Yaman ke Badshah Ki Story In Hindi इस्लामी तारीख़ की वह अज़ीम और दिलकश हिकायत है जो ज़हूर-ए-क़ुदसी से एक हज़ार साल पहले हुज़ूर अकरम रसूलुल्लाह ﷺ की शान व अज़मत का सबूत पेश करती है। यमन का बादशाह तुब्बा अव्वल हिमयरी हुज़ूर की विलादत से सदियों पहले आप पर ईमान लाया और आपके नाम एक तारीखी ख़त लिखा।
Table of Contents
- 1. यमन के बादशाह तुब्बा का लश्कर और मक्का मुअज़्ज़मा का सफ़र
- 2. काबा शरीफ़ पर पहला गिलाफ़ चढ़ाने का वाकया
- 3. मदीना मुनव्वरा में 400 उलमा और नबी ﷺ के लिए मकान
- 4. नबी-ए-करीम ﷺ के नाम बादशाह तुब्बा का ख़त
- 5. 1000 साल बाद ख़त की पेशी और हज़रत अबू अय्यूब अंसारी का मकान
- 6. वाकये के अहम अस्बाक़ (Key Lessons)
- 7. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
- 7.1 Q1: Yaman ke Badshah Ki Story In Hindi में बादशाह का क्या नाम था?
- 7.2 Q2: क्या बादशाह तुब्बा ने ख़ाना-ए-काबा पर गिलाफ़ चढ़ाया था?
- 7.3 Q3: बादशाह तुब्बा का ख़त 1000 साल बाद हुज़ूर ﷺ तक कैसे पहुँचा?
- 7.4 Q4: जब अबू लैला ख़त लेकर आया तो हुज़ूर ﷺ ने क्या फ़रमाया?
यमन के बादशाह तुब्बा का लश्कर और मक्का मुअज़्ज़मा का सफ़र
तारीख़-ए-इब्ने असाकिर, हुज्जतुल्लाहि अलल-आलमीन और किताबुल मुस्ततरफ़ में दर्ज है कि हुज़ूर सय्यिदे आलम रसूलुल्लाह ﷺ की विलादत-ए-बा-सआदत से क़रीब एक हज़ार साल पहले यमन का बादशाह तुब्बा अव्वल हिमयरी अपनी सलतनत के दौरे पर निकला।
उसके हमराह 12,000 आलिम व हकीम, 1,32,000 घुड़सवार और 1,13,000 पैदल फ़ौज थी। उसकी शान व शौकत ऐसी थी कि जहाँ से भी उसका लश्कर गुज़रता, लोग हैरान होकर ज़ियारत को उमड़ पड़ते थे।
लेकिन जब यह लश्कर मक्का मुअज़्ज़मा पहुँचा तो अहले मक्का में से कोई उसे देखने न आया। बादशाह ने हैरत से अपने वज़ीर से पूछा, “यहाँ के लोग मुझे देखने क्यों नहीं आए?” वज़ीर ने बताया:
“इस शहर में एक मुक़द्दस घर है जिसे बैतुल्लाह (ख़ाना-ए-काबा) कहते हैं। तमाम लोग उसकी और उसके ख़ादिमों की दिलो-जान से ताज़ीम करते हैं। जितना आपका लश्कर है, उससे कहीं ज़्यादा लोग दूर-दराज़ से इस घर की ज़ियारत को आते हैं।”
📚 हवाला: तारीख़-ए-दिमश्क़ लिर-रईस इब्ने असाकिर; हुज्जतुल्लाहि अलल-आलमीन लिन-नभानी; व मीज़ानुल अद्यान, सफ़ा 177।
काबा शरीफ़ पर पहला गिलाफ़ चढ़ाने का वाकया
यह सुनकर बादशाह को ग़ुस्सा आ गया और उसने तकब्बुर में क़सम खाई कि ‘मैं इस घर को तुड़वा दूँगा और यहाँ के बाशिंदों को क़त्ल करवाऊँगा।’ यह सोचना ही था कि अचानक बादशाह की नाक, मुँह और आँखों से बदबूदार ख़ून और पीप बहना शुरू हो गया। तमाम तबीब उसका इलाज करने से आजिज़ आ गए।
शाम के वक़्त उसके लश्कर के एक बुज़ुर्ग आलिम (आलिमे रब्बानी) ने उसकी नब्ज़ देखकर फ़रमाया: “ऐ बादशाह! यह मर्ज़ ज़मीनी नहीं, आसमानी है। अगर आपने बैतुल्लाह के बारे में कोई बुरी नीयत की है तो फ़ौरन अल्लाह की बारगाह में तौबा कीजिए।”
