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सूरह अन-नज्म हिंदी तर्जुमा व तफ़्सीर: Surah An-Najm अरबी मतन, मेराज-उन-नबी ﷺ व सिदरतुल मुंतहा
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सूरह अन-नज्म हिंदी तर्जुमा व तफ़्सीर: Surah An-Najm अरबी मतन, मेराज-उन-नबी ﷺ व सिदरतुल मुंतहा

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सूरह अन-नज्म (Surah An-Najm) क़ुरआन मजीद की 53वीं मक्की सूरह है जिसमें 3 रुकूअ और 62 आयतें हैं। यह सूरह 27वें पारे में मौजूद है। ‘अन-नज्म’ अरबी में ‘तारे’ (Star) को कहते हैं। यह क़ुरआन मजीद की वह सबसे पहली सूरह है जिसका जब हुज़ूर नबी-ए-करीम मुहम्मद ‎ﷺ‎ ने हरम-ए-काबा में ऐलानिया तिलावत फ़रमाई, तो उसकी पुर-असर हैबत से मुसलमानों के साथ-साथ मुशरिकीन-ए-मक्का भी सजदे में गिर पड़े थे। इस सूरह में हुज़ूर ﷺ के मोजिज़ा-ए-मेराज, सिदरतुल मुंतहा, दीदार-ए-इलाही और वही-ए-इलाही की सच्चाई का ऐसा नूरानी बयान है जो आशिक़ाने रसूल के ईमान को ताज़गी बख़्शता है।

Table of Contents

हुज़ूर ﷺ की ज़बान से निकला हर लफ़्ज़ वह्य है

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने सूरह अन-नज्म की इब्तिदा में तारे की क़सम खाकर अपने महबूब ﷺ की इस्मत और सदाक़त का एलान फ़रमाया:

وَالنَّجْمِ إِذَا هَوَىٰ ۝ مَا ضَلَّ صَاحِبُكُمْ وَمَا غَوَىٰ ۝ وَمَا يَنطِقُ عَنِ الْهَوَىٰ ۝ إِنْ هُوَ إِلَّا وَحْيٌ يُوحَىٰ

तर्जुमा (कंज़ुल ईमान): “क़सम है प्यारे तारे की जब वो ग़ुरूब हो; तुम्हारे साहिब (मुहम्मद ﷺ) न बहके और न बे-राह चले; और वे अपनी ख़्वाहिश से कोई बात नहीं बोलते; वह तो वही (वह्य) है जो उनकी तरफ़ भेजी जाती है।”

📖 हवाला: सूरह अन-नज्म (53), आयत: 1-4; तफ़्सीर ख़ज़ाइनुल इरफ़ान

मेराज-उन-नबी ﷺ और सिदरतुल मुंतहा का दीदार

सूरह अन-नज्म में शब-ए-मेराज के उन मक़ामात का ज़िक्र है जहाँ हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम के पर भी जलते थे:

  • 1

    क़ाबा क़ौसैन (क़ुर्बत की इंतिहा): आयत 8-9 में फ़रमाया गया: “सुम्मा दना फ़-तदल्ला, फ़-काना क़ाबा क़ौसैनि औ अदना” (फिर वो जलवा नज़दीक हुआ, फिर ख़ूब उतर आया, तो दो कमानों के बराबर बल्कि उससे भी कम फ़ासला रह गया)। यह आक़ा ﷺ को बारगाह-ए-इलाही में हासिल होने वाले बेमिसाल क़ुर्ब का बयान है।
  • 2

    मा ज़ाग़ल बसर (आँखों की पाकीज़गी): आयत 17 में हुज़ूर ﷺ की आँखों के कमाल का ज़िक्र है: “मा ज़ाग़ल बसरु व-मा तग़ा” (आँख न किसी तरफ़ फिरी और न हद से बढ़ी)। यानी हुज़ूर ने अपने रब के जलवों को बे-हिजाब देखा और नज़र में ज़रा सा भी भटकाव न आया। आला हज़रत फ़रमाते हैं: “मा ज़ाग़ के सुर्मे से रौशन थीं वो आँखें, दीदार-ए-इलाही का समां देख रही थीं!”
  • 3

