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सूरह अल-मुम्तहिना हिंदी तर्जुमा व तफ़्सीर: Surah Al-Mumtahinah अरबी मतन, शान-ए-नुज़ूल व अहकाम
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सूरह अल-मुम्तहिना हिंदी तर्जुमा व तफ़्सीर: Surah Al-Mumtahinah अरबी मतन, शान-ए-नुज़ूल व अहकाम

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सूरह अल-मुम्तहिना (Surah Al-Mumtahinah) क़ुरआन मजीद की 60वीं मुबारका मदनी सूरह है जिसमें 2 रुकूअ और 13 आयतें हैं। यह सूरह फ़तह-ए-मक्का से ठीक पहले नाज़िल हुई और इसमें मुसलमानों को कुफ़्फ़ार-ए-मक्का के साथ दोस्ती और राज़दारी के ताल्लुक़ात के हवाले से बेहद अहम शरई हिदायात अता फ़रमाई गईं। इसी सूरह में मक्का से हिजरत करके मदीना आने वाली मोमिन औरतों के इम्तिहान और हुज़ूर नबी-ए-करीम मुहम्मद ‎ﷺ‎ की मुबारक बैअत के अहकाम बयान हुए हैं। इस मज़मून में सूरह मुम्तहिना का शान-ए-नुज़ूल, अरबी मतन, आसान कंज़ुल ईमान हिंदी तर्जुमा और मुकम्मल तफ़्सीर पेश की जा रही है।

Table of Contents

सूरह अल-मुम्तहिना का शान-ए-नुज़ूल (हज़रत हातिब बिन अबी बल्तआ का वाक़िआ)

सहीह बुख़ारी (हदीस: 4274) और तफ़्सीर ख़ज़ाइनुल इरफ़ान में इस सूरह का शान-ए-नुज़ूल नक़ल है:

जब हुज़ूर अकरम ﷺ ने फ़तह-ए-मक्का के लिए रवानगी की ख़ुफ़िया तैयारी फ़रमाई, तो बद्री सहाबी हज़रत हातिब बिन अबी बल्तआ رضي الله عنه ने मक्का में अपने कमज़ोर अहल-ओ-अयाल की हिफ़ाज़त के ख़याल से क़ुरैश के सरदारों को एक ख़ुफ़िया ख़त लिख दिया कि रसूलुल्लाह ﷺ तुम्हारी तरफ़ आ रहे हैं। उन्होंने यह ख़त ‘सारा’ नाम की एक औरत के बालों के जूड़े में छुपा कर रवाना किया।

अल्लाह तआला ने वह्य के ज़रिए हुज़ूर ﷺ को इसकी इत्तिला दे दी। हुज़ूर ने हज़रत अली मुर्तज़ा, हज़रत ज़ुबैर और हज़रत मिक़दाद رضي الله عنهم को भेजा और फ़रमाया: “रौज़ा-ए-ख़ाख़ मक़ाम पर जाओ, वहाँ एक औरत मिलेगी जिसके पास ख़त है, वह ख़त लेकर आओ।” सहाबा-ए-किराम ने उस औरत को पकड़ा और ख़त बरामद कर लिया।

जब हुज़ूर ने हज़रत हातिब से पूछा तो उन्होंने अर्ज़ किया: “या रसूलल्लाह! अल्लाह की क़सम, मैंने इस्लाम छोड़ने या कुफ़्र की मुहब्बत में ऐसा नहीं किया। मक्का में मेरा कोई क़बीला नहीं था जो मेरे बच्चों की हिफ़ाज़त करता, मैंने सोचा कि काफ़िरों पर एहसान कर दूँ ताकि वे मेरे बच्चों को न सताएं।” हज़रत उमर ने अर्ज़ किया: या रसूलल्लाह! मुझे इजाज़त दें कि इस मुनाफ़िक़ की गर्दन उड़ा दूँ! लेकिन रहमतुल-लिल-आलमीन ﷺ ने फ़रमाया: “ऐ उमर! तुम्हें क्या मालूम, शायद अल्लाह ने अहले बद्र को देखकर फ़रमा दिया हो कि तुम जो चाहो करो, मैंने तुम्हें बख़्श दिया है!” इसी वाक़िए पर इस सूरह की पहली आयत नाज़िल हुई।

