Skip to content
मकड़ी का घर (सूरह अल-अनकबूत): क़ुरआन करीम की अज़ीम मिसाल, साइंटिफिक हक़ीक़त और तफ़्सीर
Islam

मकड़ी का घर (सूरह अल-अनकबूत): क़ुरआन करीम की अज़ीम मिसाल, साइंटिफिक हक़ीक़त और तफ़्सीर

admin
admin
7 min read 18 views

मकड़ी का घर (सूरह अल-अनकबूत) क़ुरआन मजीद की 29वीं सूरह में बयान की गई वह अज़ीम और हिकमत-भरी मिसाल है जिसमें अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने शिर्क करने वालों और ग़ैर-ख़ुदा को अपना माबूद व मददगार बनाने वालों की बे-बुनियादी को वाज़ेह फ़रमाया है। क़ुरआन करीम ने 1400 साल पहले मकड़ी के जाले की जो हक़ीक़त बयान फ़रमाई थी, आज की जदीद साइंस (Modern Zoology) उसके हर एक लफ़्ज़ की तस्दीक़ कर रही है। यह मज़मून सूरह अनकबूत की आयत 41 की मुकम्मल तफ़्सीर, साइंटिफिक एजाज़ और इससे मिलने वाली रूहानी हिदायत को साफ़ हिंदी में पेश करता है।

Table of Contents

सूरह अल-अनकबूत आयत 41: अरबी मतन व तर्जुमा

अल्लाह तआला ने क़ुरआन मजीद में इरशाद फ़रमाया:

مَثَلُ الَّذِينَ اتَّخَذُوا مِنْ دُونِ اللَّهِ أَوْلِيَاءَ كَمَثَلِ الْعَنكَبُوتِ اتَّخَذَتْ بَيْتًا ۖ وَإِنَّ أَوْهَنَ الْبُيُوتِ لَبَيْتُ الْعَنكَبُوتِ ۖ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ

तर्जुमा (कंज़ुल ईमान): “उनकी मिसाल जिन्होंने अल्लाह के सिवा और कारसाज़ (माबूद) बना लिए हैं, मकड़ी की तरह है जिसने जाले का घर बनाया; और बेशक सब घरों में ज़्यादा कमज़ोर घर ज़रूर मकड़ी का घर है, अगर वे जानते होते।”

📖 हवाला: सूरह अल-अनकबूत (29), आयत: 41; तफ़्सीर ख़ज़ाइनुल इरफ़ान

आयत-ए-मुबारका की तफ़्सीर और रूहानी मफ़हूम

सद्रुल अफ़ाज़िल हज़रत मौलाना नईमुद्दीन मुरादाबादी رضي الله عنه ‘ख़ज़ाइनुल इरफ़ान’ में फ़रमाते हैं कि इस आयत में मुशरिकीन के खोखले अक़ाइद की मिसाल दी गई है:

  • 1

    माबूदान-ए-बातिला की बे-बसी: मुशरिक लोग बुतों और ग़ैर-अल्लाह को यह सोचकर पूजते थे कि वे मुसीबत में काम आएंगे। क़ुरआन ने फ़रमाया कि उनका सहारा मकड़ी के जाले से भी ज़्यादा कमज़ोर है—न वे धूप से बचा सकते हैं, न बारिश से और न ही अल्लाह की पकड़ से।
  • 2

    दुनियावी तकब्बुर की फ़ना: जो लोग अपनी दौलत, ताक़त और ऊँचे महलों पर घमंड करते हैं और अल्लाह को भूल जाते हैं, उनका अंजाम भी मकड़ी के जाले जैसा होता है जिसे हवा का एक झोंका या एक उंगली का इशारा तबाह कर देता है।

क़ुरआन करीम का अज़ीम साइंटिफिक एजाज़ (Scientific Miracle)

जदीद साइंस ने जब मकड़ी की ज़िंदगी पर तहक़ीक़ की, तो क़ुरआन की हक़्क़ानियत देखकर वैज्ञानिक दंग रह गए:

