19) तुम्हारे दुश्मन के मुक़ाबिल.

और तुम्हारे क़दम जमा देगा(20){7}
(20) जंग में और हुज्जते इस्लाम पर और पुले सिरात पर.

और जिन्होंने कुफ़्र किया तो उनपर तबाही पड़े और अल्लाह उनके अअमाल (कर्म) बर्बाद करे {8} यह इसलिये कि उन्हें नागवार हुआ जो अल्लाह ने उतारा (21)
(21) यानी क़ुरआने पाक. इसलिये कि उसमें शहवात और लज़्ज़तो को छोड़ने और फ़रमाँबरदारी और इबादतों में मेहनत उठाने के आदेश है जो नफ़्स पर भारी गुज़रते हैं.

तो अल्लाह ने उनका किया धरा अकारत किया {9} तो क्या उन्हों ने ज़मीन में सफ़र न किया कि देखते उनसे अगलों का(22)
(22) यानी पिछली उम्मतों का.

कैसा अंजाम हुआ, अल्लाह ने उनपर तबाही डाली(23)
(23) कि उन्हें और उनकी औलाद और उनके माल को सब को हलाक कर दिया.

और उन काफ़िरों के लिये भी वैसी कितनी ही हैं (24){10}
(24) यानी अगर ये काफ़िर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान न लाएं तो उनके लिये पहले जैसी बहुत सी तबाहियाँ हैं.

यह(25)
(25) यानी मुसलमानों का विजयी होना और काफ़िरों का पराजित और ज़लील होना.
इसलिये कि मुसलमानों का मौला अल्लाह है और काफ़िरों का कोई मौला नहीं{11}

📖
सूरह मुहम्मद – दूसरा रूकू

تِلَاوَةُ الْقُرْآنِ الْكَرِيمِ
दूसरा रूकू (अरबी तिलावत)
إِنَّ اللَّهَ يُدْخِلُ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ۖ وَالَّذِينَ كَفَرُوا يَتَمَتَّعُونَ وَيَأْكُلُونَ كَمَا تَأْكُلُ الْأَنْعَامُ وَالنَّارُ مَثْوًى لَّهُمْ
وَكَأَيِّن مِّن قَرْيَةٍ هِيَ أَشَدُّ قُوَّةً مِّن قَرْيَتِكَ الَّتِي أَخْرَجَتْكَ أَهْلَكْنَاهُمْ فَلَا نَاصِرَ لَهُمْ
أَفَمَن كَانَ عَلَىٰ بَيِّنَةٍ مِّن رَّبِّهِ كَمَن زُيِّنَ لَهُ سُوءُ عَمَلِهِ وَاتَّبَعُوا أَهْوَاءَهُم
مَّثَلُ الْجَنَّةِ الَّتِي وُعِدَ الْمُتَّقُونَ ۖ فِيهَا أَنْهَارٌ مِّن مَّاءٍ غَيْرِ آسِنٍ وَأَنْهَارٌ مِّن لَّبَنٍ لَّمْ يَتَغَيَّرْ طَعْمُهُ وَأَنْهَارٌ مِّنْ خَمْرٍ لَّذَّةٍ لِّلشَّارِبِينَ وَأَنْهَارٌ مِّنْ عَسَلٍ مُّصَفًّى ۖ وَلَهُمْ فِيهَا مِن كُلِّ الثَّمَرَاتِ وَمَغْفِرَةٌ مِّن رَّبِّهِمْ ۖ كَمَنْ هُوَ خَالِدٌ فِي النَّارِ وَسُقُوا مَاءً حَمِيمًا فَقَطَّعَ أَمْعَاءَهُمْ
وَمِنْهُم مَّن يَسْتَمِعُ إِلَيْكَ حَتَّىٰ إِذَا خَرَجُوا مِنْ عِندِكَ قَالُوا لِلَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ مَاذَا قَالَ آنِفًا ۚ أُولَٰئِكَ الَّذِينَ طَبَعَ اللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ وَاتَّبَعُوا أَهْوَاءَهُمْ
وَالَّذِينَ اهْتَدَوْا زَادَهُمْ هُدًى وَآتَاهُمْ تَقْوَاهُمْ
فَهَلْ يَنظُرُونَ إِلَّا السَّاعَةَ أَن تَأْتِيَهُم بَغْتَةً ۖ فَقَدْ جَاءَ أَشْرَاطُهَا ۚ فَأَنَّىٰ لَهُمْ إِذَا جَاءَتْهُمْ ذِكْرَاهُمْ
فَاعْلَمْ أَنَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا اللَّهُ وَاسْتَغْفِرْ لِذَنبِكَ وَلِلْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ ۗ وَاللَّهُ يَعْلَمُ مُتَقَلَّبَكُمْ وَمَثْوَاكُمْ

बेशक अल्लाह दाख़िल फ़रमाएगा उन्हें जो ईमान लाए और अच्छे काम किये बाग़ों में जिनके नीचे नेहरें बहें, और काफ़िर बरतते हैं और खाते हैं(1)
(1) दुनिया में थोड़े दिन ग़फ़लत के साथ, अपने अंजाम को भुलाए हुए.