    सिदरतुल मुंतहा और जन्नतुल मावा: जहाँ मख़लूक़ात के इल्म की हद ख़त्म होती है, उस सिदरतुल मुंतहा पर हुज़ूर ﷺ ने अपने रब की बड़ी-बड़ी निशानियों को देखा।

सूरह अन-नज्म: मुकम्मल अरबी मतन व कंज़ुल ईमान हिंदी तर्जुमा

सूरए नज्म मक्की है, इसमें तीन रूकू, बासठ आयतें, तीन सौ साठ कलिमें, एक हज़ार चार सौ पाँच अक्षर हैं. यह वह पहली सूरत है जिसका रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ऐलान फ़रमाया और हरम शरीफ़ में मुश्रि कों के सामने पढ़ी.

📖सूरह नज्म – पहला रूकू

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
تِلَاوَةُ الْقُرْآنِ الْكَرِيمِ
पहला रूकू (अरबी तिलावत)
وَالنَّجْمِ إِذَا هَوَىٰ
مَا ضَلَّ صَاحِبُكُمْ وَمَا غَوَىٰ
وَمَا يَنطِقُ عَنِ الْهَوَىٰ
إِنْ هُوَ إِلَّا وَحْيٌ يُوحَىٰ
عَلَّمَهُ شَدِيدُ الْقُوَىٰ
ذُو مِرَّةٍ فَاسْتَوَىٰ
وَهُوَ بِالْأُفُقِ الْأَعْلَىٰ
ثُمَّ دَنَا فَتَدَلَّىٰ
فَكَانَ قَابَ قَوْسَيْنِ أَوْ أَدْنَىٰ
فَأَوْحَىٰ إِلَىٰ عَبْدِهِ مَا أَوْحَىٰ
مَا كَذَبَ الْفُؤَادُ مَا رَأَىٰ
أَفَتُمَارُونَهُ عَلَىٰ مَا يَرَىٰ
وَلَقَدْ رَآهُ نَزْلَةً أُخْرَىٰ
عِندَ سِدْرَةِ الْمُنتَهَىٰ
عِندَهَا جَنَّةُ الْمَأْوَىٰ
إِذْ يَغْشَى السِّدْرَةَ مَا يَغْشَىٰ
مَا زَاغَ الْبَصَرُ وَمَا طَغَىٰ
لَقَدْ رَأَىٰ مِنْ آيَاتِ رَبِّهِ الْكُبْرَىٰ
أَفَرَأَيْتُمُ اللَّاتَ وَالْعُزَّىٰ
وَمَنَاةَ الثَّالِثَةَ الْأُخْرَىٰ
أَلَكُمُ الذَّكَرُ وَلَهُ الْأُنثَىٰ
تِلْكَ إِذًا قِسْمَةٌ ضِيزَىٰ
إِنْ هِيَ إِلَّا أَسْمَاءٌ سَمَّيْتُمُوهَا أَنتُمْ وَآبَاؤُكُم مَّا أَنزَلَ اللَّهُ بِهَا مِن سُلْطَانٍ ۚ إِن يَتَّبِعُونَ إِلَّا الظَّنَّ وَمَا تَهْوَى الْأَنفُسُ ۖ وَلَقَدْ جَاءَهُم مِّن رَّبِّهِمُ الْهُدَىٰ
أَمْ لِلْإِنسَانِ مَا تَمَنَّىٰ
فَلِلَّهِ الْآخِرَةُ وَالْأُولَىٰ

सूरए नज्म मक्के में उतरी, इसमें 62 आयतें, तीन रूकू हैं.

-पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)

(1) सूरए नज्म मक्की है, इसमें तीन रूकू, बासठ आयतें, तीन सौ साठ कलिमें, एक हज़ार चार सौ पाँच अक्षर हैं. यह वह पहली सूरत है जिसका रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ऐलान फ़रमाया और हरम शरीफ़ में मुश्रि कों के सामने पढ़ी.