  • 1

    मादा मकड़ी का जाला बुनना (Female Verb): अरबी ज़बान में क़ुरआन ने “इत्तख़ज़त” (اتَّخَذَتْ) लफ़्ज़ इस्तेमाल किया जो मोअन्नस (Female) के लिए आता है। 1400 साल पहले दुनिया यह समझती थी कि कोई भी कीड़ा घर बनाता है, लेकिन आधुनिक माइक्रोबायोलॉजी ने साबित किया कि जाला बुनने का काम सिर्फ़ मादा मकड़ी (Female Spider) करती है, नर मकड़ी नहीं!
  • 2

    रिश्तों और हिफ़ाज़त में सबसे कमज़ोर घर: मकड़ी का जाला सिर्फ़ हवा-पानी के लिहाज़ से ही कमज़ोर नहीं है, बल्कि समाजी और ख़ानदानी तौर पर भी दुनिया का सबसे ज़ालिम और कमज़ोर घर है। मादा मकड़ी मिलाप के बाद नर मकड़ी को क़त्ल कर देती है, और जब बच्चे पैदा होते हैं तो वे अक्सर अपनी ही माँ को खा जाते हैं। वहाँ रहम, हिफ़ाज़त और वफ़ा का कोई वजूद नहीं है।

ग़ार-ए-सौर में मकड़ी के जाले का मुअजिज़ा (हिजरत-ए-नबवी)

मकड़ी का यही जाला, जिसे दुनिया सबसे कमज़ोर समझती है, अल्लाह तआला ने हिजरत के मुबारक सफ़र में अपने महबूब रसूलुल्लाह ‎ﷺ‎ और हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ رضي الله عنه की हिफ़ाज़त का ज़रिया बना दिया।

जब कुफ़्फ़ार-ए-मक्का तलवारें लेकर ग़ार-ए-सौर के मुहाने पर पहुँच गए, तो अल्लाह के हुक्म से एक मकड़ी ने ग़ार के मुंह पर जाला बुन दिया और कबूतर ने अंडे दे दिए। काफ़िरों ने जाला देखकर कहा: “यहाँ कोई इंसान दाख़िल नहीं हो सकता, यह जाला तो मुहम्मद ﷺ की पैदाइश से पहले का मालूम होता है!” और वे वहीं से मायूस होकर लौट गए। अल्लाह ने अपने महबूब की हिफ़ाज़त लोहे की दीवारों से नहीं, बल्कि अपनी सबसे कमज़ोर मख़लूक़ के जाले से फ़रमाई!

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1. सूरह अनकबूत का नाम ‘अनकबूत’ क्यों रखा गया?

‘अल-अनकबूत’ अरबी में मकड़ी को कहते हैं। चूँकि इस सूरह की आयत 41 में मकड़ी और उसके जाले की हिकमत-भरी मिसाल बयान हुई है, इसलिए इसका नाम सूरह अल-अनकबूत रखा गया।

2. क्या घर में मकड़ी का जाला रहने देना चाहिए?

नहीं, सुन्नत और इस्लामी तालीमात के मुताबिक़ घरों को साफ़-सुथरा रखना चाहिए और मकड़ी के जालों को हटा देना चाहिए। हदीस शरीफ़ में आता है कि घर में जाले लगे रहने से फ़क़्र (ग़रीबी) आती है।

3. सूरह अनकबूत की इस आयत से आम मुसलमान को क्या सबक़ मिलता है?

सबक़ यह मिलता है कि सिर्फ़ अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त पर भरोसा रखना चाहिए। दुनियावी ताक़तों, झूठे सहारों और शिर्क से बचकर केवल ख़ुदा की ज़ात को अपना हक़ीक़ी कारसाज़ मानना चाहिए।

How useful was this post?

Click on a star to rate it!

3.0 out of 5 · 2 votes

No comments yet

Be the first to share your thoughts.

Leave a Comment

1-Click Google Verification to post comment:
To prevent spam, comments require a verified Google account (no password needed, only name & email).