किरामन कातेबीन कौन हैं? इस्लाम में हर आक़िल और बालिग़ मुसलमान के लिए यह अक़ीदा रखना फ़र्ज़ है कि अल्लाह तआला ने हर इंसान के साथ दो मुक़र्रब फ़रिश्ते मुक़र्रर फ़रमाए हैं जो उसके हर छोटे-बड़े अच्छे और बुरे अमल को अपने रजिस्टर (नाम-ए-आमाल) में दर्ज करते हैं। इन मुक़द्दस फ़रिश्तों को क़ुरआन करीम ने ‘किरामन कातेबीन’ (इज़्ज़त वाले लिखने वाले) का लक़ब अता फ़रमाया है। जब बंदा यह याद रखता है कि उसके कंधे पर बैठे फ़रिश्ते हर लफ़्ज़ और हर हरकत को लिख रहे हैं, तो वह गुनाहों से बचता है और उसकी ज़िंदगी में पाकीज़गी आ जाती है।
Table of Contents
- 1. क़ुरआन मजीद में किरामन कातेबीन का ज़िक्र
- 2. दायें और बाएँ कंधे के फ़रिश्तों की ज़िम्मेदारियाँ
- 3. अल्लाह की रहमत: गुनाह लिखने में 6 घंटे की मोहलत (हदीस-ए-पाक)
- 4. फ़रिश्ते किन हालतों में इंसान से अलग होते हैं?
- 5. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
- 5.1 1. क्या दिल में आने वाले ख़यालात को भी फ़रिश्ते लिखते हैं?
- 5.2 2. किरामन कातेबीन की तब्दीली कब होती है?
- 5.3 3. क्या नमाज़ में सलाम फेरते वक़्त किरामन कातेबीन की नीयत की जाती है?
क़ुरआन मजीद में किरामन कातेबीन का ज़िक्र
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने सूरह अल-इन्फ़ितार में इरशाद फ़रमाया:
وَإِنَّ عَلَيْكُمْ لَحَافِظِينَ كِرَامًا كَاتِبِينَ يَعْلَمُونَ مَا تَفْعَلُونَ
तर्जुमा (कंज़ुल ईमान): “और बेशक तुम पर कुछ निगहबान मुक़र्रर हैं; इज़्ज़त वाले लिखने वाले; वे जानते हैं जो कुछ तुम करते हो।”
📖 हवाला: सूरह अल-इन्फ़ितार (82), आयत: 10-12
और सूरह क़ाफ़ (आयत 17-18) में फ़रमाया गया: “जब दो लेने वाले लेते हैं, एक दायें बैठा और एक बाएँ बैठा; कोई बात उसकी ज़बान पर नहीं आती मगर उसके पास एक तैयार निगहबान मौजूद होता है।”
दायें और बाएँ कंधे के फ़रिश्तों की ज़िम्मेदारियाँ
सद्रुश-शरीआ हज़रत अल्लामा मुफ़्ती अमजद अली आज़मी رضي الله عنه ‘बहारे शरीअत’ (हिस्सा 1) में फ़रमाते हैं:
-
1
दायें कंधे का फ़रिश्ता (नेकियों का निगहबान): दायें कंधे पर मौजूद फ़रिश्ता नेकियाँ लिखता है और वह बाएँ कंधे के फ़रिश्ते का अफ़सर (अमीर) होता है। जब बंदा कोई नेक अमल करता है, तो वह फ़ौरन कम से कम दस गुना सवाब लिख देता है।
-
2
बाएँ कंधे का फ़रिश्ता (बुराइयों का कातिब): बाएँ कंधे पर मौजूद फ़रिश्ता बंदे के गुनाह और बुराइयां लिखता है, लेकिन वह दायें फ़रिश्ते की इजाज़त के बग़ैर कुछ नहीं लिख सकता।
अल्लाह की रहमत: गुनाह लिखने में 6 घंटे की मोहलत (हदीस-ए-पाक)
