इस्तिख़ारा की नमाज़ का तरीका जानना हर उस मुसलमान के लिए निहायत मुफ़ीद है जो अपनी ज़िंदगी के किसी अहम मोड़ (जैसे निकाह, शादी का रिश्ता, नया कारोबार, नौकरी, मकान ख़रीदना या सफ़र) पर कोई बड़ा फ़ैसला करने जा रहा हो। ‘इस्तिख़ारा’ का मतलब है अल्लाह तआला से भलाई और ख़ैर तलब करना। जब इंसान अपनी अक़्ल से कोई फ़ैसला न कर पा रहा हो कि कौन-सा रास्ता उसके हक़ में बेहतर है, तो वह दो रकअत नफ़्ल नमाज़ पढ़कर अल्लाह की बारगाह में दुआ करता है। सुन्नी हनफ़ी शरीअत और सहीह हदीस की रोशनी में आइए इस्तिख़ारा का मुकम्मल तरीक़ा और मसनून दुआ आसान हिंदी में सीखते हैं।
📚 हवाला: सहीह बुख़ारी, किताबुत्तहज्जुद, हदीस: 1162
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किन मामलों में इस्तिख़ारा किया जाता है?
इस्तिख़ारा सिर्फ़ उन मामलों में किया जाता है जो शरीअत में मुबाह (जायज़) हों और जिनमें दो या ज़्यादा रास्ते हों:
- जायज़ मामलों में: जैसे शादी के लिए रिश्ता तय करना, कोई नया व्यापार या दुकान शुरू करना, नौकरी बदलना, ज़मीन या मकान ख़रीदना, या सफ़र करना।
- फ़राइज़ व गुनाहों में इस्तिख़ारा नहीं: फ़र्ज़ कामों (जैसे नमाज़, रोज़ा, हज) में इस्तिख़ारा नहीं होता कि हज करूँ या न करूँ। इसी तरह हराम या गुनाह के कामों में भी इस्तिख़ारा नहीं होता।
इस्तिख़ारा की नमाज़ की नीयत
“नीयत की मैंने 2 रकअत नमाज़ इस्तिख़ारा की नफ़्ल, वास्ते अल्लाह तआला के, रुख़ मेरा काबा शरीफ़ की तरफ़—अल्लाहु अकबर।”
इस्तिख़ारा की नमाज़ पढ़ने का तरीक़ा
- बा-वज़ू होकर 2 रकअत नफ़्ल पढ़ें: पहली रकअत में सूरह फ़ातिहा के बाद सूरह काफ़िरून (क़ुल या अय्युहल काफ़िरून) पढ़ना और दूसरी रकअत में सूरह फ़ातिहा के बाद सूरह इख़लास (क़ुल हुवल्लाहु अहद) पढ़ना मुस्तहब है।
- सलाम फेरना: नमाज़ आम नफ़्ल नमाज़ की तरह पूरी करके दोनों तरफ़ सलाम फेर दें।
- हम्द व सना और दुरूद शरीफ़: नमाज़ के बाद दोनों हाथ उठाकर अल्लाह तआला की हम्द व तारीफ़ करें और हुज़ूर पर दुरूद-ए-पाक पढ़ें।
- इस्तिख़ारा की मसनून दुआ पढ़ें: दिल में अपने मक़सद और काम का ख़याल रखते हुए यह दुआ पढ़ें।
इस्तिख़ारा की मशहूर मसनून दुआ (सहीह बुख़ारी)
اَللّٰهُمَّ اِنِّیْ اَسْتَخِیْرُکَ بِعِلْمِکَ وَاَسْتَقْدِرُکَ بِقُدْرَتِکَ وَاَسْئَلُکَ مِنْ فَضْلِکَ الْعَظِیْمِ، فَاِنَّکَ تَقْدِرُ وَلَا اَقْدِرُ وَتَعْلَمُ وَلَا اَعْلَمُ وَاَنْتَ عَلَّامُ الْغُیُوْبِ۔ اَللّٰهُمَّ اِنْ کُنْتَ تَعْلَمُ اَنَّ هٰذَا الْاَمْرَ خَیْرٌ لِّیْ فِیْ دِیْنِیْ وَمَعَاشِیْ وَعَاقِبَةِ اَمْرِیْ فَاقْدُرْهُ لِیْ وَیَسِّرْهُ لِیْ ثُمَّ بَارِکْ لِیْ فِیْهِ، وَاِنْ کُنْتَ تَعْلَمُ اَنَّ هٰذَا الْاَمْرَ شَرٌّ لِّیْ فِیْ دِیْنِیْ وَمَعَاشِیْ وَعَاقِبَةِ اَمْرِیْ فَاصْرِفْهُ عَنِّیْ وَاصْرِفْنِیْ عَنْهُ وَاقْدُرْ لِیَ الْخَیْرَ حَیْثُ کَانَ ثُمَّ اَرْضِنِیْ بِهٖ۔