इस प्यारे चमकते तारे मुहम्मद की क़सम जब यह मेअराज से उतरे(2){1}

(2) नज्म की तफ़सीर में मुफ़स्सिरों के बहुत से क़ौल हैं कुछ ने सुरैया मुराद लिया है अगरचे सुरैया कई तारे हैं लेकिन नज्म का इतलाक़ उनपर अरब की आदत है. कुछ ने नज्म से नजूम की जिन्स मुराद ली है. कुछ ने वो वनस्पति जो तने नहीं रखते, ज़मीन पर फैलते हैं. कुछ ने नज्म से क़ुरआन मुराद लिया है लेकिन सबसे अच्छी तफ़सीर वह है जो इमाम अहमद रज़ा ने इख़्तियार फ़रमाई कि नज्म से मुराद है नबियों के सरदार मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की मुबारक ज़ात.(ख़ाज़िन)

तुम्हारे साहब न बहके न बेराह चले(3){2}

(3) साहब से मुराद सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हैं. मानी ये हैं कि हुज़ूरे अनवर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने कभी सच्चाई के रास्ते और हिदायत से मुंह न फेरा, हमेशा अपने रब की तौहीद और इबादत में रहे. आपके पाक दामन पर कभी किसी बुरे काम की धूल न आई. और बेराह न चलने से मुराद यह है कि हुज़ूर हमेशा सच्चाई और हिदायत की आला मंज़िल पर फ़ायज़ रहे. बुरे और ग़लत अक़ीदे भी कभी आपके मुबारक वुजूद तक न पहुंच सके.

और वह कोई बात अपनी ख़्वाहिश से नहीं करते{3} वह तो नहीं मगर वही जो उन्हें की जाती है(4)

{4}

(4) यह पहले वाक्य की दलील है कि हुज़ूर का बहकना और बेराह चलना संभव ही नहीं क्योंकि आप अपनी इच्छा से कोई बात फ़रमाते ही नहीं, जो फ़रमाते हैं वह अल्लाह की तरफ़ से वही होती है और इसमें हुज़ूर के ऊंचे दर्जे और आपकी पाकीज़गी का बयान है. नफ़्स का सबसे ऊंचा दर्जा यह है कि वह अपनी ख़्वाहिश छोड़ दे. (तफ़सीरे कबीर) और इसमें यह भी इशारा है कि नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अल्लाह की ज़ात और सिफ़ात और अफ़आल में फ़ना के उस ऊंचे दर्जे पर पहुंचे कि अपना कुछ बाक़ी न रहा. अल्लाह की तजल्ली का ऐसा आम फ़ैज़ हुआ कि जो कुछ फ़रमाते हैं वह अल्लाह की तरफ़ से होता है. (रूहुल बयान)

उन्हें (5)

(5) यानी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को.

सिखाया(6)

(6) जो कुछ अल्लाह तआला ने उनकी तरफ़ वही फ़रमाया  और इस तालीम से मुराद क़ल्बे मुबारक तक पहुंचा देना है.

सख़्त क़ुव्वतों वाले {5} ताक़तवर ने(7)

(7) कुछ मुफ़स्सिरीन इस तरफ़ गए हैं कि सख़्त क़ुव्वतों वाले ताक़तवर से मुराद हज़रत जिब्रईल हैं और सिखाने से मुराद अल्लाह की वही का पहुंचना है. हज़रत हसन बसरी रदियल्लाहो अन्हो का क़ौल है कि शदीदुल क़ुवा ज़ू मिर्रतिन से मुराद अल्लाह तआला है उसने अपनी ज़ात को इस गुण के साथ बयान फ़रमाया. मानी ये है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को अल्लाह तआला ने बेवास्ता तालीम फ़रमाई. (तफ़सीर रूहुल बयान)

