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Iblis Ka Pota: हज़रत हामा जिन्न का वाकया और नबी ﷺ की बारगाह
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Iblis Ka Pota: हज़रत हामा जिन्न का वाकया और नबी ﷺ की बारगाह

admin
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Iblis Ka Pota यानी हामा बिन हीम जिन्न का मशहूर और ईमान अफ़रोज़ वाकया इस्लामी तारीख़ की मोतबर किताबों में दर्ज है। इस वाकये से यह अज़ीम हक़ीक़त साबित होती है कि हमारे प्यारे आक़ा हुज़ूर सय्यिदे आलम रसूलुल्लाह ‎ﷺ‎ सिर्फ़ इंसानों के नहीं, बल्कि जिन्नों के भी रसूल (रसूलुस्सक़लैन) हैं।

हामा जिन्न की नबी ﷺ की बारगाह में हाज़िरी का वाकया

इमाम बैहक़ी अपनी मोतबर किताब दलाइलुन नुबुव्वह में अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर फ़ारूक़-ए-आज़म (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत करते हैं कि एक रोज़ सहाबा-ए-किराम हुज़ूर अकरम रसूलुल्लाह ‎ﷺ‎ के हमराह तिहामा की एक पहाड़ी पर तशरीफ़ फ़रमा थे। अचानक एक बहुत बूढ़ा शख़्स हाथ में लाठी (असा) लिए हुज़ूर की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और अदब से सलाम अर्ज़ किया।

हुज़ूर सय्यिदुल मुर्सलीन रसूलुल्लाह ‎ﷺ‎ ने उसके सलाम का जवाब दिया और फ़रमाया: “इसकी आवाज़ जिन्नों जैसी है।” फिर आपने उससे दरयाफ़्त फ़रमाया, “तू कौन है?” उसने अर्ज़ किया:

“या रसूलुल्लाह ‎ﷺ‎! मैं एक जिन्न हूँ। मेरा नाम हामा है, हामा बेटा हीम का, हीम बेटा लाकीस का और लाकीस बेटा इब्लीस का है।”

हुज़ूर अकरम रसूलुल्लाह ‎ﷺ‎ ने इरशाद फ़रमाया: “तो गोया तेरे और इब्लीस के दरमियान सिर्फ़ दो पुश्तें (पीढ़ियाँ) हैं!” फिर आप ‎ﷺ‎ ने पूछा: “तुम्हारी उम्र कितनी है?”

📚 हवाला: दलाइलुन नुबुव्वह लिल-बैहक़ी, जिल्द 5, सफ़ा 414; व खुलासतुत तफ़ासीर, सफ़ा 170।

इब्लीस के पोते की लंबी उम्र और पैग़म्बरों से मुलाक़ात

हामा ने अर्ज़ किया: “या रसूलुल्लाह ‎ﷺ‎! जितनी उम्र दुनिया की है, उससे थोड़ी ही कम मेरी उम्र है। जब क़ाबील ने हाबील को क़त्ल किया था, तब मैं चंद बरस का बच्चा था मगर समझ रखता था। मैं पहाड़ों और जंगलों में दौड़ता था, लोगों के गल्ले और अनाज चुराता था और दिलों में वसवसे डालता था।”

हुज़ूर नबी-ए-करीम रसूलुल्लाह ‎ﷺ‎ ने फ़रमाया: “तब तो तुम बहुत बुरे रहे हो!” उसने रोकर अर्ज़ किया:

“हुज़ूर! मुझे मलामत न फ़रमाइए, क्योंकि अब मैं आपकी बारगाह में सच्ची तौबा करने हाज़िर हुआ हूँ। मैंने हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) की ज़ियारत की है, एक साल तक उनकी मस्जिद में उनकी सोहबत में रहा और उनकी बारगाह में तौबा की। मैंने हज़रत हूद, हज़रत याक़ूब और हज़रत यूसुफ़ (अलैहिमुस्सलाम) की सोहबतें उठाई हैं।”

हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) का सलाम

हामा ने आगे बयान किया: “या रसूलुल्लाह ‎ﷺ‎! मैं हज़रत ईसा इब्ने मरियम (अलैहिस्सलाम) की ख़िदमत में भी रहा। जब हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) आसमान पर उठाए जाने लगे तो उन्होंने मुझसे फ़रमाया था:

‘ऐ हामा! अगर तेरी मुलाक़ात नबी-ए-आख़िरुज़्ज़माँ हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ‎ﷺ‎ से हो, तो मेरा सलाम उन तक पहुँचाना।’

या रसूलुल्लाह ‎ﷺ‎! आज मैं हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) की यह अमानत और सलाम आपकी ख़िदमत में पहुँचाकर सुबुकदोश होता हूँ। और मेरी तमन्ना है कि आप अपनी मुक़द्दस ज़बान से मुझे कलामुल्लाह (क़ुरआन मजीद) की तालीम फ़रमाएँ।”

नबी ﷺ ने हामा को कौनसी सूरह सिखाईं?