हिंदी उच्चारण:
“अल्लाहुम्मा इन्नी अस्तख़ीरुका बिइल्मिका व अस्तक़्दिरुका बिक़ुदरतिका व अस्अलुका मिन फ़ज़लिकल अज़ीम, फ़इन्नका तक़्दिरु वला अक़्दिरु व तालमु वला आलमु व अंता अल्लामुल ग़ुयूब। अल्लाहुम्मा इन कुंता तालमु अन्ना हाज़ल अम्र [यहाँ अपने काम का नाम लें या दिल में सोचें] ख़ैरुल ली फ़ी दीनी व मआशी व आक़िबति अम्री फ़क़्दुरहु ली व यस्सिरहु ली सुम्मा बारिक ली फ़ीह, व इन कुंता तालमु अन्ना हाज़ल अम्र शर्रुल ली फ़ी दीनी व मआशी व आक़िबति अम्री फ़सरिफ़हु अन्नी वसरिफ़नी अन्हु वक़्दुर लियल ख़ैरा हय्सु काना सुम्मा अरज़िनी बिह।”
हिंदी तर्जुमा (अर्थ):
“ऐ अल्लाह! मैं तेरे इल्म के ज़रिए तुझसे भलाई माँगता हूँ, और तेरी क़ुदरत के ज़रिए तुझसे ताक़त तलब करता हूँ, और तेरे अज़ीम फ़ज़्ल का सवाल करता हूँ। बेशक तू क़ुदरत रखता है और मैं बेबस हूँ, तू जानता है और मैं नहीं जानता, और तू तमाम छुपी बातों का जानने वाला है। ऐ अल्लाह! अगर तेरे इल्म में यह काम मेरे दीन, मेरी दुनिया और मेरे अंजाम के ऐतबार से बेहतर है, तो इसे मेरे मुक़द्दर में कर दे और मेरे लिए आसान कर दे, फिर इसमें मेरे लिए बरकत अता फ़रमा। और अगर तेरे इल्म में यह काम मेरे दीन, मेरी दुनिया और मेरे अंजाम के ऐतबार से बुरा है, तो इसे मुझसे दूर कर दे और मुझे इससे फेर दे, और मेरे लिए जहाँ भी भलाई हो वह मुक़द्दर फ़रमा, फिर मुझे उस पर राज़ी कर दे।”
📚 हवाला: सहीह बुख़ारी, हदीस: 1162; बहारे शरीअत, हिस्सा 4, सफ़ा 675
इस्तिख़ारा का नतीजा कैसे मालूम होता है? (आम ग़लतफ़हमियाँ)
अवाम में यह बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है कि इस्तिख़ारा करने के बाद रात को ख़्वाब में हरा या सफ़ेद रंग दिखना ज़रूरी है। शरीअत के मुताबिक़:
- ख़्वाब आना ज़रूरी नहीं: इस्तिख़ारा के बाद कोई सपना दिखना या रूहानी आवाज़ सुनाई देना बिल्कुल शर्त नहीं है।
- दिल का मुत्मइन होना: इस्तिख़ारा करने के बाद अल्लाह तआला बंदे के दिल का झुकाव उस काम के सही पहलू की तरफ़ कर देता है। जिस काम में भलाई होती है उसके रास्ते आसान हो जाते हैं, और जिसमें नुक्स़ान होता है उसमें रुकावटें आ जाती हैं और दिल उससे हट जाता है।
- 7 दिन तक दोहराना: अगर एक बार में दिल मुत्मइन न हो, तो सात दिन तक लगातार इस्तिख़ारा करना मुस्तहब है।
नमाज़ के मुकम्मल तरीक़े के लिए हमारा गाइड नमाज़ का सही तरीक़ा हिंदी में, और सफ़र के लिए मुसाफ़िर की नमाज़ ज़रूर पढ़ें।
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