सूरह अल-मुम्तहिना: पहला रुकूअ (आयत 1 से 6) अरबी व हिंदी तर्जुमा

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا عَدُوِّي وَعَدُوَّكُمْ أَوْلِيَاءَ تُلْقُونَ إِلَيْهِم بِالْمَوَدَّةِ وَقَدْ كَفَرُوا بِمَا جَاءَكُم مِّنَ الْحَقِّ

तर्जुमा (कंज़ुल ईमान): “अल्लाह के नाम से शुरू जो निहायत मेहरबान, हमेशा रहम फ़रमाने वाला। ऐ ईमान वालो! मेरे और अपने दुश्मनों को दोस्त न बनाओ कि तुम उन्हें मुहब्बत का पैग़ाम भेजते हो, हालाँकि उन्होंने उस हक़ का इंकार किया जो तुम्हारे पास आया।”

📖 हवाला: सूरह अल-मुम्तहिना (60), आयत: 1; तफ़्सीर ख़ज़ाइनुल इरफ़ान

आयत 4 में हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और उनके साथियों की मिसाल दी गई कि उन्होंने अपनी मुशरिक क़ौम से साफ़ कह दिया था कि हमारा और तुम्हारा कोई ताल्लुक़ नहीं जब तक कि तुम सिर्फ़ एक अल्लाह पर ईमान न लाओ।

सूरह अल-मुम्तहिना: दूसरा रुकूअ व औरतों की बैअत के अहकाम

इस सूरह के दूसरे रुकूअ में अल्लाह तआला ने दो बेहद अहम अहकाम नाज़िल फ़रमाए:

  • 1

    मुहाजिर औरतों का इम्तिहान (आयत 10): जो औरतें मक्का से हिजरत करके मदीना आएं, उनका इम्तिहान लिया जाए कि वे सिर्फ़ इस्लाम की ख़ातिर आई हैं या किसी दुनियावी मक़सद से। जब उनके ईमान की तस्दीक़ हो जाए, तो उन्हें काफ़िरों के पास वापस न भेजा जाए, क्योंकि मोमिन औरत काफ़िर मर्द के लिए हलाल नहीं है। इसी इम्तिहान की वजह से इस सूरह का नाम ‘अल-मुम्तहिना’ (इम्तिहान लेने वाली) रखा गया।
  • 2

    औरतों से बैअत की 6 शरई शर्तें (आयत 12): हुज़ूर ﷺ जब औरतों से बैअत लेते तो इन छह बातों का अहद लेते: (1) अल्लाह के साथ किसी को शरीक न करना, (2) चोरी न करना, (3) ज़िना न करना, (4) अपनी औलाद को क़त्ल न करना, (5) किसी पर झूठा बोहतान न लगाना, और (6) किसी भले काम में नबी की नाफ़रमानी न करना। हुज़ूर ﷺ औरतों से हाथ छूकर बैअत नहीं लेते थे बल्कि सिर्फ़ ज़बानी बैअत लेते थे।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1. सूरह मुम्तहिना क़ुरआन के किस पारे में है?

सूरह अल-मुम्तहिना क़ुरआन मजीद के 28वें पारे (क़द समिअल्लाह) में मौजूद है।

2. क्या ग़ैर-मुस्लिमों के साथ हुस्न-ए-सुलूक करना मना है?

नहीं! सूरह मुम्तहिना की आयत 8 में अल्लाह तआला ने साफ़ फ़रमाया कि जो ग़ैर-मुस्लिम तुमसे दीन के मामले में नहीं लड़े और तुम्हें घरों से नहीं निकाला, उनके साथ अच्छा सुलूक करने और इंसाफ़ बरतने से अल्लाह तुम्हें नहीं रोकता। सिर्फ़ इस्लाम के ख़िलाफ़ साज़िश करने वाले दुश्मनों से दोस्ती मना है।

3. सूरह मुम्तहिना की तिलावत से क्या फ़ायदा होता है?

इस सूरह की तिलावत से दिल में निफ़ाक़ (दोग़लापन) से नजात मिलती है, ईमान पुख़्ता होता है और इंसान को अहले हक़ व बातिल के दरमियान फ़र्क़ करने की समझ हासिल होती है।

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