प्यारे आक़ा रसूलुल्लाह ‎ﷺ‎ ने हामा जिन्न की तौबा क़बूल फ़रमाई और उसे क़ुरआन-ए-पाक की इन अज़ीम सूरतों की तालीम दी:

  • सूरह अल-मुरसलात (Surah Al-Mursalat)
  • सूरह अन-नबा (Surah An-Naba / अम्म यतसाअलून)
  • सूरह अल-इख़्लास (Surah Al-Ikhlas)
  • मुअव्विज़तैन (सूरह अल-फ़लक़ और सूरह अन-नास)
  • सूरह अत-तकवीर (Surah At-Takwir / इज़श्शम्सु कुव्विरत)

तालीम फ़रमाने के बाद हुज़ूर रसूलुल्लाह ‎ﷺ‎ ने शफ़क़त से फ़रमाया: “ऐ हामा! जब भी तुम्हें कोई ज़रूरत हो, तुम मेरे पास आ जाया करना और मुलाक़ात मत छोड़ना।” हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) फ़रमाते हैं कि इसके बाद हुज़ूर ने उसका दोबारा ज़िक्र नहीं फ़रमाया, अल्लाह ही बेहतर जानता है कि वह कब तक हयात रहा।

इस्लामी अक़ीदा: रसूलुस्सक़लैन की हैसियत

अहले सुन्नत वल जमाअत का अक़ीदा है कि हुज़ूर पाक रसूलुल्लाह ‎ﷺ‎ सिर्फ़ इंसानों के लिए नहीं बल्कि तमाम कायनात, फ़रिश्तों और जिन्नात सबके हादी और रसूल हैं। क़ुरआन मजीद की सूरह अल-अहक़ाफ़ और सूरह अल-जिन्न में साफ़ बयान है कि जिन्नों के गिरोह ने हुज़ूर की ज़बान से क़ुरआन सुना और ईमान लाए।

وَإِذْ صَرَفْنَا إِلَيْكَ نَفَرًا مِّنَ الْجِنِّ يَسْتَمِعُونَ الْقُرْآنَ

तर्जुमा: और (याद करो) जब हमने जिन्नों के एक गिरोह को तुम्हारी तरफ़ फेरा जो क़ुरआन कान लगाकर सुनते थे।

📖 हवाला: सूरह अल-अहक़ाफ़ (46), आयत: 29

वाकये से मिलने वाले अहम सबक़ (Key Takeaways)

नुक्ता तफ़सील सबक़ व नसीहत
तौबा का दरवाज़ा हज़ारों साल गुनाह करने के बाद भी हामा ने तौबा की। अल्लाह की रहमत से कभी मायूस नहीं होना चाहिए।
रसूलुस्सक़लैन जिन्नों ने भी हुज़ूर ﷺ से क़ुरआन की तालीम ली। नबी ﷺ तमाम मख़लूक़ात के लिए रहमत बनकर आए।
अमानत की अदायगी हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) का सलाम सदियों बाद पहुँचाया। अमानत और वादे को हर हाल में पूरा करना ईमान का हिस्सा है।

दीनी तालीम और इबादत के सही तरीक़े सीखने के लिए हमारी विस्तृत गाइड Namaz Ka Tarika और Ghusl Ka Tarika ज़रूर पढ़ें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1: Iblis Ka Pota कौन था और उसका नाम क्या था?

हदीस और इस्लामी रिवायतों के मुताबिक़ इब्लीस के परपोते का नाम ‘हामा’ था (हामा बिन हीम बिन लाकीस बिन इब्लीस)। वह जिन्नों की क़ौम से था और उसने नबी-ए-करीम रसूलुल्लाह ﷺ की बारगाह में हाज़िर होकर सच्ची तौबा की थी।

Q2: क्या हामा जिन्न हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) से मिला था?

हाँ, रिवायत के मुताबिक़ उसने हज़रत नूह, हज़रत हूद, हज़रत याक़ूब और हज़रत ईसा (अलैहिमुस्सलाम) का ज़माना पाया था। हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) ने उसे हुज़ूर ﷺ की ख़िदमत में सलाम पहुँचाने की अमानत दी थी।

Q3: रसूलुल्लाह ﷺ ने हामा को कौनसी सूरह सिखाईं?

हुज़ूर रसूलुल्लाह ﷺ ने उसे सूरह अल-मुरसलात, सूरह अन-नबा (अम्म यतसाअलून), सूरह अल-इख़्लास, मुअव्विज़तैन (फ़लक़ और नास) और सूरह अत-तकवीर की तालीम फ़रमाई।

Q4: क्या जिन्नात पर भी नमाज़ और शरीअत फ़र्ज़ है?

हाँ, इंसानों की तरह जिन्नात भी शरीअत के मुकल्लफ़ (जवाबदेह) हैं। उन पर भी ईमान, नमाज़ और अल्लाह के अहकाम मानना फ़र्ज़ है और हुज़ूर रसूलुल्लाह ﷺ इंसानों और जिन्नों दोनों के नबी हैं।

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