फिर उस जलवे ने क़स्द फ़रमाया(8){6}

(8) आम मुफ़स्सिरों ने फ़स्तवा का कर्ता भी हज़रत जिब्रईल को क़रार दिया है और ये मानी लिये है कि हज़रत जिब्रईल अमीन अपनी असली सूरत पर क़ायम हुए और इसका कारण यह है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उन्हे उनकी असली सूरत में देखने की ख़्वाहिश ज़ाहिर फ़रमाई थी तो हज़रत जिब्रईल पूर्व की ओर से हुज़ूर के सामने नमूदार हुए और उनके वुजूद से पूर्व से पश्चिम तक भर गया. यह भी कहा गया है कि हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सिवा किसी इन्सान ने हज़रत जिब्रईल अलैहिस्सलाम को उनकी असली सूरत में नहीं देखा. इमाम फ़ख़रूद्दीन राज़ी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि हज़रत जिब्रईल को देखना तो सही है और हदीस से साबित है लेकिन यह हदीस में नहीं है कि इस आयत में हज़रत जिब्रईल को देखना मुराद है बल्कि ज़ाहिरे तफ़सीर में यह है कि मुराद फ़स्तवा से सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का मकाने आली और ऊंची मंज़िल में इस्तवा फ़रमाना है. (कबीर) तफ़सीरे रूहुल बयान में है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने आसमानों के ऊपर क़याम फ़रमाया और हज़रत जिब्रईल सिद्रतुल मुन्तहा पर रूक गए. हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम आगे बढ गए और अर्श के फैलाव से भी गुज़र गए और इमाम अहमद रज़ा का अनुवाद इस तरफ़ इशारा करता है कि इस्तवा की अस्नाद अल्लाह तआला की तरफ़ है और यही क़ौल हसन रदियल्लाहो अन्हो का है.

और वह आसमाने बरीं के सबसे बलन्द किनारे पर था(9){7}

(9) यहाँ भी आम मुफ़स्सिरीन इस तरफ़ गए हैं कि यह हाल जिब्रईले अमीन का है. लेकिन इमाम रोज़ी फ़रमाते हैं कि ज़ाहिर यह है कि यह हाल सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का है कि आप आसमानों के ऊपर थे जिस तरह कहने वाला कहता है कि मैंने छत पर चाँद देखा. इसके मानी ये नहीं होते कि चाँद छत पर या पहाड़ पर था, बल्कि यही मानी होते हैं कि देखने वाला छत पर या पहाड़ पर था. इसी तरह यहाँ मानी हैं कि हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम आसमानों के ऊपर पहुंचे तो अल्लाह की तजल्ली आपकी तरफ़ मुतवज्जह हुई.

फिर वह जलवा नज़्दीक हुआ(10)

(10) इसके मानी ये भी मुफ़स्सिरों के कई क़ौल हैं. एक क़ौल यह है कि हज़रत जिब्रईल का सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से क़रीब होना मुराद है कि वह अपनी असली सूरत दिखा देने के बाद सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के कुर्ब में हाजिर हुए. दूसरे मानी ये हैं कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अल्लाह तआला के क़ुर्ब से मुशर्रफ़ हुए. तीसरे यह कि अल्लाह तआला ने अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को अपने क़ुर्ब की नेअमत से नवाज़ा और यही ज़्यादा सही है.

फिर ख़ूब उतर आया(11){8}

(11) इसमें चन्द क़ौल हैं कि एकतो यह कि नज़्दीक़ होने से हुज़ूर का ऊरूज और वुसूल मुराद है और उतर आने से नुज़ूल व रूजू, तो हासिले मानी ये हैं कि हक़ तआला के क़ुर्ब में बारयाब हुए फिर मिलन की नेअमतो से फ़ैज़याब होकर ख़ल्क़ की तरफ़ मुतवज्जह हुए. दूसरा क़ौल यह है कि हज़रत रब्बुल इज़्ज़त अपने लुत्फ़ व रहमत के साथ अपने हबीब से क़रीब हुआ और इस क़ुर्ब में ज़ियादती फ़रमाई. तीसरा क़ौल यह है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अल्लाह की बारगाह में क़ुर्ब पाकर ताअत का सज्दा अदा किया (रूहुल बयान) बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस में है कि क़रीब हुआ जब्बार रब्बुल इज़्ज़त. (ख़ाज़िन)

तो उस जलवे और उस मेहबूब में दो हाथ का फ़ासला रहा बल्कि उस से भी कम (12){9}

(12) यह  इशारा है ताकीदे क़ु्र्ब की तरफ़ कि क़ुर्ब अपने कमाल को पहुंचा और जो नज़्दीकी अदब के दायरे में रहकर सोची जा सकती है वह अपनी चरम सीमा को पहुंची.