जैसे चौपाए खाएं(2)
(2) और उन्हें तमीज़ न हो कि इस ख़ाने के बाद वो ज़िब्ह किये जाएंगे. यही हाल काफ़िरों का है जो गफ़लत के साथ दुनिया हासिल करने में लगे हुए हैं और आने वाली मुसीबतों का ख़याल भी नहीं करते.

और आग में उनका ठिकाना है{12} और कितने ही शहर कि इस शहर से(3)
(3) यानी मक्के वालों से.

क़ुव्वत में ज़्यादा थे जिसने तुम्हें तुम्हारे शहर से बाहर किया, हमने उन्हें हलाक फ़रमाया तो उनका कोई मददगार नहीं(4) {13}
(4) जो अज़ाब और हलाकत से बचा सके. जब सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने मक्के से हिजरत की और ग़ार की तरफ़ तशरीफ़ ले चले तो मक्के की तरफ़ मुतवज्जह होकर फ़रमाया अल्लाह तआला के शहरों में तू अल्लाह तआला को बहुत प्यारा है और अल्लाह तआला के शहरों में तू मुझे बहुत प्यारा है अगर मुश्रिक मुझे न निकालते तो मैं तुझसे न निकलता. इसपर अल्लाह तआला ने यह आयत उतारी.

तो क्या जो अपने रब की तरफ़ से रौशन दलील पर हो (5)
(5) और वो ईमान वाले हैं कि वो क़ुरआन और नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के चमत्कारों की खुली निशानियों पर भरपूर यक़ीन रखते हैं.

उस(6)
(6) उस काफ़िर मुश्रिक.

जैसा होगा जिसके बुरे अमल (कर्म) उसे भले दिखाए गए और वह अपनी ख़्वाहिशों के पीछे चले(7){14}
(7) और उन्हों ने कुफ़्र और बुतपरस्ती इख़्तियार की, हरगिज़ वो मूमिन और ये काफ़िर एक से नहीं हो सकते और इन दोनों में कुछ भी निस्बत नहीं.

अहवाल उस जन्नत का जिसका वादा परहेज़गारों से है, उसमें ऐसी पानी की नेहरें हैं जो कभी न बिगड़ें (8)
(8) यानी ऐसा लतीफ़ कि न सड़े न उसकी  बू बदले न उसके मज़े में फ़र्क़ आए.

और ऐसे दूध की नेहरें हैं जिसका मज़ा न बदला(9)
(9) दुनिया के दूध के विपरीत कि ख़राब हो जाते हैं.

और ऐसी शराब की नेहरें हैं जिसके पीने में लज़्ज़त है(10)
(10) ख़ालिस लज़्ज़त ही लज़्ज़त. व दुनिया की शराबों की तरह उसका मज़ाब ख़राब, न उसमें मैल कुचैल, न ख़राब चीज़ों की मिलावट. न वो सड़कर बनी, न उसके पीने से अक़्ल घटे, न सर चकराए, न ख़ुमार आए, न दर्दे सर पैदा हो, ये सब आफ़तें दुनिया ही कि शराब में हैं, वहाँ की शराब इन सारे दोषों से पाक, अत्यन्त मज़ेदार, फ़रहत देने वाली और अच्छी लगने वाली.

और ऐसी शहद की नेहरें हैं साफ़ किया गया(11)
(11) पैदाइश में यानी साफ़ ही पैदा किया गया. दुनिया के शहद की तरह नहीं जो मक्खी के पेट से निकलता है और उसमें मोम वग़ैरह की मिलावट होती है.

और उनके लिये उसमें हर क़िस्म के फ़ल हैं और अपने रब की मग़फ़िरत (12)
(12) कि वह रब उनपर एहसान फ़रमाता है और उनसे राज़ी है और उनपर से सारे तकलीफ़ी अहकाम उठा लिये गए हैं. जो चाहे ख़ाएं जितना चाहें खाएं, न हिसाब न सज़ा.

क्या ऐसे चैन वाले उनके बराबर हो जाएंगे जिन्हें हमेशा आग में रहना और उन्हें खोलता पानी पिलाया जाए कि आंतों के टुकड़े टुकड़े कर दे {15} और उन(13)
(13)काफ़िर लोग.

में से कुछ तुम्हारे इरशाद (प्रवचन) सुनते हैं (14)
(14) ख़ुत्बे वग़ैरह में अत्यन्त बेइल्तिफ़ाती के साथ.