बादशाह ने दिल ही दिल में काबा शरीफ़ के ख़िलाफ़ अपने इरादे से सच्ची तौबा की। तौबा करते ही ख़ून और बदबूदार माद्दा बहना फ़ौरन बंद हो गया और वह पूरी तरह सेहतमंद हो गया। इस ख़ुशी में बादशाह ने बैतुल्लाह शरीफ़ पर रेशमी गिलाफ़ चढ़ाया (तारीख़ बताती है कि काबा पर सबसे पहला गिलाफ़ तुब्बा हिमयरी ने ही चढ़ाया था) और शहर के हर बाशिंदे को अशर्फ़ियाँ और रेशमी जोड़े तोहफ़े में दिए।
मदीना मुनव्वरा में 400 उलमा और नबी ﷺ के लिए मकान
मक्का से निकलकर जब बादशाह का लश्कर यसरिब (मदीना मुनव्वरा) की सरज़मीन पर पहुँचा, तो आसमानी किताबों के आलिमों ने वहाँ की मिट्टी को सूँघा और अलामात देखकर पहचान लिया कि यही नबी-ए-आख़िरुज़्ज़माँ ﷺ की हिजरतगाह है।
उलमा ने तय किया कि हम यहीं सुकूनत इख़्तियार करेंगे ताकि अगर हमारी ज़िंदगी में हुज़ूर तशरीफ़ लाएँ तो ज़ियारत नसीब हो, वरना हमारी क़ब्रों पर उनकी नालैन-ए-मुक़द्दस की ख़ाक ही पड़ जाए तो हमारी निजात के लिए काफ़ी है। बादशाह ने उन 400 उलमा के लिए 400 मकान बनवाए और सबसे बड़े आलिम के मकान के क़रीब हुज़ूर ﷺ के लिए एक शानदार दो-मंज़िला मकान तामीर करवाया।
नबी-ए-करीम ﷺ के नाम बादशाह तुब्बा का ख़त
बादशाह तुब्बा ने उस बुज़ुर्ग आलिम को एक ख़त लिख कर दिया और वसीयत की कि यह ख़त नस्ल-दर-नस्ल महफ़ूज़ रखा जाए और जब नबी-ए-आख़िरुज़्ज़माँ तशरीफ़ लाएँ तो उनकी ख़िदमत में पेश किया जाए। ख़त का मज़मून यह था:
“कमतरीन मख़लूक़ तुब्बा अव्वल हिमयरी की तरफ़ से शफ़ीउल मुज़्निबीन सय्यिदुल मुर्सलीन मुहम्मद रसूलुल्लाह ﷺ की ख़िदमत में अम्मा बाद! ऐ अल्लाह के हबीब! मैं आप पर और आपकी किताब पर ईमान लाता हूँ। अगर मुझे आपकी ज़ियारत नसीब हो गई तो बहुत अज़ीम सआदत, और अगर मैं आपकी ज़ियारत न पा सकूँ तो रोज़-ए-क़यामत मेरी शफ़ाअत फ़रमाना और मुझे फ़रामोश न फ़रमाना। मैं आपकी पहली उम्मत में से हूँ और आपकी आमद से पहले ही आप पर बैअत करता हूँ।”
1000 साल बाद ख़त की पेशी और हज़रत अबू अय्यूब अंसारी का मकान
यह ख़त एक हज़ार साल तक उस आलिम की औलाद में अमानत के तौर पर महफ़ूज़ रहा। यहाँ तक कि यह ख़त हज़रत अबू अय्यूब अंसारी (रज़ियल्लाहु अन्हु) तक पहुँचा, जो उसी आलिम की नस्ल से थे और उसी दो-मंज़िला मकान में रहते थे। हज़रत अबू अय्यूब अंसारी ने यह ख़त अपने ख़ादिम अबू लैला की हिफ़ाज़त में रखा था।
जब हुज़ूर अकरम रसूलुल्लाह ﷺ हिजरत फ़रमाकर मदीना मुनव्वरा पहुँचे, तो आपकी क़स्वा ऊँटनी सीधे उसी दो-मंज़िला मकान के सामने जाकर बैठ गई। जब अबू लैला ख़त लेकर हाज़िर हुआ, तो हुज़ूर ने उसे देखते ही बग़ैर किसी के बताए इरशाद फ़रमाया:
“तू अबू लैला है? ला, शाहे यमन तुब्बा का वह ख़त मुझे दे जो तेरे पास है!”