अब वही फ़रमाई अपने बन्दे को जो वही फ़रमाई(13){10}

(13) अक्सर मुफ़स्सिरों के नज़्दीक इसके मानी ये हैं कि अल्लाह तआला ने अपने ख़ास बन्दे हज़रत मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को वही फ़रमाई. (जुमल) हज़रत जअफ़रे सादिक़ रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला ने अपने बन्दे को वही फ़रमाई, जो वही फ़रमाई वह बेवास्ता थी कि अल्लाह तआला और उसके हबीब के बीच कोई वास्ता न था और ये ख़ुदा और रसूल के बीच के रहस्य हैं जिन पर उनके सिवा किसी को सूचना नहीं. बक़ली ने कहा कि अल्लाह तआला ने इस रहस्य को तमाम सृष्टि से छुपा रखा और न बयान फ़रमाया कि अपने हबीब को क्या वही फ़रमाई और मुहिब व मेहबूब के बीच ऐसे राज़ होते हैं जिनको उनके सिवा कोई नहीं जानता. (रूहुल बयान) उलमा ने यह भी बयान किया है कि उस रात में जो आपको वही फ़रमाई गई वह कई क़िस्म के उलूम थे. एक तो शरीअत और अहकाम का इल्म जिसकी सब को तबलीग़ की जाती है, दूसरे अल्लाह तआला की मअरिफ़तें जो ख़ास लोगों को बताई जाती हैं, तीसरे हक़ीक़तें और अन्दर की बातें जो ख़ासूल ख़ास लोगों को बताई जाती है, और एक क़िस्म वो राज़ जो अल्लाह और उसके रसूल के साथ ख़ास हैं कोई उनका बोझ नहीं उठा सकता, (रूहुल बयान)

दिल ने झूट न कहा जो देखा(14){11}

(14) आँख ने यानी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के क़ल्बे मुबारक ने उसकी तस्दीक़ की जो चश्मे मुबारक ने देखा. मानी ये हैं कि आँख से देखा. दिल से पहचाना और इस देखने और पहचानने में शक और वहम ने राह न पाई. अब यह बात कि क्या देखा? कुछ मुफ़स्सिरों का कहना है कि सैयदे आलम सल्लल्ल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अपने रब को देखा और यह देखना किस तरह था? सर की आँखों से या दिल की आँखों से? इस मे मुफ़स्सिरों के दोनो क़ौल पाए जाते हैं. हज़रत इब्ने अब्बास का क़ौल है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने रब तआला को अपने क़ल्बे मुबारक से दोबार देखा (मुस्लिम) एक ज़माअत इस तरफ़ गई कि आपने रब तआला को हक़ीक़त में सर की आँखों से देखा. यह क़ौल हज़रत अनस बिन मालिक और हसन व अकरमह का है और हज़रत इब्ने अब्बास से रिवायत है कि अल्लाह तआला ने हज़रत इब्राहीम को ख़ुल्लत और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को कलाम और सैयदे आलम मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को अपने दीदार से इम्तियाज़ बख़्शा. कअब ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से दोबारा कलाम फ़रमाया और हज़रत मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अल्लाह तआला को दोबार देखा (तिर्मिज़ी) लेकिन हज़रत आयशा रदियल्लाहो अन्हा ने दीदार का इन्कार किया और आयत को जिब्रईल के दीदार पर महमूल किया और फ़रमाया कि जो कोई कहे कि मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अपने रब को देखा, उसने झूट कहा और प्रमाण में आयत “ला तुदरिकुहुल अब्सार” (आंखें उसे अहाता नहीं करतीं – सूरए अनआम, आयत 103) तिलावत फ़रमाई. यहाँ चन्द बातें क़ाबिले लिहाज़ हैं एक यह कि हज़रत आयशा रदियल्लाहो अन्हा का क़ौल नफ़ी में है और हज़रत इब्ने अब्बास का हाँ में और हाँ वाला क़ौल ही ऊपर होता है क्योंकि ना कहने वाला किसी चीज़ की नफ़ी इसलिये करता है कि उसने सुना नहीं और हाँ करने वाला हाँ इसलिये करता है कि उसने सुना और जाना. तो इल्म हाँ कहने वाले के पास है. इसके अलावा हज़रत आयशा रदियल्लाहो अन्हा ने यह कलाम हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से नक़्ल नहीं किया बल्कि आयत से अपने इस्तम्बात (अनुमान) पर ऐतिमाद फ़रमाया. यह हज़रते सिद्दीका रदियल्लाहो अन्हा की राय और आयत में इदराक यानी इहाता की नफ़ी है, न रूयत की. सही मसअला यह है कि हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अल्लाह के दीदार से मुशर्रफ़ फ़रमाए गए. मुस्लिम शरीफ़ की हदीसे मरफ़ूअ से भी यही साबित है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा जो बहरूल उम्मत हैं, वह भी इसी पर हैं. मुस्लिम की हदीस है  “रऐतो रब्बी बिऐनी व बिक़ल्बी” मैं ने अपने रब को अपनी आँख और अपने दिल से देखा. हज़रत हसन बसरी रदियल्लाहो अन्हो क़सम खाते थे कि मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने मेराज की रात अपने रब को देखा. हज़रत इमाम अहमद रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया कि मैं हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा की हदीस का क़ायल हूँ. हुज़ूर ने अपने रब को देखा, उसको देखा, उसको देखा. इमाम साहब यह फ़रमाते ही रहे यहाँ तक कि साँस ख़त्म हो गई.

