मेरी बात बन गई है तेरी बात करते करते आशिक़ाने रसूल की ज़बानों पर जारी वह मुक़द्दस और रूहानी कलाम है जो यह गवाही देता है कि नबी-ए-पाक ﷺ का ज़िक्र करने और आपकी नात पढ़ने से बिगड़े मुक़द्दर संवर जाते हैं। जब बंदा अपने महबूब आक़ा ﷺ की महफ़िल सजाता है और उनकी पाकीज़ा सीरत का बयान करता है, तो अल्लाह तआला उसके तमाम ग़मों, परेशानियों और तंगदस्तियों को दूर फ़रमा देता है। इस नातिया कलाम के हर शेर में शुक्रगुज़ारी, अक़ीदत और नात पढ़ते-पढ़ते मदीने पहुँचने की हसीन तमन्ना मौजूद है। आइए इस मुकम्मल नात शरीफ़ और इसके रूहानी फ़ज़ाइल को आसान हिंदी में समझें।
Table of Contents
- 1. मेरी बात बन गई है तेरी बात करते करते (मुकम्मल नात शरीफ़ लिरिक्स)
- 2. अशआर का आसान हिंदी तर्जुमा व मफ़हूम
- 3. हुज़ूर ﷺ के ज़िक्र से दिल की राहत (हदीस शरीफ़)
- 4. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
- 4.1 1. ‘मेरी बात बन गई है’ नात का मरकज़ी पैग़ाम क्या है?
- 4.2 2. क्या नात पढ़ने वाले पर फ़रिश्ते रहमत भेजते हैं?
- 4.3 3. ख़ात्मा बिल-खैर के लिए कौन सा अमल बेहतरीन है?
- 4.4 4. ‘इस करम का करूँ शुक्र कैसे अदा’ का क्या मफ़हूम है?
मेरी बात बन गई है तेरी बात करते करते (मुकम्मल नात शरीफ़ लिरिक्स)
इस करम का करूँ शुक्र कैसे अदा
जो करम मुझ पे मेरे नबी ﷺ ने कर दिया
मैं सजाता हूँ सरकार ﷺ की महफ़िलें
मुझ को हर ग़म से रब ने बरी कर दिया
मेरी बात बन गई है तेरी बात करते करते
तेरे शहर में मैं आऊँ तेरी नात पढ़ते पढ़ते
तेरे इश्क़ की बदौलत मुझे ज़िंदगी मिली है
मुझे मौत आए आक़ा ﷺ ! तेरा ज़िक्र करते करते
कोई ऐसा काम कर दूँ जो करम को खींच लाए
मेरी आँख भी हो पुर-नम तिरी याद करते करते
मैं तो बे-नवा गदा हूँ तिरे दर का मुंतज़िर हूँ
मुझे मिल गई रिहाई तिरी नात पढ़ते पढ़ते
जो गुज़र रही है मेरी तिरे ज़िक्र में ये साअत
यही काम आनी मौला क़ज़ा के गुज़रते गुज़रते
तेरे दर पे सर झुका है तिरे दर पे ही रहेगा
मिरी रूह भी जुदा हो तिरा नाम लेते लेते
अशआर का आसान हिंदी तर्जुमा व मफ़हूम
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शेर 1: महफ़िले मीलाद की बरकत:
जब एक मोमिन अपने घर में हुज़ूर ﷺ की विलादत और नात की महफ़िल सजाता है, तो अल्लाह तआला उस घर से बलाएँ टाल देता है और दुनिया-ओ-आख़िरत के तमाम ग़मों से नजात बख़्शता है।
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शेर 2: नात पढ़ते-पढ़ते मदीने की हाज़िरी:
हुज़ूर के ज़िक्र में इतनी तासीर है कि नात पढ़ते-पढ़ते बिगड़े काम बन जाते हैं। बंदे की सबसे हसीन तमन्ना यह है कि वह लबों पर नात शरीफ़ का तराना सजाए मदीना शरीफ़ की गलियों में दाख़िल हो।
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शेर 3: ज़िक्रे नबी पर ख़ात्मा बिल-खैर:
ज़िंदगी की सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि जब मौत का वक़्त आए, तो ज़बान पर नबी-ए-पाक ﷺ का कलिमा और ज़िक्र जारी हो।
हुज़ूर ﷺ के ज़िक्र से दिल की राहत (हदीस शरीफ़)
हज़रत उबै बिन काअब रदियल्लाहु अन्हु ने अर्ज़ किया: “या रसूलुल्लाह! मैं अपनी तमाम दुआओं का वक़्त आप पर दरूद पढ़ने में लगा दूँ तो कैसा है?” हुज़ूर अकरम ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
“तब तो अल्लाह तआला तुम्हारी तमाम फ़िक्रों और ग़मों को दूर फ़रमा देगा और तुम्हारे सारे गुनाह माफ़ फ़रमा देगा।”
📚 हवाला: जामिअ अत-तिर्मिज़ी, अबवाबु सिफ़ातुल क़ियामह, हदीस: 2457 (हदीस हसन सहीह)
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. ‘मेरी बात बन गई है’ नात का मरकज़ी पैग़ाम क्या है?
इस नात का पैग़ाम यह है कि रसूलुल्लाह ﷺ की मोहब्बत, नात-ख़्वानी और महफ़िले मीलाद सजाने से इंसान के तमाम दुनियावी और रूहानी काम संवर जाते हैं।
2. क्या नात पढ़ने वाले पर फ़रिश्ते रहमत भेजते हैं?
जी हाँ, हदीस में आता है कि हज़रत हस्सान बिन साबित जब नात पढ़ते थे, तो हुज़ूर ﷺ फ़रमाते थे कि हज़रत जिब्रईल अमीन रूहानी तौर पर उनकी मदद फ़रमाते हैं (सहीह बुख़ारी: 3212)।
3. ख़ात्मा बिल-खैर के लिए कौन सा अमल बेहतरीन है?
रोज़ाना कसरत से दरूद शरीफ़ पढ़ना, नमाज़ों की पाबंदी करना और सुन्नते मुस्तफ़ा पर अमल करना मौत के वक़्त ईमान की सलामती का ज़रिया है।
4. ‘इस करम का करूँ शुक्र कैसे अदा’ का क्या मफ़हूम है?
इसका मफ़हूम यह है कि नबी-ए-पाक ﷺ की उम्मत में पैदा होना और आपकी महफ़िल सजाने का मौक़ा मिलना अल्लाह का इतना बड़ा एहसान है जिसका शुक्र अदा करना मुमकिन नहीं।
आला हज़रत की मशहूर मनक़बत के लिए वो बरेली का अहमद रज़ा है मनक़बत और बख़्शिश की नात के लिए या रब है बख़्श देना नात शरीफ़ ज़रूर पढ़ें।
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