अबू लैला यह देखकर दंग रह गया। ख़त मुलाहिज़ा फ़रमाने के बाद हुज़ूर रसूलुल्लाह ﷺ ने तीन बार इरशाद फ़रमाया: “नेक भाई तुब्बा को आफ़रीं व शाबाश है!”
वाकये के अहम अस्बाक़ (Key Lessons)
| नुक्ता | तफ़सील | सबक़ व नसीहत |
|---|---|---|
| इल्म-ए-ग़ैब-ए-मुस्तफ़ा ﷺ | हुज़ूर ﷺ ने अबू लैला को नाम से पुकारा और ख़त तलब किया। | हुज़ूर ﷺ से कोई बात पोशीदा नहीं। |
| ताज़ीम-ए-काबा | काबा की बे-अदबी से अज़ाब आया और ताज़ीम से सेहत मिली। | शाआएरिल्लाह की ताज़ीम ही ईमान की जान है। |
| आमद-ए-मुस्तफ़ा की ख़ुशी | सहाबा और अहले मदीना ने घरों को सजाकर इस्तक़बाल किया। | मीलाद-उन-नबी ﷺ पर ख़ुशी मनाना सुन्नत-ए-सहाबा है। |
सीरत और सुन्नतों के विस्तृत मुतालआ के लिए हमारे लेख Eid Milad Un Nabi और Namaz Ka Tarika ज़रूर पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1: Yaman ke Badshah Ki Story In Hindi में बादशाह का क्या नाम था?
यमन के उस नेक बादशाह का नाम ‘तुब्बा अव्वल हिमयरी’ था, जिसने नबी-ए-करीम ﷺ की विलादत से लगभग एक हज़ार साल पहले आप पर ईमान क़बूल किया और बैतुल्लाह पर गिलाफ़ चढ़ाया।
Q2: क्या बादशाह तुब्बा ने ख़ाना-ए-काबा पर गिलाफ़ चढ़ाया था?
हाँ, सहीह तारीखी रिवायतों के मुताबिक़ बैतुल्लाह शरीफ़ पर सबसे पहले मुकम्मल रेशमी गिलाफ़ चढ़ाने की सआदत यमन के बादशाह तुब्बा हिमयरी को ही हासिल हुई थी।
Q3: बादशाह तुब्बा का ख़त 1000 साल बाद हुज़ूर ﷺ तक कैसे पहुँचा?
बादशाह ने यह ख़त मदीना में आबाद होने वाले आलिमों को सौंपा था। नस्ल-दर-नस्ल यह अमानत हज़रत अबू अय्यूब अंसारी (रज़ियल्लाहु अन्हु) तक पहुँची और हिजरत के वक़्त उनके ग़ुलाम अबू लैला ने यह ख़त रसूलुल्लाह ﷺ की ख़िदमत में पेश किया।
Q4: जब अबू लैला ख़त लेकर आया तो हुज़ूर ﷺ ने क्या फ़रमाया?
हुज़ूर ﷺ ने बग़ैर किसी के बताए फ़रमाया: ‘तू अबू लैला है? शाहे यमन तुब्बा का ख़त ला।’ और ख़त पढ़ने के बाद फ़रमाया: ‘नेक भाई तुब्बा को आफ़रीं व शाबाश है।’
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