तो क्या तुम उनसे उनके देखे हुए पर झगड़ते हो(15) {12}

(15) यह मुश्रिकों को ख़िताब है जो मेराज की रात के वाक़िआत का इन्कार करते और उसमें झगड़ा करते.

और उन्हों ने वह जलवा दो बार देखा(16){13}

(16) क्योंकि कम कराने की दरख़ास्तों के लिये चन्द बार आना जाना हुआ. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने रब तआला को अपने क़ल्बे मुबारक से दोबार देखा और उन्हीं से यह भी रिवायत है कि हुज़ूर ने रब तआला को आँख से देखा.

सिदरतुल मुन्तहा के पास(17){14}

(17) सिद्रतुल मुन्तहा एक दरख़्त है जिसकी अस्ल जड़ छटे आसमान में है और इसकी शाखें सातवें आसमान में फैली हुई हैं और बलन्दी में वह सातवें आसमान से भी गुज़र गया. फ़रिश्ते और शहीदों और नेक लोगों की रूहें उससे आगे नहीं बढ़ सकती.

उसके पास जन्नतुल मावा है {15} जब सिदरह पर छा रहा था जो छा रहा था (18){16}

(18) यानी फ़रिश्ते और अनवार.

आँख न किसी तरफ़ फिरी न हद से बढ़ी  (19){17}

(19) इसमें सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की भरपूर क़ुव्वत का इज़हार है कि उस मक़ाम में जहाँ अक़लें हैरत नें डूबी हुई हैं, आप साबित क़दम रहे और जिस नूर का दीदार मक़सूद था उससे बेहराअन्दोज़ हुए. दाएं बाएं किसी तरफ़ मुलतफ़ित न हुए. न मक़सूद की दीद से आँख फेरी, न हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की तरह बेहोश हुए, बल्कि इस मक़ामे अज़ीम में साबित रहे.