इस्लाम में अल्लाह की रहमत उसके ग़ज़ब पर किस क़दर ग़ालिब है, इसका अंदाज़ा इस हदीस-ए-मुबारका से लगाया जा सकता है:
हदीस शरीफ़: हुज़ूर अकरम ﷺ ने फ़रमाया: “बाएँ कंधे का फ़रिश्ता मुसलमान गुनाहगार बंदे से छः घंटे तक अपना क़लम रोके रखता है। अगर वह बंदा उन छः घंटों के अंदर अपने गुनाह पर शर्मिंदा होकर अल्लाह से इस्तिग़फ़ार (माफ़ी) मांग ले, तो फ़रिश्ता उस गुनाह को फेंक देता है (यानी रजिस्टर में दर्ज नहीं करता); और अगर वह तौबा न करे, तो सिर्फ़ एक गुनाह लिखा जाता है।”
📚 हवाला: अल-मुअजमुल कबीर लित-तबरानी, जिल्द 8, हदीस: 7765; सहीहुल जामे, हदीस: 2097; बहारे शरीअत, हिस्सा 1
फ़रिश्ते किन हालतों में इंसान से अलग होते हैं?
हदीस शरीफ़ और फ़िक़्ह-ए-हनफ़ी के मुताबिक़ किरामन कातेबीन हर वक़्त इंसान के साथ रहते हैं, सिवाए तीन सूरतों के:
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1
क़ज़ा-ए-हाजत (पाख़ाना या पेशाब) के वक़्त: जब बंदा बैतुल ख़ला में क़ज़ा-ए-हाजत के लिए जाता है, तो फ़रिश्ते बाहर ठहरते हैं।
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2
ग़ुस्ल-ए-जनाबत के वक़्त: जब इंसान नापाकी की हालत में नंगा होकर ग़ुस्ल करता है।
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3
ज़ौजीन के हमबिस्तरी के वक़्त: मियाँ-बीवी के ख़ास ताल्लुक़ात के वक़्त भी फ़रिश्ते पर्दे का लिहाज़ करते हुए अलग हो जाते हैं।
नोट: अगरचे फ़रिश्ते उस वक़्त जिस्मानी तौर पर अलग होते हैं, लेकिन अल्लाह तआला उन्हें इल्म अता फ़रमाता है और वे उस वक़्त के आमाल भी बा-ख़ूबी लिख लेते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. क्या दिल में आने वाले ख़यालात को भी फ़रिश्ते लिखते हैं?
नहीं, जब तक इंसान किसी बुरे ख़याल को अपनी ज़बान पर न लाए या उस पर अमल न करे, तब तक गुनाह नहीं लिखा जाता। लेकिन अगर दिल में नेकी का पक्का इरादा पैदा हो जाए, तो सिर्फ़ इरादा करने पर ही एक नेकी लिख दी जाती है।
2. किरामन कातेबीन की तब्दीली कब होती है?
सहीह बुख़ारी की हदीस (हदीस: 555) के मुताबिक़ रात और दिन के फ़रिश्तों की ड्यूटी फ़ज्र और अस्र की नमाज़ के वक़्त बदलती है। जब अल्लाह उनसे पूछता है कि मेरे बंदों को किस हाल में छोड़ा, तो वे अर्ज़ करते हैं: “जब हम गए तब भी वे नमाज़ पढ़ रहे थे और जब वापस आए तब भी नमाज़ पढ़ रहे थे।”
3. क्या नमाज़ में सलाम फेरते वक़्त किरामन कातेबीन की नीयत की जाती है?
हाँ, सुन्नी हनफ़ी फ़िक़्ह के मुताबिक़ नमाज़ के आख़िर में दायें और बाएँ सलाम फेरते वक़्त किरामन कातेबीन और हाज़िर नमाज़ियों को सलाम करने की नीयत करना सुन्नत है।
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