यहाँ तक कि जब तुम्हारे पास से निकल कर जाएं(15)
(15) ये मुनाफ़िक़ लोग तो.

इल्म वालों से कहते हैं (16)
(16) यानी आलिम सहाबा जैसे इब्ने मसऊद और इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा, से मज़ाक के तौर पर.

अभी उन्होंने क्या फ़रमाया(17)
(17) यानी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने, अल्लाह तआला इन मुनाफ़िक़ों के हक़ में फ़रमाता है.

ये हैं वो जिनके दिलों पर अल्लाह ने मोहर कर दी(18)
(18)यानी जब उन्होंने सत्य का अनुकरण छोड़ दिया तो अल्लाह तआला ने उनके दिलों को मुर्दा कर दिया.

और अपनी ख़्वाहिशों के ताबेअ (अधीन) हुए (19) {16}
(19) और उन्होंने. दोहरी प्रवृति इख़्तियार कर ली.

और जिन्होंने राह पाई (20)
(20) यानी वो ईमान वाले जिन्होंने नबिये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का कलाम ग़ौर से सुना और उससे नफ़ा उठाया.

अल्लाह ने उनकी हिदायत(21)
(21) यानी दृष्टि या बसीरत और दिल की बात जानने का इल्म.

और ज़्यादा फ़रमाई और उनकी परहेज़गारी उन्हें अता फ़रमाई(22){17}
(22) यानी परहेज़गारी की तौफ़ीक़ दी और उस पर मदद फ़रमाई या ये मानी हैं कि उन्हें परहेज़गारी की जज़ा दी और  उसका सवाब अता फ़रमाया.

तो काहे के इन्तिज़ार में हैं (23)
(23) काफ़िर और मुनाफ़िक़ लोग.

मगर क़यामत के कि उनपर अचानक आ जाए, कि उसकी अलामतें (चिन्ह) तो आही चुकी हैं(24)
(24) जिनमें से सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्ल्म का तशरीफ़ लाना और चाँद का दो टुकड़े होना है.

फिर जब वह आ जाएगी तो कहाँ वो और कहाँ उनका समझना {18} तो जान लो कि अल्लाह के सिवा किसी की बन्दगी नहीं और ऐ मेहबूब अपने ख़ासों और आम मुसलमान मर्दों और औरतों के गुनाहों की माफ़ी मांगो(25)
(25) यह इस उम्मत पर अल्लाह तआला की मेहरबानी है कि नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से फ़रमाया कि उनके लिये मग़फ़िरत तलब फ़रमाएं और आप ऐसे सिफ़ारिशी है कि आपकी सिफ़ारिश अल्लाह तआला के यहाँ मक़बूल है. इसके बाद ईमान वालों और बेईमानों सबसे आम सम्बोधन है.

और अल्लाह जानता है दिन को तुम्हारा फिरना (26)
(26) अपने मशालों में और रोज़ी के कामों में.

और रात को तुम्हारा आराम लेना(27) {19}
(27) यानी वो तुम्हारे तमाम हालात का जानने वाला है, उसमें कुछ छुपा हुआ नहीं है.

और पढ़ें

नमाज़ की जानकारी के लिए नमाज़ का बयान और पाकी के लिए वज़ू का तरीक़ा पढ़ें।

4. 47 Surah Al Muhammad से मुतअल्लिक़ अक्सर पूछे जाने वाले सवालात (FAQ)

❓ 47 Surah Al Muhammad का यह नाम क्यों रखा गया?

इस सूरह की दूसरी आयत में प्यारे नबी का मुबारक नाम “मुहम्मद” (ﷺ) आया है: “और वो जो ईमान लाए और अच्छे काम किए और उस पर ईमान लाए जो मुहम्मद (ﷺ) पर उतारा गया”, इसी मुबारक मुनासबत से इसका नाम सूरह मुहम्मद है।

❓ सूरह मुहम्मद का दूसरा नाम क्या है?

इस सूरह का दूसरा नाम सूरह अल-क़िताल है, क्योंकि इसमें अल्लाह की राह में मुजाहिदीन के लड़ने और शहादत के मर्तबे का बयान है।

❓ सूरह मुहम्मद में कुल कितने रूकू और आयतें हैं?

सूरह मुहम्मद में कुल 4 रूकू और 38 आयतें हैं। यह 26वें पारे में मौजूद है।

❓ आमाल बातिल होने से बचने का क्या तरीक़ा सूरह मुहम्मद में बताया गया है?

आयत 33 में हुक्म दिया गया: “ऐ ईमान वालो! अल्लाह की इताअत करो और रसूल की इताअत करो और अपने आमाल को बातिल (बर्बाद) न करो।” यानी रसूल ﷺ की पैरवी के बिना कोई अमल क़बूल नहीं होता।

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