बेशक अपने रब की बहुत बड़ी निशानियां देखीं(20){18}

(20) यानी हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने शबे मेअराज़ मुल्क और मलकूत के चमत्कारों को देखा और आप का इल्म तमाम मअलूमाते ग़ैबियह मलकूतियह से भर गया जैसा कि हदीस शरीफ़ इख़्तिसामे मलायकह में वारिद हुआ है और दूसरी हदीसों में आया है. (रूहुल बयान)

तो क्या तुमने देखा लात और उज़्ज़ा {19} और उस तीसरी मनात को(21){20}

(21) लात व उज़्ज़ा और मनात बुतों के नाम हैं जिन्हें मुश्रिक पूजते थे. इस आयत में इरशाद फ़रमाया कि क्या तुमने उन बुतों को देखा, यानी तहक़ीक व इन्साफ़ की नज़र से, अगर इस तरह देखा हो तो तुम्हें मालूम हो गया कि यह महज़ बेक़ुदरत बुतों को पूजना और उसका शरीक ठहराना किस क़दर अज़ीम ज़ुल्म और अक़्ल के ख़िलाफ़ बात है. मक्के के मुश्रिक कहा करते थे कि ये बुत और फ़रिश्ते ख़ुदा की बेटियाँ हैं. इस पर अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है.

क्या तुम को बेटा और उसको बेटी(22){21}

(22) जो तुम्हारे नज़्दीक ऐसी बुरी चीज़ है कि जब तुम में से किसी को बेटी पैदा होने की ख़बर दी जाती है तो उसका चेहरा बिगड़ जाता है और रंग काला हो जाता है और लोगों से छुपता फिरता है यहाँ तक कि तुम बेटियों को ज़िन्दा दर गोर कर डालते हो, फिर भी अल्लाह तआला की बेटियाँ बताते हो.

जब तो यह सख़्त भौंडी तक़सीम है(23){22}

(23) कि जो अपने लिये बुरी समझते हो, वह ख़ुदा के लिये तजवीज़ करते हो.

वो तो नहीं मगर कुछ नाम कि तुम ने और तुम्हारे बाप दादा ने रख लिये हैं(24)

(24) यानी उन बुतों का नाम इलाह और मअबूद तुमने और तुम्हारे बाप दादा ने बिल्कुल बेजा और ग़लत तौर पर रख लिया है, वो न हक़ीक़त में इलाह हैं न मअबूद.

अल्लाह ने उनकी कोई सनद नहीं उतारी, वो तो निरे गुमान और नफ़्स की ख़्वाहिशों के पीछे हैं(25)

(25) यानी उनका बूतों को पूजना अक़्ल व इल्म व तालीमे इलाही के ख़िलाफ़, केवल अपने नफ़्स के इत्बिअ, हटधर्मी और वहम परस्ती की बिना पर है.

और पढ़ें

नमाज़ की जानकारी के लिए नमाज़ का बयान और पाकी के लिए वज़ू का तरीक़ा पढ़ें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1. क्या सूरह अन-नज्म में सजदा-ए-तिलावत वाजिब है?

हाँ, सूरह अन-नज्म की आख़िरी आयत (आयत 62: फ़स्जुदू लिल्लाहि वअबुदू) पर सजदा-ए-तिलावत वाजिब है। जब हुज़ूर ﷺ ने यह सूरह पढ़ी थी तो तमाम सहाबा और मुशरिकीन सब सजदे में गिर गए थे (सहीह बुख़ारी, हदीस: 1071)।

2. अहले सुन्नत के नज़दीक क्या हुज़ूर ﷺ ने शब-ए-मेराज में अल्लाह का दीदार किया?

हाँ! हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास رضي الله عنهما और जमहूर अहले सुन्नत वल जमाअत का अक़ीदा है कि हुज़ूर अकरम ﷺ ने शब-ए-मेराज में अपनी इन मुबारक आँखों से बे-हिजाब अपने रब का दीदार फ़रमाया (तफ़्सीर ख़ज़ाइनुल इरफ़ान व फ़तावा रज़विय्या)।

3. लात, उज़्ज़ा और मनात क्या थे?

सूरह नज्म की आयत 19-20 में मुशरिकीन के तीन मशहूर बुतों (लात, उज़्ज़ा और मनात) का ज़िक्र करके उनके झूठे होने को साबित किया गया है कि वे बे-जान पत्थर हैं जो किसी को नफ़ा या नुक़सान नहीं पहुँचा सकते।

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